I.N.D.I Alliance: ममता को अहंकारी और बेईमान कहने पर लिखी गई गठबंधन के दरकने की स्क्रिप्ट, मुसीबत में गठजोड़!
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विस्तार
विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I Alliance) में शामिल राजनीतिक दलों के बीच 'सीट शेयरिंग' को लेकर कोई सर्वमान्य फॉर्मूला तय होता, इससे पहले ही गठबंधन में तगड़े झटके लगने लगे हैं। ताजा झटका गठबंधन की वरिष्ठ सहयोगी एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिया है। बनर्जी ने बुधवार को स्पष्ट कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में टीएमसी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। किसी दल के साथ ममता बनर्जी, कोई गठबंधन नहीं करेंगी। बनर्जी के इस बयान पर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ममता बनर्जी को जब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने अहंकारी और बेईमान कहा था, तभी इंडिया गठबंधन के दरकने की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। अब ममता बनर्जी के इस बयान से विपक्षी गठबंधन, मुसीबत में फंसता नजर आ रहा है।
चौधरी बोले, आज ममता अहंकार दिखा रही हैं
ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच तनाव होने की खबरें, पिछले दो तीन माह से आ रही थीं। लोकसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल में दोनों दलों के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय नहीं हो सका था। कांग्रेस, 8 सीटें चाहती थी, तो वहीं ममता बनर्जी ने इस पार्टी को अंडर 5 में रखने की रणनीति बनाई थी। खास बात है कि इंडिया गठबंधन की कुछ बैठकों में ममता बनर्जी शामिल हुई थीं, लेकिन किसी अहम फैसले में ममता बनर्जी को फ्रंट फुट पर नहीं देखा गया। पिछले दिनों विपक्षी दलों की वर्चुअल मीटिंग में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे और सपा नेता अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए। सीट शेयरिंग को लेकर टीएमसी, सपा और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली थी। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी को अहंकारी और बेईमान कहा था। चौधरी ने अपने बयान से कांग्रेस और टीएमसी के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा दिया। चौधरी ने कहा, जिन लोगों की वजह से वो (ममता बनर्जी) नेता बनी हैं, उन्हीं को आज ममता अहंकार दिखा रही हैं। ममता और भाजपा के बीच सांठगांठ हो चुकी है। वो पीएम मोदी को धोखा नहीं देंगी। यही वजह है कि इंडिया गठबंधन में ममता, सीटों पर समझौता नहीं करना चाहती हैं।
इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सकते
वर्चुअल मीटिंग में एक तरफ नीतीश कुमार का संयोजक पद लेने से मना करना और दूसरी ओर तीन बड़े नेताओं का वर्चुअल मीटिंग से किनारा करना, ये गठबंधन की एकजुटता के लिए शुभ संकेत नहीं था। नीतीश कुमार की जगह, मल्लिकार्जुन खरगे को विपक्षी दलों ने इंडिया गठबंधन के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी। नीतीश कुमार ने इस पद के लिए अनिच्छा जताई। नीतीश कुमार का कहना था, गठबंधन का संयोजक बनने की उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। गठबंधन की एकजुटता जरूरी है। जमीन पर यह गठबंधन आगे बढ़ना चाहिए। राजनीतिक जानकारों का कहना है, विपक्षी दलों के नेताओं के इन बयानों को कांग्रेस ने बखूबी समझा था। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यह बात जानता था कि देर सवेर गठबंधन में दरार आएगी। 'विपक्षी गठबंधन' की वर्चुअल मीटिंग को भाजपा ने अपने लिए फायदे का सौदा, जैसा माना था। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा इस मीटिंग पर नजर रखे थे। उन्होंने कहा था, 'जब मैंने विपक्षी गठबंधन की बैठक के बारे में सुना तो पता चला कि यह एक वर्चुअल बैठक है। वर्चुअल गठबंधन सिर्फ वर्चुअल बैठक ही करेगा। इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कर सकते।
ये एकजुटता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं
विपक्षी दलों की वर्चुअल मीटिंग में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे और सपा नेता अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए। सीट शेयरिंग को लेकर टीएमसी, सपा और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस पार्टी असहज स्थिति में है। दोनों दलों के नेताओं के बीच बैठक होनी थी, लेकिन एन वक्त पर कांग्रेस ने सपा को फोन कर बैठक टालने का आग्रह किया। सपा की ओर से 'एक्स' पर एक पोस्ट अपलोड की गई, जिसे कुछ घंटे बाद हटा लिया गया था। उसमें कांग्रेस पर धोखेबाजी का आरोप लगाया गया था। सपा प्रवक्ता फकरुल हसन का कहना था कि हम कांग्रेस से जिताऊ प्रत्याशियों के नाम दो महीने से मांग रहे हैं। अखिलेश यादव ने सीट शेयरिंग के लिए सपा महासचिव रामगोपाल यादव सहित कई नेताओं की टीम गठित कर दी है। जानकारों का कहना है कि गठबंधन की एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा सीट शेयरिंग का कोई सर्वमान्य फॉर्मूला तय नहीं होना है। हर पार्टी, ज्यादा से ज्यादा सीट चाहती है। यूपी में सपा, कांग्रेस को दस सीटों से नीचे रखना चाहती है। मायावती का सपा और कांग्रेस, दोनों को इंतजार है।
आरजेडी को साथ लेकर चलने से खुश नहीं
गत वर्ष इंडिया गठबंधन की पहली बैठक, जो पटना में हुई थी, उसमें नीतीश कुमार का जोश देखने लायक था। उसके बाद बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली की बैठकों में नीतीश कुमार का वह जोश पूरी तरह से गायब नजर आया। उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष ललन सिंह को हटाकर खुद कमान संभाल ली है। उनकी पार्टी के कई नेता, लालू यादव की आरजेडी को साथ लेकर चलने से खुश नहीं हैं। उधर, नीतीश कुमार भी अभी भंवर में फंसे हैं। ऐसी अफवाह उड़ती रहती है कि वे भाजपा यानी एनडीए में आ सकते हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नीतीश कुमार पिछले कुछ समय से दबाव में चल रहे हैं। जेडीयू के भीतर ही उनकी भूमिका और मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर सवाल उठ रहे थे। यही वजह रही कि नीतीश कुमार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के साथ ही राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुलानी पड़ी। उसमें नीतीश ने खुद पार्टी की कमान संभाल ली।
यूपी में बसपा से भगवा टोली को नुकसान नहीं
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के सूत्रों ने यूपी में बसपा की भूमिका को लेकर कहा, वहां पर हमें कोई नुकसान नहीं है। यूपी में मायावती, भले ही किसी भी समूह में शामिल न होकर अलग से चुनाव लड़ती हैं, तो उस स्थिति में भगवा टोली को कोई नुकसान नहीं होगा। यूपी में मायावती का अपने बलबूते लोकसभा चुनाव लड़ना, भाजपा के लिए फायदेमंद है। बसपा की मौजूदा राजनीतिक स्थिति ऐसी नहीं है कि इसके नेता लोकसभा चुनाव के लिए कोई बड़ा निर्णय लें। उनके लिए दिल्ली की सियासत से ज्यादा यूपी में खोई हुई जमीन वापस लेना है। ऐसे में लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा, भाजपा के लिए किसी जोखिम का कारण नहीं बनेगी। दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती ने नववर्ष पर अपने संदेश में कहा था, देशवासी इस वर्ष लोकसभा चुनाव में सर्वजन हितैषी सरकार बनाने का प्रयास करें। उन्होंने सरकार को भी रोजगार की गारंटी सुनिश्चित कर सच्ची देशभक्ति का परिचय देने और राजधर्म का निर्वाह करने की नसीहत दी। लोगों की जेब में खर्च के लिए पैसे न हों, तो देश के विकास का ढिंढोरा कैसा व लोगों के किस काम का है।
किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी 'बसपा'
बेरोजगारों की भारी फौज के साथ 'विकसित भारत' कैसे संभव है। मायावती ने कहा, भाजपा की केंद्र व राज्य की सरकारें हों या कांग्रेस सहित विपक्ष के गठबंधन की राज्य सरकारें, दोनों ही जबरदस्त महंगाई, विकराल रूप धारण करती गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ेपन जैसी बुनियादी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहीं हैं। सिर्फ लोगों का ध्यान बंटाने के लिए अलग-अलग प्रकार की 'गारंटी' वितरण में लगी हैं। बसपा प्रमुख ने कहा था, पहले कांग्रेस और अब भाजपा की लंबी चली जातिवादी, अहंकारी, गैर समावेशी सरकार के दुष्प्रभाव से गरीबों का विकास लगातार बाधित हो रहा है। उससे पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा चुनाव में किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने की बात कही थी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बसपा किसी भी खेमे में शामिल नहीं होगी।