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IMD forecasts: इस तरह मौसम विभाग करता है भविष्यवाणी, सटीक अलर्ट के लिए लेनी पड़ती है इन उपकरणों की मदद

Tue, 11 Jul 2023 03:20 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Tue, 11 Jul 2023 03:20 PM IST
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सार
IMD forecasts: मौसम विभाग के अधिकारी बताते हैं कि देश के किसी भी हिस्से में मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए कई बातों का ध्यान रखना होता है। अत्याधुनिक यंत्रों की सहायता से वातावरण और जमीन की सतह का तापमान, नमी, हवा की गति और दिशा, ओस, बादलों की स्थिति आदि को देखा जाता है...
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IMD forecasts: This is how Meteorological Department predicts weather with help of these devices
IMD forecasts - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

इन दिनों भारत के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में भारी बारिश से हाहाकार मचा हुआ है। राजधानी दिल्ली में बारिश ने 41 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। हिमाचल प्रदेश में सामान्य से 10 गुना ज्यादा बारिश हो रही है। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा समेत 7 राज्य बुरी तरह प्रभावित हैं। आने वाले दिनों में मौसम के हाल को लेकर मौसम विभाग पहले से ही भविष्यवाणी कर चुका है। ताकि स्थानीय सरकारों के अलावा आम लोगों को राहत मिल सके। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मौसम को लेकर ये भविष्यवाणी कैसे की जाती है। आखिरकार मौसम विभाग को कैसे पता चलता है कि आने वाले दिनों में किस राज्य के कौन से शहर में बारिश होगी, कहां आंधी चलेगी और कहां तेज गर्मी पड़ेगी। आइए जानते हैं।

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इन यंत्रों की मदद से जुटाई जाती है सूचनाएं

मौसम विभाग के अधिकारी बताते हैं कि देश के किसी भी हिस्से में मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए कई बातों का ध्यान रखना होता है। अत्याधुनिक यंत्रों की सहायता से वातावरण और जमीन की सतह का तापमान, नमी, हवा की गति और दिशा, ओस, बादलों की स्थिति आदि को देखा जाता है। इसके लिए कई तरह की मशीनों और उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बारिश के लिए वर्षामापी यंत्र, हवा की गति मापने के लिए एनीमोमीटर, वायु की दिशा के लिए विंड वेन, वाष्पीकरण की दर को मापने के लिए पेन-इवेपोरीमीटर, सनशाइन रिकॉर्डर, ओस के लिए ड्यूगेज, जमीन का तापमान मापने के लिए थर्मामीटर का प्रयोग किया जाता है। इन सभी के परिणाम आने के बाद सभी का विश्लेषण किया जाता है। इसके बाद ही कोई एक भविष्यवाणी निकलकर सामने आती है।

इतने तरह की भविष्यवाणी करता है मौसम विभाग

इसमें सबसे खास बात यह है कि पूरे देश का मौसम का डाटा जुटाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से लैस कंप्यूटर, मौसम संबंधी उपग्रह, एयर बैलून और मौसम रडार भी अहम भूमिका निभाते हैं। इन सभी से जुटाए गए डाटा का अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा साथ साथ हर दिन, हर माह के पुराने और वर्तमान के आंकड़ों को ध्यान रखा जाता है। इसके बाद ही देश के किसी भी हिस्से के लिए कोई भविष्यवाणी की जाती है। मौसम विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, मौसम विभाग वैसे तो कई तरह की भविष्यवाणी करता है। लेकिन सबसे अहम ये चार भविष्यवाणी होती है। इनमें पहला तात्कालिक होती है, जो अगले 24 घंटे के लिए होती है, दूसरा अल्प अवधि जो 1 से 3 दिनों के लिए होती है, तीसरी मध्यम अवधि जो 4 से 10 दिनों के लिए होती है। जबकि चौथी विस्तृत अवधि जो 10 से ज्यादा दिनों के लिए होती है। इनमें से मध्यम अवधि वाली भविष्यवाणियों को ज्यादातर सही होते देखा जाता है।

इस तरह आती हैं मौसम की तस्वीरें

विभाग के अफसरों के अनुसार, आज मौसम विभाग के देशभर में कई केंद्र हैं। वहां से हर मिनट की जानकारी मिलती रहती है। हर केंद्र पर कई तरह के सैटेलाइट मौजूद होते हैं जो बादलों की तस्वीरें केंद्र को देते रहते हैं। मौसम विभाग के अधिकारी ये अनुमान लगाते हैं कि कहां बादल हैं और कहां नहीं हैं। हालांकि बादलों को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि किस राज्य के किस शहर में धूप निकलेगी, किस जगह बादल छाए रहेंगे। लेकिन किस राज्य के किस शहर में बारिश होनी है और बादलों में कितना पानी है यह देखने के लिए आकाश में एक रडार से तरंगें छोड़ी जाती हैं। रडार के जरिए भेजी गई तरंगें बादलों से टकरा कर वापस आती हैं और उसके बाद उनका अध्ययन किया जाता है। इसके बाद मौसम विभाग ये भविष्यवाणी करता है कि कहां बारिश हो सकती है।

मौसम विभाग बारिश को मिमी में मापता है। दरअसल मौसम विभाग के पास एक बाल्टी नुमा कीप होती है, जो ऐसी जगह पर रखी जाती है, जहां न कोई बड़ी इमारत हो और न ही कोई पेड़ हो। ताकि जब पानी गिरे तो वो कीप अच्छी तरह से भर सके। इस कीप में मिमी में नंबर लिखे होते हैं। बारिश रुकने के बाद इन नंबर्स को देख लिया जाता है और इसके आधार पर मौसम विभाग ये जारी करता है कि किस जगह कितने मिमी बारिश दर्ज की गई है।

मौसम पूर्वानुमान की पंचस्तरीय प्रक्रिया

विभाग के अफसरों का कहना है कि मौसम पूर्वानुमान की पंचस्तरीय प्रक्रिया होती है। इसमें पहले लेवल में सबसे ऊपर पॉलिसी के आयोजन के लिए निकाय होता है। लेवल 2 में राष्ट्रीय कृषि मौसम परामर्श मुख्यालय, लेवल 3- राज्य स्तरीय कृषि मौसम परामर्श केंद्र, लेवल 4- जिला स्तरीय कृषि मौसम परामर्श का प्रचार-प्रसार एवं प्रशिक्षण और लेवल 5- मौसम विज्ञान कृषि परामर्श केंद्र होता हैं। मौसम विभाग द्वारा मौसम के पूर्वानुमान के लिए मौसमी तत्वों को सुबह 7.38 बजे और दोपहर में 2.38 बजे मापा जाता है। इसके अलावा ऑटोमेटिक मौसम केंद्र द्वारा हर आधे घंटे पर भी मौसमी तत्वों को मापा जाता है। साथ ही मौसमी केंद्र ऑब्जर्वेटरी, रडार और एयर बैलून के आधार पर भी मौसम के पूर्वानुमान या उसकी भविष्यवाणी करते हैं।

डॉप्लर रडार के जरिए मिलती है बारिश की सटीक जानकारी

मौसम विभाग के अफसरों से मिली जानकारी के अनुसार, सैटेलाइट से मिलने वाली इमेज से मानसून की चाल का पता चलता है। लेकिन इन सैटेलाइट से बारिश की तीव्रता का पता नहीं चलता। सैटेलाइट सिर्फ ये बता पाता है कि यहां-यहां बादल हैं या फिर इस गति से चल रहे हैं। लेकिन बारिश की जानकारी डॉप्लर रडार के जरिए पता चलती है। डॉप्लर रडार काफी ऊंचाई पर लगाया जाता है और इसका एंटीना एक बड़े गुब्बारे की तरह दिखाई देता है और यह रेडियो तरंगों या रडार बीम्स के इस्तेमाल से बारिश के साथ-साथ आंधी-तूफान, ओलावृष्टि और चक्रवाती तूफान की भी जानकारी देता है। डॉप्लर रडार मौसम की अति सूक्ष्म तरंगों को भी पकड़ लेता है। इसकी रेडियो तरंगें प्रकाश की गति जितनी तेज चलती हैं और जब वह बारिश या ओलावृष्टि जैसी किसी चीज से टकराती हैं तो वापस रडार पर लौटती हैं। मौसम विज्ञानी इन तरंगों की तेजी और उनके लौटने में लगे समय का विश्लेषण करते हैं और उसके आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणी करते हैं।

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