AH-64E Apache: LAC पर 12000 फीट पर पांच माह से उड़ने की राह देख रहा IAF का अपाचे! रिकवरी में इसलिए हो रही देरी
भारतीय वायुसेना के विश्वस्त सूत्रों ने अमर उजाला से बातचीत के दौरान माना कि 03 अप्रैल को चीन की सीमा के नजदीक दुर्घटनाग्रस्त हुए अपाचे हेलीकॉप्टर अभी तक पूरी तरह से तरह से रिकवर नहीं हो पाया है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इसी साल चार अप्रैल को भारतीय वायुसेना को एक AH-64E अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर चीनी सीमा के नजदीक लद्दाख में एक अभ्यास के दौरान एक्सीडेंट हो गया था। उस समय खबरें आईं थीं कि 650 करोड़ रुपये की कीमत वाले हेवी-ड्यूटी हेलिकॉप्टर अपाचे ने हाई एल्टीट्यूड एरिया में हार्ड लैंडिंग की थी। इस दुर्घटना में दोनों पायलटों को मामूली चोटें आईं थीं। लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस हादसे को हुए पांच माह पूरे होने वाले हैं, लेकिन अभी तक अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर को वहां से रिकवर नहीं किया जा सका है। एयरफोर्स सूत्रों का कहना है कि वे इसकी रिकवरी और रिपेयर के लिए अपाचे हेलीकॉप्टर बनाने वाली कंपनी बोइंग के संपर्क में हैं। बोइंग का कहना है कि वे इस पर कुछ कमेंट करने की स्थिति में नहीं हैं। बता दें कि भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही 22 अपाचे हेलिकॉप्टर हैं, जिन्हें करीब चार साल पहले शामिल क्या गया था। वहीं, अमेरिका से अभी छह और अपाचे की भी डिलीवरी होनी है।
12 हजार फीट की ऊंचाई पर है हेलीकॉप्टर
भारतीय वायुसेना के विश्वस्त सूत्रों ने अमर उजाला से बातचीत के दौरान माना कि 03 अप्रैल को चीन की सीमा के नजदीक दुर्घटनाग्रस्त हुए अपाचे हेलीकॉप्टर अभी तक पूरी तरह से तरह से रिकवर नहीं हो पाया है। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना ने उसके रिपेयर या उसकी रिकवरी के लिए ऑरिजन इक्विपमेंट मैन्यूफैक्चरर (मूल निर्माता) कंपनी बोइंग से संपर्क किया है। चूंकि यह दुर्घटना खारदूंग-ला के नजदीक 12 हजार फीट की ऊंचाई पर हुई थी, जिसके चलते उसकी रिकवरी में दिक्कतें आ रही है। बता दें, कि खारदूंग-ला (दर्रा) 18,380 फीट पर स्थित है औऱ साल के 12 महीने बर्फ से ढका रहता है। वहीं, अब सर्दियां दस्तक देने को हैं और लद्दाख के ऊपरी इलाकों में बर्फ पड़नी शुरू हो जाती है। साथ ही, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र कहे जाने वाले सियाचिन ग्लेशियर की तरफ जाने वाले सभी हेलीकॉप्टरों को खारदुंग-ला दर्रे को पार करके ही जाना होता है।
पायलटों ने की थी 'लॉस ऑफ पावर' की शिकायत
वायुसेना के सूत्रों के मुताबिक 03 अप्रैल को लद्दाख में गगन शक्ति एक्सरसाइज के दौरान अपाचे एक ऑपरेशनल सॉर्टी पर था। जिस दौरान हेवी-ड्यूटी हेलिकॉप्टर अपाचे ने हार्ड लैंडिंग की थी। इस दुर्घटना में दोनों पायलटों को मामूली चोटें आईं थी और उन्हें नजदीकी एयर बेस पर ले जाया गया था। वायुसेना ने बताया था कि हेलीकॉप्टर की “एहतियाती लैंडिंग के दौरान ऊबड़-खाबड़ इलाके और अधिक ऊंचाई के कारण नुकसान पहुंचा है”। हालांकि जब उसकी इमरजेंसी लैंडिंग हुई थी, तो दोनों पायलट ने अचानक 'लॉस ऑफ पावर' की शिकायत की थी। वहीं, लद्दाख में खारदुंग-ला के पास हुई इस दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश भी जारी किए गए थे। वायुसेना के सूत्रों ने बताया कि कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी की रिपोर्ट भी अभी तक नहीं आई है। जब तक हेलीकॉप्टर पूरी तरह से रिकवर नहीं होगा, तब तक यह भी पूरी तरह से नहीं बताया जा सकता कि इस दुर्घटना के कारण क्या थे।
हाई एल्टीट्यूड पर नहीं पहुंच सकती क्रेन
वायुसेना के सूत्रों ने बताया कि अभी भी दुर्घटनाग्रस्त अपाचे का स्ट्रक्चर (शेल) और इंजन हादसे की जगह पर ही मौजूद है। अपाचे के पार्ट्स को खोल-खोल कर नीचे लाया जा रहा है। हालांकि उसके एवियोनिक्स समेत दूसरे आइटम्स रिकवर कर लिए गए हैं। उन्होंने बताया कि चूंकि अपाचे के पार्ट्स भारी हैं, इसलिए उन्हें नीचे लाने में देरी हो रही है। इसके अलावा 12000 फीट पर अपाचे दुघर्टनाग्रस्त हुआ था, इसलिए वहां तक क्रेन भी नहीं पहुंच सकती है। साथ ही, ज्यादा वजन होने की वजह से चिनूक जैसा हेवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टर भी अपाचे को ‘अंडर-स्लंग’ करके वापस बेस पर वापस लाने में नाकामयाब रहा है। वायुसेना सूत्रों ने बताया कि धीरे-धीरे पहले उसे लेह एयरबेस लाया जाएगा, जहां से उसके बाद उसे होम बेस पहुंचाया जाएगा। उसके बाद उसे फिर से उड़ने लायक बनाया जाएगा, जिसमें लंबा वक्त लग सकता है।
बोइंग से मिला ये जवाब
वहीं इस मामले में जब ऑरिजन इक्विपमेंट मैन्यूफैक्चरर (मूल निर्माता) कंपनी बोइंग से संपर्क साधा गया, तो उन्होंने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले पर भारतीय वायुसेना ही कुछ बता सकती है। वहीं, जब उनसे यह पूछा गया कि क्या भारतीय वायुसेना ने रिपेयर या रिकवरी के लिए उनसे संपर्क किया है, तो उन्होंने जवाब दिया कि अपाचे की सर्विस, मेंटेनेंस या रिपेयर की जिम्मेदारी उन्हीं की है।
ओईएम ही देखेगा तकनीकी समस्या
रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने अमर उजाला को बताया कि भारत के पास अभी भी कुछ रूसी Mi-26 सुपर हेवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टर वर्किंग कंडीशन में हैं। हालांकि Mi-26 को पहले ही ग्राउंड किया जा चुका है। लेकिन एमआई-26 अपाचे को ‘अंडर-स्लंग’ करके वापस बेस पर ले जा सकता है। हालांकि इसमें देखना होगा कि एमआई-26 की सर्विस सीलिंग कितनी है। बता दें कि एमआई-26 की सर्विस सीलिंग 4,600 मीटर या 15,100 फीट है। एयर मार्शल चोपड़ा ने मिराज का उदाहरण देते हुए बताया कि ओईएम का सपोर्ट तीन साल का होता है, जिसमें टेक्निकल और डिजाइनिंग प्रॉब्लम को ठीक करने की उनकी जिम्मेदारी होती है। जहाज में कोई भी तकनीकी समस्या आती है, तो ओईएम ही देखेगा। उन्होंने बताया कि लेकिन दुर्घटनाग्रस्त जगह से लाने की जिम्मेदारी भारत की होती है। वह कहते हैं कि एक बार उनके समय में मिराज का एक्सीडेंट हुआ था, उसके इंजन के ब्लेड में कोई दिक्कत थी, तो ओईएम तय नहीं कर पा रहा था कि दिक्कत कहां है। क्या ब्लेड गलत लगा था या ब्लेड ही खराब था। वह कहते हैं कि आमतौर पर ओईएम हमेशा मदद करता है। वह स्पेयर पार्ट्स भी मुहैया कराता है।
हाई एल्टीट्यूड में घट जाती है हेलीकॉप्टर की लोड कैरिंग कैपेसिटी
वहीं, हेलीकॉप्टर पायलट रहे रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर कहते हैं कि तकनीकी समस्या आने पर कई बार हार्श लैंडिंग करनी पड़ती है। वह कहते हैं कि कोई भी ओईएम मदद करने से मना नहीं करेगा, क्योंकि उसे भविष्य में भी अपने प्रोडक्ट बेचने होते हैं। लेकिन अपाचे को लेकर हो रही देरी पर उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि इसकी रिकवरी में इतना वक्त क्यों लग रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि हाई एल्टीट्यूड पर हेलीकॉप्टर की लोड कैरिंग कैपेसिटी घट जाती है, क्योंकि ऑक्सीजन पतली हो जाती है, जिससे इंजन की परफॉरमेंस कम हो जाती है और असर लोड कैरिंग कैपेसिटी पर पड़ता है। वहीं, दूसरा विकल्प हेलीकॉप्टर के पार्ट्स को अलग करके बेस पर वापस ले जाना होता है।
4,000 मीटर से ऊपर नहीं उड़ सकता अपाचे
वहीं एविएशन एक्सपर्ट इग्निस रेक्स लद्दाख में अपाचे के इस्तेमाल पर ही वाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि कहने के लिए अपाचे की सर्विस सीलिंग 20,000 फीट (6,096 मीटर) है, लेकिन वह 4,000 मीटर से ऊपर नहीं उड़ सकता है। भारतीय वायुसेना ने लद्दाख में 4,000 मीटर ऊपर हाई एल्टीट्यूड ऑपरेशंस में गलत हेलीकॉप्टर मॉडल का इस्तेमाल कर रही है, जहां हवा पतली, ठंडी और ऑक्सीजन भी कम है। उन्होंने बताया कि उनकी जानकारी के मुताबिक 4 अपाचे हेलीकॉप्टर चीन की सीमाओं के पास फंसे हुए हैं और इलाके, मौसम और सुरक्षा कारणों से उन्हें उड़ाया नहीं जा सकता। उन्होंने बताया कि अपाचे ज्यादा ऊंचाई पर कम वायु घनत्व होने से हवा पतली हो जाती है, जिससे इंजन को ईंधन के दहन के लिए कम ऑक्सीजन मिलती है, और इंजन की परफॉरमेंस खराब होती है। साथ ही, रोटर ब्लेड लिफ्ट कम करते हैं। वह कहते हैं कि जिन हेलीकॉप्टर में ज्यादा ब्लेड और ताकतवर इंजन होते हैं, वह ऐसे वातावरण में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। वह कहते हैं कि AS350 एक्यूरुइल, CH-47 चिनूक और सिकोरस्की CH-53E सुपर स्टैलियन जैसे हेलीकॉप्टर हाई एल्टीट्यूड के लिए कारगर हैं।
हेलीकॉप्टर की कीमत 62 फीसदी बढ़ी
बता दें, कि 2015 में 2.1 बिलियन डॉलर या 14,910 करोड़ की कीमत में 22 AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टरों का सौदा हुआ था। 11 मई 2019 को वायुसेना को पहला अपाचे हेलिकॉप्टर मिला, जिसके बाद सितंबर 2019 में 9 अपाचे पाकिस्तान सीमा के पास मौजूद इंडियन एयरफोर्स के पठानकोट एयरबेस पर तैनात किए गये। जोधपुर में पहला अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर स्क्वाड्रन स्थापित किया गया। भारतीय सेना की एविएशन कॉर्प्स ने भी साल 2020 में 6,600 करोड़ रुपये की कीमत में छह और अपाचे हेलीकॉप्टर का लड़ाकू का ऑर्डर बोइंग को दिया था, जिनकी डिलीवरी का अभी इंतजार है। बता दें कि केवल पांच सालों में ही, एक हेलीकॉप्टर की कीमत 62 फीसदी तक बढ़ गई।
दुनिया का सबसे एडवांस मल्टी-रोल कॉम्बैट हेलिकॉप्टर
AH-64E अपाचे दुनिया का सबसे एडवांस मल्टी-रोल कॉम्बैट हेलीकॉप्टर है। जिसमें अत्याधुनिक नाइट विजन सिस्टम लगा है, और अंधेरे में भी दुश्मनों का पता लगाया जा सकता है। यह एक मिनट में 128 टारगेट्स पर निशाना साध सकता है। इसके पास भारी मात्रा में हथियार ले जाने की क्षमता है और यह 280 किमी प्रति घंटा की गति से उड़ान भर सकता है। इस हेलिकॉप्टर में 16 एंटी-टैंक AGM-114 हेलफायर और स्ट्रिंगर मिसाइलें लग सकती हैं। हेलफायर मिसाइलें किसी भी आर्मर्ड वाहन जैसे टैंक, तोप, या BMP वाहनों को तुरंत नष्ट कर सकती हैं। स्ट्रिंगर मिसाइलें हवा से आने वाले खतरों का सामना करने में सक्षम हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें Hydra-70 अनगाइडेड मिसाइलें भी हैं, जो जमीनी लक्ष्यों को निशाना बना सकती हैं।