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दलितों का खाना बन गया अब सुपरफूड्स, जानिए कैसे और क्यों?
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 01 Jul 2016 05:47 PM IST
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- फोटो : daily mail
सदियों से दलित समुदाय को सवर्ण जातियों के साथ खाने की मनाही थी। ये प्रतिबंध लगाने वालों की सोच थी कि इस पूरे समुदाय को अच्छे खान-पान से दूर रखा जाए लेकिन उन्हें नहीं पता था कि ये समुदाय हमेशा से उनसे अच्छा खाना खाता था। ये तथ्य पूर्व माओवादी, उद्यमी, लेखक और दलित कार्यकर्ता चंद्रभान प्रसाद ने दलित समुदाय को लेकर अपने गहन अध्यन के दौरान खोजा।
उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि दलित समुदाय के जो सदस्य बचपन में मृत्यु से बच जाते थे वो जिंदगी भर गरीब और सुविधाओं से वंचित रहने के बादजूद, 80 और 90 साल की उम्र में सक्रिय और स्वस्थ जीवन जीते हैं। चंद्रभान प्रसाद, हावर्ड अर्थशास्त्री देवेश कपूर के साथ दलित समुदाय के वस्तुओं के उपभोग के व्यवहार में आए परिवर्तन का अध्यन कर रहें हैं।
जमीनदार वर्ग पहले जौ, मक्का, बाजरा आदि को पशुओं को चारा खिलाने के लिए और खेत में काम करने वाले मजदूरों को मजदूरी देने के लिए बोते थे। लेकिन दलित समुदाय के लोग इन्हीं फसलों को अपने भरण पोषण के लिए बोता था।
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उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि दलित समुदाय के जो सदस्य बचपन में मृत्यु से बच जाते थे वो जिंदगी भर गरीब और सुविधाओं से वंचित रहने के बादजूद, 80 और 90 साल की उम्र में सक्रिय और स्वस्थ जीवन जीते हैं। चंद्रभान प्रसाद, हावर्ड अर्थशास्त्री देवेश कपूर के साथ दलित समुदाय के वस्तुओं के उपभोग के व्यवहार में आए परिवर्तन का अध्यन कर रहें हैं।
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जमीनदार वर्ग पहले जौ, मक्का, बाजरा आदि को पशुओं को चारा खिलाने के लिए और खेत में काम करने वाले मजदूरों को मजदूरी देने के लिए बोते थे। लेकिन दलित समुदाय के लोग इन्हीं फसलों को अपने भरण पोषण के लिए बोता था।
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2 जुलाई से बाजार में आ रहा है 'दलित फूड्स'
दलित कार्यकर्ता चंद्रभान प्रसाद
- फोटो : daily mail
दलित समुदाय नहीं जानता था कि आगे चलकर ये फसलें पूरी दुनिया में 'सुपरफूड्स' के नाम से जानी जाएंगी। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और जैवविविधता कार्यकर्ता वंदना शिवा कहती हैं कि भारत इन फसलों को बोना अब भूल गया है। इन फसलों में आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, विटामिन बी और फाइबर जैसे बहुत से लाभकारी पोषक त्तव होते हैं। ये फसलें रक्त में ग्लूकोज को अवशोषित कर उनकी क्षमता कम करने के लिए जानी जाती हैं। ये फसलें पूरी दुनिया में तेजी से लोकप्रिय हो रहीं हैं।
चंद्रभान प्रसाद की जिंदगी का अगला मकसद पूरे देश में मिलावट मुक्त आचार और मसाला पाउडर उपलब्ध कराना है। इन आचारों को वैसे ही बनाया जाएगा जैसे पहले दलित घरों में बनाए जाते थे। प्रसाद इन्हें 'दलित फूड्स' कहते हैं क्योंकि अभी तक दलित समुदाय के लोग खाने के पैक ब्रांडो से दूर ही रहें है। यह आचार औपचारिक रूप से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में, शनिवार, 2 जुलाई को भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सहयोग से शुरू किया जाएगा।
चंद्रभान प्रसाद की जिंदगी का अगला मकसद पूरे देश में मिलावट मुक्त आचार और मसाला पाउडर उपलब्ध कराना है। इन आचारों को वैसे ही बनाया जाएगा जैसे पहले दलित घरों में बनाए जाते थे। प्रसाद इन्हें 'दलित फूड्स' कहते हैं क्योंकि अभी तक दलित समुदाय के लोग खाने के पैक ब्रांडो से दूर ही रहें है। यह आचार औपचारिक रूप से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में, शनिवार, 2 जुलाई को भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सहयोग से शुरू किया जाएगा।