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सुप्रीम कोर्ट जांचेगा याचिका : भगवान राम और कृष्ण की पूजा में भेद कैसे

Sat, 13 Mar 2021 04:08 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 13 Mar 2021 04:08 AM IST
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How can difference in between ram and krishnna worships
supreme court - फोटो : पीटीआई

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 1991 के धर्मस्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। याचिका के मुताबिक, भगवान राम और कृष्ण की पूजा में भेद कैसे कर सकते हैं, जबकि दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं।

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याचिका में कहा गया है कि यह कानून मनमाना और अतार्किक है, क्योंकि 1991 का यह कानून कहता है कि देश में सभी धार्मिक स्थलों की स्थिति वैसे ही रहेगी जो 15 अगस्त 1947 को थी।
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मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने भाजपा नेता व वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की इस याचिका पर परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
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याचिका में कहा गया है कि हिंदू सैकड़ों साल से भगवान कृष्ण की जन्मस्थली की बहाली के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी जारी है। मगर, केंद्र ने इस कानून के दायरे से अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि को तो बाहर रखा, मगर मथुरा में श्रीकृष्ण की जन्मस्थली को नहीं।

याचिका के अनुसार, यह कानून हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन समुदाय को अपने उन पवित्र स्थलों पर दावा करने से रोकता है, जिनकी जगह पर जबरन मस्जिद, दरगाह या चर्च बना दिए गए थे। यह न सिर्फ न्याय पाने के मौलिक अधिकार का हनन है, बल्कि धार्मिक आधार पर भी भेदभाव है।

शीर्ष अदालत द्वारा इस मामले का परीक्षण करना इस मायने में महत्वपूर्ण है, क्योंकि काशी में भगवान शिव के मंदिर और मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि के दावे की बातें उठ रही हैं। मथुरा की अदालत ने तो इस संबंध में दायर अर्जी पर विचार करने का निर्णय भी लिया है।।

काशी-मथुरा समेत बाकी धार्मिक स्थलों के लिए न्याय पाने की राह बंद करने जैसी
1991 में जब धर्मस्थल अधिनियम बना तब अयोध्या से जुड़ा मुकदमा पहले से अदालत में लंबित था, इसलिए अयोध्या मामले को कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। हालांकि, काशी-मथुरा समेत बाकी सभी धार्मिक स्थलों के लिए यह कह दिया गया कि उनकी स्थिति नहीं बदल सकती।

याचिकाकर्ता उपाध्याय का कहना है कि यह न्याय पाने का रास्ता बंद करने जैसा है। संसद ने इस तरह कानून बना कर विदेशी आक्रांताओं की तरफ से किए गए अन्याय को मान्यता दी है।

रकार को यह हक नही है कि किसी को कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के संवैधानिक अधिकार से वंचित रखा जाए। याचिकाकर्ता ने इस कानून की धारा दो, तीन और चार को चुनौती दी है और उसे असांविधानिक घोषित करने की गुहार लगाई है।

अनुच्छेद-25 के तहत आस्था के पालन का हक, यह राज्य सूची का विषय
याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद-25 लोगों को अपनी धार्मिक आस्था के पालन का अधिकार देता है। ऐसे में संसद इसमें बाधक बनने वाला कोई कानून पास नहीं कर सकती।

याचिका में कहा गया है कि तीर्थस्थानों के प्रबंधन से जुड़ा मसला राज्य सूची का विषय है। अगर कानून बनाने के पीछे कानून-व्यवस्था की दलील दी जाए तो यह विषय भी राज्य सूची का ही है, इसलिए संसद ने इस मसले पर कानून बना कर असांविधानिक काम किया है।

दो और याचिकाएं भी लंबित
पिछले वर्ष इसी मुद्दे पर विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ नामक संस्था ने याचिका दाखिल की थी। इसके तुरंत बादजमीयत उलेमा ए हिंद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। सुन्नी मुस्लिम उलेमाओं के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया था कि वह पुजारी महासंघ की याचिका पर सुनवाई न करे।


जमीयत का कहना था कि अयोध्या के फैसले के बाद अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर नोटिस जारी करता है तो इससे मुस्लिम समुदाय में डर का माहौल पैदा हो जाएगा।

जमीयत ने यह भी कहा था कि अगर इस कानून को रद्द किया गया तो हिंदुओं की तरफ से मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी और देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा खतरे में पड़ जाएगा। हालांकि, इस याचिका को अब तक सूचीबद्ध नहीं किया जा सका है।

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