Govt Employees: 'जेसीएम अप्रभावी तो सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज', ऐसा कहने के लिए क्यों मजबूर हुए AIDEF महासचिव?
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केंद्र सरकार अपने 48 लाख से ज्यादा कर्मचारियों और लगभग 65 लाख पेंशनरों के हितों को लेकर गंभीर नहीं है। कर्मियों के अधिकारों को लेकर सरकार से बातचीत का एक आधिकारिक प्लेटफार्म यानी स्टाफ साइड की ज्वाइंट कन्सलटेटिव मशीनरी (जेसीएम) भी अप्रभावी हो गई है। कर्मचारियों को अपने कल्याण एवं हितों से जुड़े मुद्दों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। करीब 90 फीसदी मामलों में फैसला कर्मचारी के हित में आता है तो उसके बाद दो ही बातें देखने को मिलती हैं। पहली, सरकार उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली जाती है या फैसले की अवमानना को लेकर कर्मियों को दोबारा से अदालत में जाना पड़ता है। ये बात जेसीएम के वरिष्ठ सदस्य और अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार ने कही है। उन्होंने कहा, कर्मचारियों के हितों के मामलों में केंद्र सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है।
कर्मियों को कोर्ट में ले जाना सरकार के लिए आम बात ...
बतौर श्रीकुमार, हाल ही में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने भारत सरकार पर 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। रक्षा मंत्रालय/महानिदेशक आयुध/क्षेत्र इकाई, जबलपुर ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के 30 निर्णयों के विरुद्ध अपील दायर की थी। इन निर्णयों में ओटी वेतन में एचआरए/टीए को शामिल करने और बकाया भुगतान का निर्देश दिया गया था। श्रीकुमार ने बताया कि मध्य प्रदेश में आयुध कारखानों की एआईडीईएफ-संबद्ध यूनियनें भी इन मामलों में पक्षकार थीं। सेवा संबंधी शिकायतों के निवारण के लिए कर्मचारियों और उनकी यूनियनों को अदालतों में घसीटना सरकारी विभागों के लिए आम बात हो गई है। इससे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं: ऐसा क्यों हो रहा है? कर्मचारियों की शिकायतों के समाधान के लिए गठित संयुक्त परामर्शदात्री तंत्र (जेसीएम) अप्रभावी क्यों हो गया है?
जेसीएम को क्यों बताया, एक निष्क्रिय तंत्र ...
श्रीकुमार ने कहा कि सरकार ने जानबूझकर 'जेसीएम' तंत्र को अप्रभावी बना दिया है। कैबिनेट सचिव राष्ट्रीय परिषद जेसीएम (प्रथम स्तर) के अध्यक्ष होते हैं, जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों के सभी सेवा मामलों को देखती है। संबंधित मंत्रालयों/विभागों के सचिव विभागीय परिषद जेसीएम (द्वितीय स्तर) की अध्यक्षता करते हैं। जेसीएम के नियमों के अनुसार, हर साल कम से कम तीन साधारण बैठकें होनी चाहिए। हालांकि, पिछले एक दशक से, जेसीएम निष्क्रिय हो गया है। बैठकें नहीं बुलाई जाती हैं और कर्मचारी पक्ष द्वारा बार-बार किए गए अनुरोध, अनसुने रह गए हैं। कैबिनेट सचिव द्वारा हाल ही में सरकार के सचिवों को ट्रेड यूनियन के नेताओं से नियमित रूप से मिलने की सलाह देने के बावजूद कोई प्रयास नहीं किया गया है। जब जेसीएम विफल हो जाता है, तो कर्मचारियों और यूनियनों के पास अदालतों का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि, मुकदमेबाजी महंगी, समय लेने वाली और आर्थिक रूप से भारी होती है। सेवा मामलों में सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज बनकर उभरी है।
'कैट' की क्षमता भी हो रही कम ...
एआईडीईएफ के महासचिव के अनुसार, कैट की स्थापना विशेष रूप से ऐसे विवादों के निपटारे के लिए की गई थी, लेकिन न्यायिक और प्रशासनिक सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण इसकी क्षमता भी कम हो गई है। जब फैसले सरकार के खिलाफ जाते हैं, तो आमतौर पर उच्च न्यायालयों और फिर सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की जाती है। यह प्रक्रिया 10-15 साल तक खिंच सकती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले को खारिज किए जाने के बाद भी, पुनर्विचार याचिकाएं दायर की जाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि फैसले केवल याचिकाकर्ताओं के लिए ही लागू किए जाते हैं, जिससे समान स्थिति वाले कर्मचारियों को फिर से अदालतों का रुख करना पड़ता है। उदाहरणों में ड्रेस भत्ता, वास्तविक मूल वेतन पर रात्रि ड्यूटी भत्ता, एमएसीपी मुद्दे, चिकित्सा प्रतिपूर्ति दावे, वेतनमान में समानता और वर्तमान ओटी बकाया मामला शामिल हैं।
90% मामलों में फैसले सरकार के खिलाफ ...
ऐसे 90% से ज़्यादा मामलों में फैसले सरकार के खिलाफ जाते हैं। कई मामलों में तो अदालत की अवमानना याचिकाओं के बाद ही फैसले लागू किए जाते हैं। करदाताओं का भारी पैसा अंतहीन मुकदमों और अधिकारियों के टीए/डीए पर बर्बाद होता है, जिनकी अक्सर कोई जवाबदेही नहीं होती। वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बख्शा जाता। बीएसएनएल के पेंशनभोगी पेंशन संशोधन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह अब केंद्र सरकार के अन्य पेंशनभोगी भी पेंशन संशोधन को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। बेतुकी और निराधार अपीलें दायर करने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। एकमात्र स्थायी समाधान यह है कि जेसीएम के नियमों/योजना में सुधार कर उसे पुनर्जीवित और सुदृढ़ किया जाए। कर्मियों के मामलों में सभी स्तरों पर नियमित बैठकें आयोजित हों।
सभी मंत्रालयों को मुकदमेबाजी कम करने के निर्देश दें ...
श्रीकुमार ने कहा, जेसीएम योजना के अंतर्गत असहमति को मध्यस्थता बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। मध्यस्थता निर्णयों को छह महीने के भीतर लागू किया जाए। सेवा मामलों के निर्णयों को कर्मचारियों को बार-बार मुकदमेबाजी के लिए मजबूर किए बिना सभी स्तरों पर लागू किया जाना चाहिए। कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री को इस पर ध्यान देना चाहिए। 2026 में, जेसीएम योजना 60 वर्ष (हीरक जयंती) पूरे कर लेगी। इस उपलब्धि का उपयोग इस तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय को सभी मंत्रालयों को मुकदमेबाजी कम करने, निर्णयों को निष्पक्ष रूप से लागू करने और द्विपक्षीय शिकायत निवारण प्रणाली को सक्रिय करने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी करने चाहिए। उच्चतम स्तर पर नियमित निगरानी आवश्यक है। तभी कर्मचारियों को अंतहीन कानूनी लड़ाइयों की कठिनाइयों से बचाया जा सकेगा और भारत में सेवा न्यायशास्त्र को निष्पक्षता और सहानुभूति के साथ बहाल किया जा सकेगा।