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हाईकोर्ट की टिप्पणी: वोट बेचने वाले लोगों को नेताओं पर सवाल खड़े करने का क्या हक

Thu, 01 Apr 2021 03:13 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, चेन्नई।
एजेंसी, चेन्नई। Published by: Jeet Kumar Updated Thu, 01 Apr 2021 03:13 AM IST
सार

  • - राजनीतिक दलों को भी फटकारा, कहा- बंद कीजिए लुभावने वादों की रेवड़ियां बांटना
  • मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- वादे हमेशा वादे ही रहते हैं। मुफ्त चीजों को छोड़कर ज्यादातर पूरे नहीं किए जाते।

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high court says, stop making breathtaking promises
madras high court - फोटो : social media

विस्तार

तमिलनाडु में मतदाताओं को लुभाने के लिए लुभावनी घोषणाएं करने के प्रचलन पर बृहस्पतिवार को मद्रास हाईकोर्ट बेहद नाराज दिखाई दिया।

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एकतरफ हाईकोर्ट ने राजनीतिक दलों के नेताओं को फटकार लगाते हुए लोक लुभावन वादों की रेवड़ियां बांटना बंद करने को कहा। दूसरी तरफ, मतदाताओं से भी सवाल किया कि क्या अपने वोट बेचने वाले लोगों को नेताओं पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार है?
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अदालत की टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें तिरुनेवल्ली जिले के निवासी एम. चंद्रमोहन ने निर्वाचन अधिकारियों को वसुदेवानल्लूर विधानसभा की आरक्षित सीट को सामान्य वर्ग में तब्दील करने का निर्देश देने की गुहार लगाई थी।
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याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस एन. किरबाकरान और जस्टिस बी. पुगुलेंधी की खंडपीठ ने कहा, हर दल लोकलुभावन वादों के मामले में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करता है। यदि एक दल परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपये महीने की आर्थिक सहायता का वादा करता है तो जवाब में दूसरा दल 1500 रुपये का प्रस्ताव रख देता है।

परिणाम यह हुआ है कि लोगों में मुफ्त में जीवन यापन करने की मानसिकता पैदा होने लगी है। पीठ ने कहा, यह चलन बन गया है कि जो भी बैंक से कर्ज लेता है, उसे लौटाता नहीं है बल्कि चुनावों के दौरान कर्जमाफी की उम्मीद करने लगता है। इस तरह से लोग राजनीतिक दलों के जरिये भ्रष्टाचारी बनाए जा रहे हैं।

पीठ ने कहा कि हर उम्मीदवार चुनाव में करीब 20 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे, क्योंकि बहुत सारे लोग कुछ हजार रुपये, बिरयानी और शराब के लिए अपना वोट बेचकर भ्रष्टाचारी बन रहे हैं।

पीठ ने कहा, यदि लुभावने वादों पर खर्च होने वाला पैसा सही तरीके से नौकरियों के मौके सृजित करने, बेहतर सुविधाओं वाले ढांचागत निर्माण करने और देश में ‘अनाथ’ जैसी हो गई कृषि को प्रोत्साहित करने में खर्च किया जाए तो सही मायने में सामाजिक उत्थान और राज्य की तरक्की होगी।

कैसे करते हैं अच्छे नेताओं की उम्मीद
पीठ ने कहा, जिस तरीके से दल अपने वादे करते हैं, यह अकारण और अनुचित तथा वास्तव में अवांछित है। यह एक सच्चाई है। अगर ऐसा है, तो जनता अच्छे नेताओं की उम्मीद कैसे कर सकती है?


राजनीतिक दलों के वादे करने पर लगे रोक, नहीं तो बढ़ती रहेंगी शराब की दुकानें
पीठ ने कहा, राजनीतिक दलों के चुनावी वादे करने पर रोक लगनी चाहिए, जो सरकारी खजाने पर अतिरिक्त भार बनती हैं। खासतौर पर वित्तीय संकट से जूझ रहे राज्य में ऐसा करना जरूरी है। नहीं तो राजस्व जुटाने के लिए सरकारें शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाती रहेंगी।

दुर्भाग्य से लुभावने वादे नौकरियां सृजन, विकास या कृषि से जुड़े नहीं होते। मतदाता उनके ‘चमत्कारी वादों’ के लोभ में पकड़कर अपना वोट देते हैं। पांच साल में एक बार होने वाला यह तमाशा दशकों से चल रहा है। वादे हमेशा वादे ही रहते हैं। मुफ्त चीजों को छोड़कर ज्यादातर पूरे नहीं किए जाते।
- मद्रास हाईकोर्ट ने कहा

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