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व्यवहार और सिद्धांत में फंसी कांग्रेस को असम से है काफी उम्मीद

Sun, 10 Apr 2016 01:00 AM IST
शशिधर पाठक/ अमर उजाला, दिल्ली
शशिधर पाठक/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 10 Apr 2016 01:00 AM IST
सार

  • रणनीतिकारों के अनुसार राज्य में है कांटे की टक्कर
  • सरकार न बनी तो बढ़ेगी पार्टी की चुनौतियां
     

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If congress losses election in Assam it will tough for it
Jorhat assam - फोटो : PTI

विस्तार

करीब 130 साल पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व्यवहार और सिद्धांत के बीच फंस गई है। पार्टी बदलाव के मोड़ पर खड़ी है, लेकिन नए-पुराने तथा सिद्धांतों की उलझन में न दो कदम आगे बढ़ पा रही है और न ही चार कदम पीछे टिक पा रही है। ऐसे में कांग्रेस को असम विधानसभा चुनाव से बहुत उम्मीद है।

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कांग्रेस उत्तराखंड व अरुणाचल में सरकार गंवाने जैसा दूसरा जोखिम नहीं मोल लेना चाहती, लेकिन मौजूदा समय में कर्नाटक, मणिपुर तथा हिमाचल में पार्टी की सरकार है और वहां काफी हलचल है। बाहर से आए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को राज्य के कांग्रेसी अभी तक पचा नहीं पा रहे हैं।
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मणिपुर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदलने और मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को हिदायतें देने के बाद भी कुछ नेताओं की भौंहें चढ़ी हुई हैं। वहीं हिमाचल में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। पार्टी के कुछ नेता भी मुसीबत खड़ी करने का संकेत दे रहे हैं।
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दस जनपथ के करीबी समझे जाने वाले एक राष्ट्रीय नेता की भी मुख्यमंत्री बनने इच्छा बलवती है। यद्यपि कांग्रेस महासचिव अंबिका सोनी ने सोनिया और राहुल गांधी को विश्वास में लेकर सब कुछ साध लेने को पूरा जोर लगा दिया है। इस स्थिति में असम के चुनाव नतीजे का असर दूसरे राज्य पर पड़ने के साथ-साथ कांग्रेस की सेहत प्रभावित कर सकता है। 

सरकार न बनी तो बढ़ेगी पार्टी की चुनौतियां

If congress losses election in Assam it will tough for it
असम में प्रचार

कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि पार्टी को 55-60 सीटें मिलती हैं तो सरकार बनेगी। इसको लेकर कांग्रेस ने असम में पूरा जोर लगा दिया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो असम का नतीजा कांग्रेस के भीतर, बाहर और दूसरे राज्यों में चुनौतियां बढ़ाएगा। वहीं नतीजे भाजपा के पक्ष में आए तो पार्टी और खासकर मोदी-शाह की जोड़ी बिहार के सदमे से उबर जाएगी। दरअसल 2014 के आम चुनाव के बाद से कांग्रेस आंतरिक और बाहरी चुनौती में फंसी है।

उपाध्यक्ष राहुल गांधी दूसरी पीढ़ी की कांग्रेस के लिए बड़ा बदलाव चाहते हैं, जबकि पार्टी अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं की टीम फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
दूसरी ओर मोदी-शाह की जोड़ी भाजपा की पुरानी मान्यताओं को ताक पर रखकर युवाओं को कमान दे रही है। नतीजतन कांग्रेस के अच्छे, युवा और प्रभावी
नेता उसका दामन छोड़ रहे हैं।

असम में पहले हेमंत विश्व शर्मा, फिर प्रवक्ता प्रमोद स्वामी और उत्तराखंड के बागियों का उदाहरण सामने है। यह कांग्रेस की
विवशता ही है कि उसे असम में 81 साल के तरुण गगोई, पंजाब में उम्रदराज कैप्टन अमरिंदर सिंह और केरल में ओमान चांडी पर भरोसा करना पड़ रहा है।

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