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असम : बेहतर संगठन कौशल ने हिमंत को पूर्वोत्तर में बनाया भाजपा के लिए विकल्पहीन
Mon, 10 May 2021 02:41 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Jeet Kumar
Updated Mon, 10 May 2021 02:41 AM IST
सार
- छह साल पहले कांग्रेस छोड़ने वाले हिमंत पूर्वोत्तर की राजनीति में भाजपा का अहम चेहरा बने
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हिमंता बिस्वा सरमा
- फोटो : social media
विस्तार
महज छह साल पहले कांग्रेस छोड़ने वाले हिमंत बिस्व सरमा पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में भाजपा का सबसे अहम चेहरा बन गए हैं। बेहतर संगठन कौशल ने हिमंत को पूर्वोत्तर में भाजपा के लिए विकल्पहीन बना दिया। पूर्वोत्तर की राजनीति में उनकी पहचान एक ऐसे जुनूनी राजनीतिज्ञ की है, जिनके लिए हर हाल में लक्ष्य हासिल करना ही अंतिम ध्येय है।
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जमीनी और अकाट्य रणनीति के जरिये विरोधियों को हमेशा अचंभित करने वाले हिमंत अब पूर्वोत्तर के सबसे अहम राज्य असम के सीएम का पद हासिल करने में मिली सफलता के कारण चर्चा में हैं।
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दरअसल, भाजपा का एक धड़ा और संघ निवर्तमान सीएम सर्बानंद सोनोवाल को एक और कार्यकाल देने का हिमायती था। मगर हिमंत की पूर्वोत्तर के राज्यों में धमक, सहयोगियों के बीच गहरी पैठ के साथ पार्टी के विधायकों में स्वीकार्यता के कारण ऐसा नहीं हो पाया।
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छात्र राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति तक का 52 वर्षीय हिमंत का करीब दो दशक का सफर रोमांचित करने वाला है। छात्र जीवन से ही राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हिमंत राजधानी के कॉटन कॉलेज में कॉलेज यूनियन सोसाइटी के महासचिव बने। एमए और पीचडी और फिर एलएलबी करने के बाद हाईकोर्ट में बतौर अधिवक्ता चार साल वकालत की। फिर अचानक 2001 में कांग्रेस के रास्ते राजनीति में आए।
आते ही छोड़ी छाप
पहली बार जालुकबारी से साल 2001 में विधायक बनने के बाद हिमंत सीएम तरुण गोगोई के करीबी हो गए। एक साल बाद ही उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। इसके बाद उनका कद लगातार मजबूत होता गया। मंत्री रहते हुए भी उन्होंने संगठन के कार्यों में लगातार दिलचस्पी ली। गोगोई की 2006 और 2011 की सरकार में भी मंत्री बने।
लक्ष्य के लिए जुनूनी
लक्ष्य के लिए जुनून हिमंत के व्यक्तित्व की खास पहचान है। तीसरी बार विधायक बनने के बाद जब सीएम तरुण गोगोई ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकार अपने पुत्र गौरव गोगोई को देने की ओर कदम बढ़ाया तो हिमंत उनके विरोधी हो गए।
कांग्रेस नेतृत्व और गोगोई पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने एआईयूडीएफ से पर्दे के पीछे हाथ मिलाने से परहेज नहीं बरता। इसके बावजूद बात नहीं बनी तो साल 2014 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर एक साल बाद भाजपा में शामिल हो गए।
अमित शाह के करीबी
हिमंत की प्रतिभा को शाह ने बखूबी पहचाना। उनके अध्यक्ष रहते जब हिमंत भाजपा में शामिल हुए तो उन्हें संयोजक बनाकर असम में कांग्रेस को हराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। फिर साल 2016 में राज्य की 60 सीटें जीतने के बाद पहली बार सरकार बनाकर भाजपा ने इतिहास रचा।
इसके बाद शाह ने हिमंत का उपयोग पूर्वोत्तर की राजनीति में भाजपा का आधार बनाने में किया। असम में एनआरसी के तीखे विरोध को संभालने की जिम्मेदारी भी शाह ने हिमंत को ही दी।
इस नतीजे के बाद पार्टी को त्रिपुरा में दशकों से सत्ता पर काबिज वाम दलों को किनारा करने में कामयाबी मिली। भाजपा ने हिमंत के सहारे पूर्वोत्तर में कांग्रेस की राजनीति को सिक्किम तक सीमित करने में सफलता हासिल की।