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Judicial independence: 'कानूनी संस्थाओं में न्यायिक स्वतंत्रता अहम'; अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत के जज का बयान
Sat, 10 Feb 2024 07:17 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 10 Feb 2024 07:17 PM IST
सार
न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर देते हुए आईसीजे की महिला न्यायाधीश हिलेरी चार्ल्सवर्थ ने कहा, कानूनी संस्थाओं के संचालन में न्यायिक स्वतंत्रता की अहम भूमिका है। उन्होंने भारत की सुप्रीम कोर्ट को प्रेरणा देने वाली संस्था करार दिया। हिलेरी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आत्मनिरीक्षण की साहसी क्षमता वास्तव में बेहद प्रभावशाली है।
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नई दिल्ली में कार्यक्रम के दौरान अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत की जज हिलेरी चार्ल्सवर्थ
- फोटो : ANI
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विस्तार
ऑस्ट्रेलिया की कानूनविद हिलेरी चार्ल्सवर्थ ने न्यायिक स्वतंत्रता पर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि संस्थाओं के संचालन के लिए न्यायिक स्वतंत्रता बेहद जरूरी है। नीदरलैंड के हेग में अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (ICJ) में साल 2021 से सेवा दे रहीं हिलेरी ने कहा कि अस्थिर राजनीतिक माहौल में न्यायिक स्वतंत्रता और अहम बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट परिसर में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और अन्य न्यायविदों की मौजूदगी में जस्टिस हिलेरी ने कुलभूषण जाधव मामले का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही आईसीजे के फैसले से दोनों देशों के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ, लेकिन इस फैसले से गंभीर समस्या का कानूनी हल मिला।
'इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस: लीगल फोरम इन पॉलिटिकल एनवॉयरनमेंट' शीर्षक पर दूसरे वार्षिक व्याख्यान में नई दिल्ली दौरे पर आईं आईसीजे की न्यायाधीश हिलेरी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में न्यायिक स्वतंत्रता का मकसद किसी भी गैर-कानूनी विचार को खत्म करना है। इनसे न्यायाधीश के तर्क प्रभावित होने की आशंका होती है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका भारत की शीर्ष अदालत की स्वतंत्रता के प्रतिष्ठित इतिहास से प्रेरणा ले सकती है।
उन्होंने कहा, भारत की सुप्रीम कोर्ट और हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (आईसीजे) बहुत अलग हैं, लेकिन दोनों की आयु एक जैसी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 75वें वर्ष में है जबकि आईसीजे 78वें वर्ष में जा रही है। न्यायाधीश हिलेरी के मुताबिक दोनों अदालतों को 'अत्यधिक तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल से निपटना' पड़ा है।
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न्यायाधीश हिलेरी के मुताबिक, भारत की स्वतंत्रता, नवप्रवर्तन के प्रतिष्ठित इतिहास और सर्वोच्च न्यायालय से अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका भी प्रेरणा ले सकती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की आत्मनिरीक्षण की साहसी क्षमता वास्तव में बेहद प्रभावशाली है। आईसीजे की औपचारिक बैठक में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के वक्तव्य का हवाला देते हुए न्यायाधीश हिलेरी ने कहा, आत्मनिरीक्षण किसी दुर्लभ चीज को अपनी दृष्टि के दायरे में लाने की कला है।
उन्होंने आईसीजे की संरचना पर कहा कि इस अदालत में 15 न्यायाधीश पदस्थापित हैं। इनका अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का होना जरूरी है। इन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में शामिल देश चुनते हैं। नौ साल की अवधि के लिए एक साथ मतदान होता है। न्यायाधीशों का कार्यकाल बढ़ाया भी जा सकता है। लिंग संतुलन का जिक्र करते हुए न्यायाधीश हिलेरी ने स्वीकार किया कि ICJ का 'रिकॉर्ड खराब' था। लगभग आठ दशकों के इतिहास में 109 पुरुषों की तुलना में केवल छह महिलाओं को न्यायाधीश चुना गया।
आईसीजे में भारतीय न्यायाधीशों के बारे में जस्टिस हिलेरी ने कहा, जस्टिस नागेंद्र सिंह सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले न्यायाधीश थे, जो 1970 और 80 के दशक में 15 वर्षों तक अदालत में रहे। न्यायाधीश चार्ल्सवर्थ ने कहा, अपने 78 वर्षों के इतिहास में आईसीजे ने 182 विवादास्पद मामलों पर विचार किया है। 27 मुकदमों में अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत ने सलाहकार की भूमिका अदा की है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि विविधता और प्रतिनिधित्व न केवल ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के लिए बल्कि अदालतों की निर्णय लेने की क्षमता को समृद्ध करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के समक्ष राष्ट्र-राज्यों के उभरते प्रतिनिधित्व ने उल्लेखनीय रूप से इसे चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि इसी तरह, अदालतों के भीतर लैंगिक विविधता को एकीकृत करने से दृष्टिकोण का दायरा काफी हद तक व्यापक हो जाएगा, जिससे अधिक व्यापक और न्यायसंगत फैसले हो सकेंगे।
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'इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस: लीगल फोरम इन पॉलिटिकल एनवॉयरनमेंट' शीर्षक पर दूसरे वार्षिक व्याख्यान में नई दिल्ली दौरे पर आईं आईसीजे की न्यायाधीश हिलेरी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में न्यायिक स्वतंत्रता का मकसद किसी भी गैर-कानूनी विचार को खत्म करना है। इनसे न्यायाधीश के तर्क प्रभावित होने की आशंका होती है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका भारत की शीर्ष अदालत की स्वतंत्रता के प्रतिष्ठित इतिहास से प्रेरणा ले सकती है।
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उन्होंने कहा, भारत की सुप्रीम कोर्ट और हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (आईसीजे) बहुत अलग हैं, लेकिन दोनों की आयु एक जैसी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 75वें वर्ष में है जबकि आईसीजे 78वें वर्ष में जा रही है। न्यायाधीश हिलेरी के मुताबिक दोनों अदालतों को 'अत्यधिक तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल से निपटना' पड़ा है।
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न्यायाधीश हिलेरी के मुताबिक, भारत की स्वतंत्रता, नवप्रवर्तन के प्रतिष्ठित इतिहास और सर्वोच्च न्यायालय से अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका भी प्रेरणा ले सकती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की आत्मनिरीक्षण की साहसी क्षमता वास्तव में बेहद प्रभावशाली है। आईसीजे की औपचारिक बैठक में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के वक्तव्य का हवाला देते हुए न्यायाधीश हिलेरी ने कहा, आत्मनिरीक्षण किसी दुर्लभ चीज को अपनी दृष्टि के दायरे में लाने की कला है।
उन्होंने आईसीजे की संरचना पर कहा कि इस अदालत में 15 न्यायाधीश पदस्थापित हैं। इनका अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का होना जरूरी है। इन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में शामिल देश चुनते हैं। नौ साल की अवधि के लिए एक साथ मतदान होता है। न्यायाधीशों का कार्यकाल बढ़ाया भी जा सकता है। लिंग संतुलन का जिक्र करते हुए न्यायाधीश हिलेरी ने स्वीकार किया कि ICJ का 'रिकॉर्ड खराब' था। लगभग आठ दशकों के इतिहास में 109 पुरुषों की तुलना में केवल छह महिलाओं को न्यायाधीश चुना गया।
आईसीजे में भारतीय न्यायाधीशों के बारे में जस्टिस हिलेरी ने कहा, जस्टिस नागेंद्र सिंह सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले न्यायाधीश थे, जो 1970 और 80 के दशक में 15 वर्षों तक अदालत में रहे। न्यायाधीश चार्ल्सवर्थ ने कहा, अपने 78 वर्षों के इतिहास में आईसीजे ने 182 विवादास्पद मामलों पर विचार किया है। 27 मुकदमों में अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत ने सलाहकार की भूमिका अदा की है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि विविधता और प्रतिनिधित्व न केवल ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के लिए बल्कि अदालतों की निर्णय लेने की क्षमता को समृद्ध करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के समक्ष राष्ट्र-राज्यों के उभरते प्रतिनिधित्व ने उल्लेखनीय रूप से इसे चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि इसी तरह, अदालतों के भीतर लैंगिक विविधता को एकीकृत करने से दृष्टिकोण का दायरा काफी हद तक व्यापक हो जाएगा, जिससे अधिक व्यापक और न्यायसंगत फैसले हो सकेंगे।