दावा: आईसीएमआर महानिदेशक ने कहा, भर्ती मरीजों के डाटा के अनुसार दूसरी लहर कम घातक
- एक ओर महामारी लाखों लोगों पर कहर बरपा रही, दूसरी ओर आईसीएमआर महानिदेशक ने अस्पताल में भर्ती हुए सिर्फ 10 हजार मरीजों के विश्लेषण से बने नेशनल रजिस्ट्री डाटा के हवाले से किया दावा।
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भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने सोमवार को दावा किया कि देश में हजारों जान ले चुकी और लाखों पर कहर बरपा रही कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर पिछली बार से कम घातक है। अस्पतालों में भर्ती सिर्फ 10 हजार मरीजों का विश्लेषण कर बने नेशनल रजिस्ट्री डाटा के हवाले से उन्हाेंने कहा कि दोनों लहर की मृत्युदर में बहुत अंतर नहीं आया है।
एक समाचार एजेंसी से बातचीत में डॉ. भार्गव ने यह भी दावा किया कि पिछली बार महामारी की चपेट में औसतन 50 साल के नागरिक आ रहे थे तो इस बार 49 वर्ष। यानी युवाओं की संख्या मामूली बढ़ी है। सभी राज्यों में दोनों लहर में दर्ज मामलों के अनुसार मृत्युदर लगभग बराबर है। उन्हाेंने कहा कि इस बार कोविड-19 के लक्षण कम नजर आ रहे हैं। लेकिन सांस लेने में दिक्कत के मामले बहुत ज्यादा है। जोड़ों व मांसपेशियोें में दर्द, थकान, गंध व स्वाद न महसूस होना, गले में दर्द जैसे लक्षण पिछली लहर के मुकाबले कम मरीजों में मिल रहे हैं।
उम्र के अनुसार संक्रमितों का प्रतिशत
| आयु वर्ग | दूसरी लहर | पहली लहर में थे |
| 0 से 19 वर्ष | 5.8 | 4.2 |
| 20 से 40 वर्ष | 25 | 23 |
| 41 से अधिक वर्ष | 70 | 72 |
भारी पड़ी लापरवाही, अधिक उम्र तो खतरा ज्यादा
डॉ. भार्गव ने दावा किया कि महामारी को लेकर भारी लापरवाही बरती गई है। कोविड-19 से बचाव के लिए बताए गए मानकों के अनुसार आचरण नहीं किया गया। वहीं इस बार भी अधिक उम्र वाले मरीजों को ज्यादा खतरा है। वे ज्यादा संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। बड़ी संख्या बिना लक्षण वाले मरीजों की है, जिनका स्वास्थ्य बेहद गिर गया है।
आरटी-पीसीआर टेस्ट गलत नहीं हो सकते
डॉ. भार्गव ने दावा किया कि वायरस के म्यूटेशन के बावजूद देश में आरटी-पीसीआर टेस्ट गलत नहीं हो सकते। इनमें दो जीन्स या दो से अधिक जीन्स की जांच की जाती है, इससे गलती नहीं होती। वायरस में कोई बदलाव आया है, तब भी उसे पकड़ा जा सकता है। उन्हाेंने दोहरे म्यूटेशन वाले वायरस से तेज संक्रमण दर को साबित करने के लिए अध्ययनों की जरूरत बताई।
मरीज में टेस्ट से कोविड का पता न चले तो क्लीनिकल विश्लेषण करें : विशेषज्ञ
चिकित्सा विशेषज्ञों का दावा है कि आरटी-पीसीआर से कोरोना के 80 प्रतिशत मामले पहचान में आ रहे हैं। फॉल्स निगेटिव कहे जाने वाले पकड़ में न आए मामलों के लिए सीटी स्कैन, सीने के एक्सरे या स्वास्थ्य के क्लीनिकल विश्लेषण जैसे तरीकों का उपयोग करें।
एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि कई बार सैंपल ठीक से न लेने, या वायरल लोड बढ़ने के पहले सैंपल लेने आदि वजहों से निगेटिव रिपोर्ट आ सकती है। लेकिन अगर मरीज में कोरोना के लक्षण हैं तो क्लीनिकल विश्लेषण के तहत इसे कोरोना मानते हुए इलाज मुहैया करवाएं। इसके 24 घंटे बाद फिर से टेस्ट करवा सकते हैं।