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विचारधारा: आरएसएस के एजेंडे को कितना सूट करते हैं अंबेडकर, अखंड भारत के बड़े पैरोकार थे बाबा साहब
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बी आर अंबेडकर
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विस्तार
केंद्र सरकार लगातार इस बात का दावा करती रही है कि वह विभिन्न योजनाओं के जरिए बाबा साहब अंबेडकर के विचारों को आगे बढ़ाने का काम करती रही है। केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों के मंत्रिमंडल में भागीदारी से लेकर कल्याणकारी योजनाओं तक हर जगह दलितों-पिछड़ों को खूब भागीदारी दी जा रही है जिसके लिए अंबेडकर पूरे जीवन संघर्ष करते रहे थे।
वहीं, यह आरोप भी लगता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) केंद्र सरकार के जरिए अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है। तो क्या आरएसएस और अंबेडकर के विचारों में कुछ साम्यता देखी जा सकती है जिसे आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार दोनों लक्ष्य एक साथ पूरा कर रही है? विपक्ष का आरोप है कि दलितों को रिझाने के लिए भाजपा अंबेडकर के विचारों को अपनाने का दिखावा जरूर करती है, लेकिन असलियत में वह संघ के विचारों को आगे बढ़ाने का ही काम कर रही है। इस मामले की सच्चाई क्या है?
अंबेडकर सबसे बड़े राष्ट्रवादी
आरएसएस का मुखपत्र मानी जाने वाली पत्रिका पांचजन्य के पूर्व संपादक तरुण विजय ने अमर उजाला से कहा कि बाबा साहब अंबेडकर राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े पैरोकार थे। उन्होंने न केवल भारत के विभाजन का घोर विरोध किया था, बल्कि धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्रीयता निर्धारित करने वाली सोच का भी कठोर विरोध किया था। वे राष्ट्र को केवल भूमि का टुकड़ा नहीं समझते थे, बल्कि इसे धार्मिक चेतना से जोड़कर देखते थे।
उन्होंने कहा कि जब अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन करने का निर्णय किया, तब इस्लाम और ईसाई मिशनरियां उनके पीछे पड़ गई थीं। ये लोग चाहते थे कि अंबेडकर हिंदू धर्म छोड़कर मुसलमान या ईसाई बन जाएं जिससे उनके पीछे उनके करोड़ों समर्थक भी उनके धर्म में आ जाएंगे। लेकिन अंबेडकर ने इस्लाम और ईसाई धर्म की बजाय बौद्ध धर्म को स्वीकार किया क्योंकि उन्हें लगता था कि यह धर्म भारत की मिट्टी से निकला हुआ है, लिहाजा इसमें राष्ट्रीयता है। उनकी इसी सोच से यह समझा जा सकता है कि अंबेडकर राष्ट्रीय चेतना के कितने बड़े समर्थक थे।
संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के हिमायती थे
भाजपा नेता तरूण विजय ने कहा कि कुछ लोगों को यह जानना आश्चर्यजनक लग सकता है कि अंबेडकर संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के हिमायती थे। जिस समय हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने पर कुछ लोगों के मत अलग-अलग थे, अंबेडकर चाहते थे कि संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाई जाए क्योंकि इसी भाषा में भारत की चेतना-संस्कृति और समृद्ध विरासत समाहित है। संघ या केंद्र सरकार का समाज से जातीय भेद दूर करने की सोच के मूल बीज भी अंबेडकर के विचारों में देखे जा सकते हैं।
अंबेडकर के सपनों को साकार कर रही केंद्र सरकार
तरूण विजय के मुताबिक, अंबेडकर वित्तीय और सुरक्षा के संदर्भ में देश की आत्मनिर्भरता के सबसे बड़े पैरोकार थे। आज केंद्र सरकार भारत को पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाने का सपना देख रही है। वह देश को सामरिक मामलों में भी आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। आज भारत न केवल अपनी आवश्यकता के लिए आयुध निर्माण कर रहा है, बल्कि विदेशों को निर्यात भी कर रहा है। केंद्र की इस कोशिश में भी अंबेडकर के सपनों के भारत की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
अंबेडकर का सबसे बड़ा सपना पूरा हो रहा
बाबा साहब का सबसे बड़ा सपना सामाजिक भेदभाव रहित समाज की स्थापना करना था। पंच तीर्थों की स्थापना कर, कल्याणकारी योजनाओं के जरिए वंचित-पिछड़े तबकों को आर्थिक मजबूती देकर और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए जातीय भेद मिटाने के प्रयास कर केंद्र सरकार अंबेडकर के उन्हीं विचारों को अमलीजामा पहनाने का प्रयास कर रही है। केंद्र सरकार ने जब 1000 और 500 मूल्य के नोटों का डिमोनेटाइजेशन किया था, तब भी सरकार ने यही तर्क दिया था कि बाबा साहब अंबेडकर इसके बड़े हिमायती थे।
आरएसएस के एजेंडे को सूट नहीं करते अंबेडकर
दलित चिंतक अशोक भारती मानते हैं कि अंबेडकर और आरएसएस की विचारधारा में कहीं कोई साम्य नहीं है। यदि अंबेडकर के विचारों के आधार पर आरएसएस अपना हिंदुत्व का एजेंडा आगे चलाने की कोशिश करता है तो उसे इसमें सफलता नहीं मिलेगी। इसका सबसे बड़ा कारण है कि अंबेडकर जाति प्रथा के साथ-साथ वर्ण व्यवस्था के भी खिलाफ थे, जबकि आरएसएस जातिवादी-वर्ण व्यवस्था वाली मनुवादी सोच की पैरोकारी करता है।
अशोक भारती के अनुसार, दशहरा के अवसर पर नागपुर में हर साल दो बड़े आयोजन होते हैं। पहला आरएसएस के मुख्यालय पर आयोजित किया जाता है जिसमें शस्त्रों की पूजा की जाती है, दूसरा कार्यक्रम बाबा साहब अंबेडकर के अनुयायी करते हैं जो सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि यह अकेला अवसर ही बताता है कि दोनों अलग-अलग विचारधाराएं हैं जिनमें कभी कोई साम्य नहीं हो सकता।
यदि संघ अंबेडकर के बहाने हिंदुत्व की विचाऱधारा को आगे बढ़ाने की बात करता है तो उनके समर्थक अंबेडकर की उन पुस्तकों को भी अवश्य पढ़ेंगे और उनके उन विचारों को भी जानेंगे जिनसे संघ का वैचारिक दुराब है। लिहाजा उन्हें नहीं लगता कि अंबेडकर संघ के विचारों को आगे बढ़ाने में किसी प्रकार से सहायक हो सकते हैं।
अंबेडकर के नाम पर दिखावे का आरोप
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की पूर्व छात्र और कांग्रेस नेता ऋतु चौधरी का आरोप है कि केंद्र सरकार दिखावे के लिए अंबेडकर को अपनाने का काम करती है जबकि असलियत में वह संघ के विचारों को ही आगे बढ़ाने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख बार-बार आरक्षण को समाप्त करने की बात करते हैं जबकि अंबेडकर मानते थे कि वंचित समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण एक बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। लिहाजा संघ की कथनी-करनी में भेद साफ दिखाई पड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं कि केंद्र सरकार के हर काम पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दखल रहता है। यदि संघ सचमुच में जातीय उन्मूलन के लिए कार्य कर रहा है तो उसे बताना चाहिए कि उसकी सर्वोच्च बॉडी में कितने दलित या पिछड़ों को शामिल किया गया है। सच्चाई यह है कि संघ केवल उच्च जाति के लोगों का समूह है जो छद्म नाम का सहारा लेकर अपनी विचारधारा को थोपने के लिए अंबेडकर का सहारा ले रही है। उन्हें नहीं लगता कि केंद्र सरकार असली मायने में अंबेडकर के विचारों को लागू करने का काम कर रही है।