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टिपिंग प्वाइंट के करीब हिमालय: एक दशक में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ी, ब्लैक कार्बन ने बढ़ाई चिंता
Thu, 17 Sep 2026 11:28 PM IST
देवेश त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Thu, 17 Sep 2026 11:28 PM IST
सार
हिमालय तेजी से बदल रहा है और इसका असर पहाड़ों से कहीं आगे तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक की तुलना में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65 प्रतिशत बढ़ी है। ब्लैक कार्बन इस प्रक्रिया को और तेज कर रहा है, जबकि ग्लेशियरों के पीछे हटने से खतरनाक झीलों और अस्थिर ढलानों का जोखिम बढ़ रहा है।
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करोड़ों लोगों पर असर की आशंका
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कल्पना कीजिए, पहाड़ों पर बर्फ का विशाल भंडार लगातार घट रहा है। शुरुआत में इसका असर दूर ऊंची चोटियों तक दिखाई देता है, लेकिन कुछ समय बाद यही बदलाव नदियों के प्रवाह, खेतों की सिंचाई, शहरों के पानी और पनबिजली तक पहुंच सकता है। हिमालय आज ऐसे ही बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक दशक की तुलना में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ गई है। बर्फ पर जमने वाला ब्लैक कार्बन यानी कालिख इस प्रक्रिया को और तेज कर रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से खतरनाक झीलें बन रही हैं, पहाड़ी ढलानें अस्थिर हो रही हैं और आने वाले दशकों में कुछ नदी घाटियों में पानी की उपलब्धता घटने की आशंका बढ़ रही है। यही वजह है कि विशेषज्ञ हिमालय के संभावित ‘टिपिंग प्वाइंट’ को लेकर चिंतित हैं यानी ऐसा निर्णायक मोड़, जिसके बाद बदलाव को रोकना या पहले जैसी स्थिति में लौटना बेहद मुश्किल हो सकता है।
यह तस्वीर ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म सिस्टेमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायर्नमेंट की रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश- हिमालय क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी जमीन पिघल रही है और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं।रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो इस सदी के अंत तक हिमालयी ग्लेशियरों की मौजूदा मात्रा का 80% तक हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। इसका मतलब सिर्फ पहाड़ों पर कम बर्फ नहीं है। इसका असर उन नदियों और जल प्रणालियों पर भी पड़ सकता है जिन पर दक्षिण एशिया की बड़ी आबादी निर्भर है।
पहाड़ों की बर्फ पर पहुंच रही मैदानों की कालिख
ग्लेशियरों के पिघलने की कहानी केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। इसमें हवा में मौजूद ब्लैक कार्बन की भी अहम भूमिका है। ब्लैक कार्बन कालिख के बेहद छोटे कण होते हैं, जो ईंधन जलने और औद्योगिक गतिविधियों से निकलते हैं। हवा के साथ ये कण हिमालय तक पहुंचकर बर्फ की सतह पर जम जाते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले बर्फीले द्रव्यमान के नुकसान में दक्षिण एशिया से आने वाले ब्लैक कार्बन की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है। दक्षिण एशिया में मानवीय गतिविधियों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन के हिमालयी क्षेत्र में जमाव में उद्योगों, खासकर ईंट भट्ठों, का योगदान 32 से 42% है।
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सफेद बर्फ पर काली कालिख का असर क्या है?
बर्फ सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस परावर्तित करती है। लेकिन जब उस पर ब्लैक कार्बन जमता है तो बर्फ की सतह ज्यादा गर्मी सोखने लगती है। इससे पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।यही कारण है कि ब्लैक कार्बन को लेकर कार्रवाई जलवायु संकट के दूसरे पहलुओं से कुछ अलग है। वैश्विक तापमान बढ़ने को रोकने के लिए पूरी दुनिया को लंबे समय तक प्रयास करना होगा, लेकिन ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर भी कदम उठाए जा सकते हैं।इसका मतलब यह है कि मैदानी इलाकों में ईंट भट्ठों और औद्योगिक स्रोतों से निकलने वाली कालिख कम करना केवल स्थानीय वायु प्रदूषण घटाने का उपाय नहीं है। इससे हिमालय तक पहुंचने वाले ब्लैक कार्बन को भी कम किया जा सकता है।
पिघलते ग्लेशियर बना रहे हैं नई झीलें
ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके पीछे छोड़े गए गड्ढों में पानी जमा होकर ग्लेशियर झीलें बन सकती हैं। समस्या यह है कि इन झीलों को अक्सर बर्फ, ढीली चट्टानों और मलबे से बनी प्राकृतिक दीवारें रोकती हैं। ये दीवारें मजबूत बांधों जैसी नहीं होतीं।अगर ऐसी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाए तो कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों की ओर बह सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील फटने से आने वाली अचानक बाढ़ कहा जाता है।इसका खतरा केवल जंगलों या दुर्गम पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। नीचे बसे गांव, कस्बे, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी बुनियादी सुविधाएं इसकी चपेट में आ सकती हैं।
189 में 56 झीलें अति-उच्च जोखिम वाली
रिपोर्ट में भारत की 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया है। इनमें 56 झीलों को अति-उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।इसका अर्थ यह नहीं कि इन सभी झीलों से तत्काल आपदा आने वाली है, बल्कि इनके नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए जोखिम का स्तर अधिक है। इसलिए झीलों की लगातार निगरानी, जोखिम मानचित्रण और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
40 हजार ग्लेशियर, निगरानी सिर्फ 0.1% की
हिमालयी संकट के बीच सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह भी है कि वैज्ञानिकों के पास पूरे क्षेत्र की लगातार निगरानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर होने का अनुमान है, लेकिन नियमित निगरानी सिर्फ 0.1% ग्लेशियरों की हो रही है।यानी जिस विशाल क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, उसके बेहद छोटे हिस्से पर ही लगातार नजर है। ऐसे में ग्लेशियरों के आकार में बदलाव, झीलों के फैलाव, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और ढलानों की अस्थिरता जैसे संकेतों को समय रहते पकड़ना चुनौती बना हुआ है।रिपोर्ट ने बेहतर वैज्ञानिक निगरानी, जोखिम मानचित्रण और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत बताई है।
सबसे बड़ा सवाल: आगे नदियों में कितना पानी बचेगा?
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सबसे बड़ा और लंबे समय का असर पानी पर पड़ सकता है। इसे समझने के लिए ‘पीक वाटर’ को समझना जरूरी है।जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो शुरुआती दौर में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहती। ग्लेशियरों में जमा बर्फ लगातार घटती जाए तो एक समय ऐसा आ सकता है जब पिघलने से मिलने वाला अतिरिक्त पानी अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाए। इसके बाद ग्लेशियर छोटा होने के साथ नदी में उसका योगदान भी कम होने लग सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश हिमालयी नदी घाटियों में इस सदी के मध्य तक पीक वाटर की स्थिति आने की आशंका है।यानी आज जिस नदी में ज्यादा पानी दिखाई दे रहा है, जरूरी नहीं कि आने वाली पीढ़ियों को भी उतना ही पानी मिलता रहे।
असर सिर्फ पहाड़ों पर नहीं पड़ेगा
हिमालय से निकलने वाली नदियां मैदानों के लिए जीवनरेखा हैं। इनके पानी से खेती होती है, शहरों और गांवों की जरूरत पूरी होती है और पनबिजली परियोजनाएं चलती हैं। इसलिए ग्लेशियरों में लंबे समय का बदलाव सिंचाई, पेयजल, बिजली, उद्योग और शहरी जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।यही वह बिंदु है जहां हिमालय का संकट सीधे आम आदमी से जुड़ जाता है। पहाड़ पर घटती बर्फ का असर जरूरी नहीं कि अगले दिन दिखाई दे, लेकिन पानी की उपलब्धता में लंबे समय का बदलाव करोड़ों लोगों की जिंदगी और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
हिमालय देश की अर्थव्यवस्था को कितना देता है?
हिमालय भारत के करीब 18% भूभाग में फैला है। देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का करीब 35% हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है। इसके बावजूद हिमालय केवल आपदा और पर्यावरण का क्षेत्र नहीं है।रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र भारत की 20% से अधिक जीडीपी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आधार देता है। खेती, खाद्य उत्पादन, पनबिजली, पर्यटन और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है।पर्यटन का दबाव भी तेजी से बढ़ा है। 2025 में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 40 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे थे। यह संख्या क्षेत्र की कुल आबादी से करीब आठ गुना अधिक थी।
कमाई देशभर को, संरक्षण का बोझ पहाड़ों पर
रिपोर्ट में हिमालयी अर्थव्यवस्था के एक असंतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। प्राकृतिक संपदा और पारिस्थितिकी तंत्र से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का करीब 5% हिस्सा ही पहाड़ी राज्यों के पास रहता है। दूसरी ओर जंगलों की रक्षा, जलस्रोतों का संरक्षण, आपदाओं से निपटना और बदलते पर्यावरण के साथ विकास को संतुलित करना मुख्य रूप से इन्हीं राज्यों की जिम्मेदारी बनती है। इसलिए रिपोर्ट हिमालयी राज्यों के लिए संरक्षण के साथ आर्थिक निवेश और लाभ के बेहतर बंटवारे की जरूरत भी रेखांकित करती है।
अब क्या किया जा सकता है
रिपोर्ट का संदेश केवल खतरे की चेतावनी तक सीमित नहीं है। इसमें हिमालय के लिए विकास के तरीके में बदलाव की जरूरत बताई गई है। ब्लैक कार्बन में कमी, ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना, सूखते हिमालयी झरनों का पुनर्जीवन, जंगलों की बेहतर देखभाल और पर्यटन को क्षेत्र की वहन क्षमता के अनुसार विकसित करना इसके प्रमुख उपाय हैं।रिपोर्ट के अनुसार ऐसे उपायों में किया गया निवेश केवल पर्यावरण संरक्षण पर खर्च नहीं होगा। आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ तथा आपदाओं से होने वाले नुकसान को टालने का लाभ जोड़ें तो हर 1 रुपये के निवेश पर औसतन करीब 8 रुपये का लाभ मिल सकता है।
हिमालय की समस्या सीमाओं में नहीं बंधी
आईसीआईएमओडी के महानिदेशक डॉक्टर पेमा ग्याम्त्शो के मुताबिक हिंदूकुश- हिमालय क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और पर्माफ्रॉस्ट तथा ऊंची पर्वतीय ढलानें अस्थिर हो रही हैं। इससे नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे पर जटिल और एक के बाद एक आने वाली आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।उनके मुताबिक ये खतरे किसी देश की सीमा को नहीं मानते। इसलिए सीमा पार निगरानी, साझा जोखिम संबंधी जानकारी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संयुक्त निवेश जरूरी हैं।ग्रान्थम रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने हिमालय को ‘थर्ड पोल’ यानी तीसरा ध्रुव बताया है। आर्कटिक और अंटार्कटिक की तरह हिमालय भी बर्फ का विशाल भंडार है, लेकिन इसके आसपास और इससे निकलने वाली नदियों के सहारे करोड़ों लोग रहते हैं।
पहाड़ की बर्फ का सवाल, मैदान के भविष्य का भय
हिमालय में आज जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल ग्लेशियरों के सिकुड़ने की कहानी नहीं है। यह पानी, खेती, बिजली, पर्यटन, आपदा और अर्थव्यवस्था के आपस में जुड़े संकट की चेतावनी है।65% तेज हुआ ग्लेशियरों का पिघलना, ब्लैक कार्बन की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी, 56 अति-उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें और सिर्फ 0.1% ग्लेशियरों की नियमित निगरानी,ये आंकड़े बताते हैं कि बदलाव कितना बड़ा है।हिमालय का संभावित ‘टिपिंग प्वाइंट’ इसलिए सिर्फ वैज्ञानिकों की चिंता नहीं है। पहाड़ों में घटती बर्फ का असर आने वाले समय में मैदानों के नल, खेतों की सिंचाई, बिजली की जरूरत और करोड़ों लोगों की आजीविका तक पहुंच सकता है। हिमालय की रक्षा इसलिए पहाड़ बचाने भर का अभियान नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के पानी और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है।
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यह तस्वीर ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म सिस्टेमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायर्नमेंट की रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश- हिमालय क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी जमीन पिघल रही है और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं।रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो इस सदी के अंत तक हिमालयी ग्लेशियरों की मौजूदा मात्रा का 80% तक हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। इसका मतलब सिर्फ पहाड़ों पर कम बर्फ नहीं है। इसका असर उन नदियों और जल प्रणालियों पर भी पड़ सकता है जिन पर दक्षिण एशिया की बड़ी आबादी निर्भर है।
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पहाड़ों की बर्फ पर पहुंच रही मैदानों की कालिख
ग्लेशियरों के पिघलने की कहानी केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। इसमें हवा में मौजूद ब्लैक कार्बन की भी अहम भूमिका है। ब्लैक कार्बन कालिख के बेहद छोटे कण होते हैं, जो ईंधन जलने और औद्योगिक गतिविधियों से निकलते हैं। हवा के साथ ये कण हिमालय तक पहुंचकर बर्फ की सतह पर जम जाते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले बर्फीले द्रव्यमान के नुकसान में दक्षिण एशिया से आने वाले ब्लैक कार्बन की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है। दक्षिण एशिया में मानवीय गतिविधियों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन के हिमालयी क्षेत्र में जमाव में उद्योगों, खासकर ईंट भट्ठों, का योगदान 32 से 42% है।
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सफेद बर्फ पर काली कालिख का असर क्या है?
बर्फ सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस परावर्तित करती है। लेकिन जब उस पर ब्लैक कार्बन जमता है तो बर्फ की सतह ज्यादा गर्मी सोखने लगती है। इससे पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।यही कारण है कि ब्लैक कार्बन को लेकर कार्रवाई जलवायु संकट के दूसरे पहलुओं से कुछ अलग है। वैश्विक तापमान बढ़ने को रोकने के लिए पूरी दुनिया को लंबे समय तक प्रयास करना होगा, लेकिन ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर भी कदम उठाए जा सकते हैं।इसका मतलब यह है कि मैदानी इलाकों में ईंट भट्ठों और औद्योगिक स्रोतों से निकलने वाली कालिख कम करना केवल स्थानीय वायु प्रदूषण घटाने का उपाय नहीं है। इससे हिमालय तक पहुंचने वाले ब्लैक कार्बन को भी कम किया जा सकता है।
पिघलते ग्लेशियर बना रहे हैं नई झीलें
ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके पीछे छोड़े गए गड्ढों में पानी जमा होकर ग्लेशियर झीलें बन सकती हैं। समस्या यह है कि इन झीलों को अक्सर बर्फ, ढीली चट्टानों और मलबे से बनी प्राकृतिक दीवारें रोकती हैं। ये दीवारें मजबूत बांधों जैसी नहीं होतीं।अगर ऐसी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाए तो कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों की ओर बह सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील फटने से आने वाली अचानक बाढ़ कहा जाता है।इसका खतरा केवल जंगलों या दुर्गम पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। नीचे बसे गांव, कस्बे, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी बुनियादी सुविधाएं इसकी चपेट में आ सकती हैं।
189 में 56 झीलें अति-उच्च जोखिम वाली
रिपोर्ट में भारत की 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया है। इनमें 56 झीलों को अति-उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।इसका अर्थ यह नहीं कि इन सभी झीलों से तत्काल आपदा आने वाली है, बल्कि इनके नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए जोखिम का स्तर अधिक है। इसलिए झीलों की लगातार निगरानी, जोखिम मानचित्रण और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
40 हजार ग्लेशियर, निगरानी सिर्फ 0.1% की
हिमालयी संकट के बीच सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह भी है कि वैज्ञानिकों के पास पूरे क्षेत्र की लगातार निगरानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर होने का अनुमान है, लेकिन नियमित निगरानी सिर्फ 0.1% ग्लेशियरों की हो रही है।यानी जिस विशाल क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, उसके बेहद छोटे हिस्से पर ही लगातार नजर है। ऐसे में ग्लेशियरों के आकार में बदलाव, झीलों के फैलाव, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और ढलानों की अस्थिरता जैसे संकेतों को समय रहते पकड़ना चुनौती बना हुआ है।रिपोर्ट ने बेहतर वैज्ञानिक निगरानी, जोखिम मानचित्रण और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत बताई है।
सबसे बड़ा सवाल: आगे नदियों में कितना पानी बचेगा?
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सबसे बड़ा और लंबे समय का असर पानी पर पड़ सकता है। इसे समझने के लिए ‘पीक वाटर’ को समझना जरूरी है।जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो शुरुआती दौर में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहती। ग्लेशियरों में जमा बर्फ लगातार घटती जाए तो एक समय ऐसा आ सकता है जब पिघलने से मिलने वाला अतिरिक्त पानी अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाए। इसके बाद ग्लेशियर छोटा होने के साथ नदी में उसका योगदान भी कम होने लग सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश हिमालयी नदी घाटियों में इस सदी के मध्य तक पीक वाटर की स्थिति आने की आशंका है।यानी आज जिस नदी में ज्यादा पानी दिखाई दे रहा है, जरूरी नहीं कि आने वाली पीढ़ियों को भी उतना ही पानी मिलता रहे।
असर सिर्फ पहाड़ों पर नहीं पड़ेगा
हिमालय से निकलने वाली नदियां मैदानों के लिए जीवनरेखा हैं। इनके पानी से खेती होती है, शहरों और गांवों की जरूरत पूरी होती है और पनबिजली परियोजनाएं चलती हैं। इसलिए ग्लेशियरों में लंबे समय का बदलाव सिंचाई, पेयजल, बिजली, उद्योग और शहरी जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।यही वह बिंदु है जहां हिमालय का संकट सीधे आम आदमी से जुड़ जाता है। पहाड़ पर घटती बर्फ का असर जरूरी नहीं कि अगले दिन दिखाई दे, लेकिन पानी की उपलब्धता में लंबे समय का बदलाव करोड़ों लोगों की जिंदगी और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
हिमालय देश की अर्थव्यवस्था को कितना देता है?
हिमालय भारत के करीब 18% भूभाग में फैला है। देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का करीब 35% हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है। इसके बावजूद हिमालय केवल आपदा और पर्यावरण का क्षेत्र नहीं है।रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र भारत की 20% से अधिक जीडीपी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आधार देता है। खेती, खाद्य उत्पादन, पनबिजली, पर्यटन और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है।पर्यटन का दबाव भी तेजी से बढ़ा है। 2025 में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 40 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे थे। यह संख्या क्षेत्र की कुल आबादी से करीब आठ गुना अधिक थी।
कमाई देशभर को, संरक्षण का बोझ पहाड़ों पर
रिपोर्ट में हिमालयी अर्थव्यवस्था के एक असंतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। प्राकृतिक संपदा और पारिस्थितिकी तंत्र से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का करीब 5% हिस्सा ही पहाड़ी राज्यों के पास रहता है। दूसरी ओर जंगलों की रक्षा, जलस्रोतों का संरक्षण, आपदाओं से निपटना और बदलते पर्यावरण के साथ विकास को संतुलित करना मुख्य रूप से इन्हीं राज्यों की जिम्मेदारी बनती है। इसलिए रिपोर्ट हिमालयी राज्यों के लिए संरक्षण के साथ आर्थिक निवेश और लाभ के बेहतर बंटवारे की जरूरत भी रेखांकित करती है।
अब क्या किया जा सकता है
रिपोर्ट का संदेश केवल खतरे की चेतावनी तक सीमित नहीं है। इसमें हिमालय के लिए विकास के तरीके में बदलाव की जरूरत बताई गई है। ब्लैक कार्बन में कमी, ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना, सूखते हिमालयी झरनों का पुनर्जीवन, जंगलों की बेहतर देखभाल और पर्यटन को क्षेत्र की वहन क्षमता के अनुसार विकसित करना इसके प्रमुख उपाय हैं।रिपोर्ट के अनुसार ऐसे उपायों में किया गया निवेश केवल पर्यावरण संरक्षण पर खर्च नहीं होगा। आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ तथा आपदाओं से होने वाले नुकसान को टालने का लाभ जोड़ें तो हर 1 रुपये के निवेश पर औसतन करीब 8 रुपये का लाभ मिल सकता है।
हिमालय की समस्या सीमाओं में नहीं बंधी
आईसीआईएमओडी के महानिदेशक डॉक्टर पेमा ग्याम्त्शो के मुताबिक हिंदूकुश- हिमालय क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और पर्माफ्रॉस्ट तथा ऊंची पर्वतीय ढलानें अस्थिर हो रही हैं। इससे नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे पर जटिल और एक के बाद एक आने वाली आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।उनके मुताबिक ये खतरे किसी देश की सीमा को नहीं मानते। इसलिए सीमा पार निगरानी, साझा जोखिम संबंधी जानकारी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संयुक्त निवेश जरूरी हैं।ग्रान्थम रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने हिमालय को ‘थर्ड पोल’ यानी तीसरा ध्रुव बताया है। आर्कटिक और अंटार्कटिक की तरह हिमालय भी बर्फ का विशाल भंडार है, लेकिन इसके आसपास और इससे निकलने वाली नदियों के सहारे करोड़ों लोग रहते हैं।
पहाड़ की बर्फ का सवाल, मैदान के भविष्य का भय
हिमालय में आज जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल ग्लेशियरों के सिकुड़ने की कहानी नहीं है। यह पानी, खेती, बिजली, पर्यटन, आपदा और अर्थव्यवस्था के आपस में जुड़े संकट की चेतावनी है।65% तेज हुआ ग्लेशियरों का पिघलना, ब्लैक कार्बन की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी, 56 अति-उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें और सिर्फ 0.1% ग्लेशियरों की नियमित निगरानी,ये आंकड़े बताते हैं कि बदलाव कितना बड़ा है।हिमालय का संभावित ‘टिपिंग प्वाइंट’ इसलिए सिर्फ वैज्ञानिकों की चिंता नहीं है। पहाड़ों में घटती बर्फ का असर आने वाले समय में मैदानों के नल, खेतों की सिंचाई, बिजली की जरूरत और करोड़ों लोगों की आजीविका तक पहुंच सकता है। हिमालय की रक्षा इसलिए पहाड़ बचाने भर का अभियान नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के पानी और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है।