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Shashi Tharoor: 'मुझे लिखना ही था...', जब UN में अपने कार्यकाल के दौरान थरूर ने लेखन के लिए मांगी थी अनुमति
Sat, 31 Aug 2024 08:08 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 31 Aug 2024 08:08 PM IST
सार
Shashi Tharoor: अपनी नई किताब 'द वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स' के विमोचन के मौके पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने बताया कि वे लिखने के कितने शौकीन हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में रहते हुए कैसे लिखना जारी रखा, जहां कर्मचारियों को काम के लिए सख्त नियम होते हैं।
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अपनी नई किताब 'द वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स' के विमोचन के मौके पर शशि थरूर
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
1970 के दशक में जब युवा शशि थरूर (यूएन) में काम कर रहे थे, तो उन्हें अपने लेखन कार्य के लिए विशेष अनुमति मांगनी पडी थी। वह बताते हैं कि यह अनुमति वैसे ही थी जैसे जेम्स बॉन्ड को मारने की अनुमति थी। थरूर को अपने अद्भुत शब्दावली के लिए जाना जाता है। उनके लेख इतने प्रभावशाली होते हैं कि लोग अक्सर उनके शब्दों का मतलब शब्दकोष (डिक्शनरी) में तलाशते हैं। थरूर ने किशोरावस्था से पहले ही लिखना शुरू कर दिया था।
कांग्रेस सांसद ने दस साल की उम्र में एक भारतीय अंग्रेजी पत्रिका में अपना पहला लेख प्रकाशित किया था। उनके पहले उपन्यास को 11 साल की उम्र से पहले ही एक अखबार में अलग-अलग अंकों में छापा गया था। यह उपन्यास एक आंग्ल-भारतीय लड़ाकू पायलट की कहानी पर आधारित था। शुक्रवार को अपनी नई किताब 'द वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स' के विमोचन के मौके पर थरूर ने बताया कि वे लिखने के कितने शौकीन हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में रहते हुए कैसे लिखना जारी रखा, जहां कर्मचारियों को काम के लिए सख्त नियम होते हैं।
उन्होंने कहा, "मुझे लिखने की आदत हो गई थी और मेरे बचपन में मेरी कहानियां भारतीय पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में छपने लगीं थीं। मेरी लिखने की ललक कभी कम नहीं हुई। मैं अक्सर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की पंक्ति 'मैं वैसे ही लिखता हूं, जैसे गाय दूध देती है' को उद्धृत करता था। यह मेरे अंदर था, इसे बाहर आना ही था। इसलिए मुझे लिखना पड़ा।" थरूर ने बताया कि 1978 में जब उन्होंने जिनेवा में यूएनएचसीआर (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त) में काम करना शुरू किया, तो उन्होंने मुख्य मानव संसाधन अधिकारी से बाहरी गतिविधियों के लिए अनुमति मांगी।
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तिरुवनंतपुरम से सांसद थरूर ने कहा, "मैंने मुख्य मानव संसाधान अधिकारी से कहा कि अगर लोग सप्ताहांत पर क्रिकेट खेल सकते हैं। तितलियां और डाक टिकट इकट्ठा कर सकते हैं, तो मैं लिख क्यों नहीं सकता? इसके बाद मुझे अनुमति दी गई। लेकिन शर्त थी कि मुझे किसी भी सदस्य देश को नाराज नहीं करना होगा। यही शर्त थी और मुझे अनुमति मिल गई।"
उन्होंने कहा, "मैं जोक मारता था कि जैसे जेम्स बॉन्ड को मारने की अनुमति थी, वैसे ही मुझे लिखने की अनुमति मिली है। मुझे हर साल उस अनुमति को रिन्यू करवाना पड़ता था।" 2007 तक अपने यूएन के करियर के दौरान थरूर ने कई किताबें लिखीं, जिनमें 'रीजन्स ऑफ स्टेट', 'द ग्रेट इंडियन नोवेल','द फाइव डॉलर स्माइल एंड अदर स्टोरीज' और 'इंडिया: मिडनाइट टू द मिलेनियम' शामिल हैं।
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कांग्रेस सांसद ने दस साल की उम्र में एक भारतीय अंग्रेजी पत्रिका में अपना पहला लेख प्रकाशित किया था। उनके पहले उपन्यास को 11 साल की उम्र से पहले ही एक अखबार में अलग-अलग अंकों में छापा गया था। यह उपन्यास एक आंग्ल-भारतीय लड़ाकू पायलट की कहानी पर आधारित था। शुक्रवार को अपनी नई किताब 'द वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स' के विमोचन के मौके पर थरूर ने बताया कि वे लिखने के कितने शौकीन हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में रहते हुए कैसे लिखना जारी रखा, जहां कर्मचारियों को काम के लिए सख्त नियम होते हैं।
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उन्होंने कहा, "मुझे लिखने की आदत हो गई थी और मेरे बचपन में मेरी कहानियां भारतीय पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में छपने लगीं थीं। मेरी लिखने की ललक कभी कम नहीं हुई। मैं अक्सर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की पंक्ति 'मैं वैसे ही लिखता हूं, जैसे गाय दूध देती है' को उद्धृत करता था। यह मेरे अंदर था, इसे बाहर आना ही था। इसलिए मुझे लिखना पड़ा।" थरूर ने बताया कि 1978 में जब उन्होंने जिनेवा में यूएनएचसीआर (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त) में काम करना शुरू किया, तो उन्होंने मुख्य मानव संसाधन अधिकारी से बाहरी गतिविधियों के लिए अनुमति मांगी।
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तिरुवनंतपुरम से सांसद थरूर ने कहा, "मैंने मुख्य मानव संसाधान अधिकारी से कहा कि अगर लोग सप्ताहांत पर क्रिकेट खेल सकते हैं। तितलियां और डाक टिकट इकट्ठा कर सकते हैं, तो मैं लिख क्यों नहीं सकता? इसके बाद मुझे अनुमति दी गई। लेकिन शर्त थी कि मुझे किसी भी सदस्य देश को नाराज नहीं करना होगा। यही शर्त थी और मुझे अनुमति मिल गई।"
उन्होंने कहा, "मैं जोक मारता था कि जैसे जेम्स बॉन्ड को मारने की अनुमति थी, वैसे ही मुझे लिखने की अनुमति मिली है। मुझे हर साल उस अनुमति को रिन्यू करवाना पड़ता था।" 2007 तक अपने यूएन के करियर के दौरान थरूर ने कई किताबें लिखीं, जिनमें 'रीजन्स ऑफ स्टेट', 'द ग्रेट इंडियन नोवेल','द फाइव डॉलर स्माइल एंड अदर स्टोरीज' और 'इंडिया: मिडनाइट टू द मिलेनियम' शामिल हैं।