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Rajasthan Political Crisis: हाईकोर्ट ने तय किए 13 सवाल, जिसके आधार पर होगी आगे की सुनवाई

Sat, 25 Jul 2020 10:59 AM IST
अवधेश कुमार अमर उजाला  नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला  नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: अवधेश कुमार Updated Sat, 25 Jul 2020 10:59 AM IST
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2020 Rajasthan Political Crisis News: High court decided 13 questions based on which further hearing will be held due to rajasthan political crisis
राजस्थान सियासी संकट - फोटो : self
राजस्थान हाईकोर्ट ने कांग्रेस के बागी नेता सचिन पायलट खेमे को बड़ी राहत देते हुए यथास्थिति को बरकरार रखने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने स्पीकर की अयोग्यता नोटिस पर रोक लगाने के अपने आदेश को बनाए रखा है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि फिलहाल नोटिस पर कार्रवाई नहीं होगी। हाईकोर्ट आगे की सुनवाई जारी रखेगा और इसके लिए उसने कानून के सवालों को तय किया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में आगे की सुनवाई के लिए 13 सवाल तय किए हैं।
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1. सुप्रीम कोर्ट का किहोतो होलोहान 1992 का फैसला सिर्फ ‘क्रॉसिंग ओवर ‘ या दल-बदल को लेकर था या पार्टी के भीतरी असहमति पर भी आधारित था?

2. क्या वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में विशेष रूप से भारत के संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) द्वारा गारंटी प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (1) (ए) उल्लंघन करता है और इस प्रकार शून्य है?
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3. क्या पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जोरदार शब्दों में असहमति या मोहभंग की अभिव्यक्ति संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (1) (ए)  के दायरे में आने वाला आचरण हो सकता है?
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4.  क्या स्पीकर ने जिन आधारभूत तथ्यों पर नोटिस जारी किया है? क्या वे तथ्य सांविधानिक तथ्यों के खिलाफ हैं, क्या वे प्रावधान असांविधानिक हैं?

5.  क्या संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (1) (ए)  के तहत किसी भी विधायक के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में आने वाले तरीके को स्पीकर के अधिकार क्षेत्र से अलग करना चाहिए या नहीं?

6. क्या पार्टी व्हिप के जरिए विधायकों से अपेक्षित कार्यों के लिए सदन के भीतर ही अनुशासन को लागू किया जा सकता है?

7. क्या स्पीकर  इस याचिका में याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सांविधानिकता के मसले पर निर्णय देने की स्थिति में नहीं हैं?

8. क्या स्पीकर द्वारा जारी किया गया नोटिस लोकतंत्र के मर्म का पूर्व-उल्लंघन है और इसका मकसद सत्ता में बैठे व्यक्तियों के खिलाफ असहमति का गला घोंटना है?

9. क्या नोटिस के माध्यम से लोकतांत्रिक तरीके से पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं की आवाज को दबाने की कोशिश है और याचिकाकर्ताओं को धमकी दी जा रही है कि वे ऐसे नेतृत्व के कामकाज पर अपना विरोध जताने के अधिकार को छोड़ दें?

10. क्या दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 (1) (ए) में स्वेच्छा से  राजनीतिक पार्टी की अपनी सदस्यता छोड़ने का अर्थ एक विधायक द्वारा सदन के बाहर मुख्यमंत्री अथवा पार्टी की राज्य इकाई के कामकाज की आलोचना भी है?

11. यदि नंबर 10  का उत्तर हां है, तो क्या पैराग्राफ 2 (1) (ए) संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन नहीं होगा जिसमें अनुच्छेद 19 (1) (ए) यानी अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन भी शामिल है?

12. क्या 14 जुलाई 2020  को नोटिस जारी करने की विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई जल्दबाजी के अलावा प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन, दुर्भावनापूर्ण, शक्ति का दुरुपयोग नहीं है और यह भी पहले ही निष्कर्ष निकाला जा चुका  है?

13. क्या किहोतो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐसा समझा जा सकता है कि उसमें हाईकोर्ट को इन सवालों की जांच करने से रोक दिया है?

राज्यपाल को बुलाना ही होगा सत्र 

राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र के पास विधानसभा सत्र बुलाने की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सिफारिश स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कानून के जानकारों ने शुक्रवार को कहा, राज्यपाल कैबिनेट की सलाह मानने को बाध्य हैं। नबाम राबिया (अरुणाचल प्रदेश) मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के आदेश का हवाला देते हुए वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी और विकास सिंह ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि राज्यपाल कैबिनेट की सलाह मानने को बाध्य है और उन्हें विधानसभा सत्र बुलाना होगा। द्विवेदी ने कहा, सत्र नहीं बुलाने को लेकर राज्यपाल का कोई अधिकार नहीं है। एक बार कैबिनेट सिफारिश करती है तो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट के लिए सत्र बुलाने को बाध्य हैं।

राज्यपाल ने उठाए छह बिंदु

गहलोत कैबिनेट की बैठक में राजभवन द्वारा उठाए गए छह बिंदुओं पर चर्चा हुई। राजभवन द्वारा जिन छह बिंदुओं को उठाया गया है उनमें से एक यह भी है कि विधानसभा सत्र किस तिथि से आहूत किया जाना है, इसका उल्लेख कैबिनेट नोट में नहीं है और न ही कैबिनेट द्वारा कोई अनुमोदन किया गया है।

किहोतो होलोहान मामले में स्पीकर को मिली थी ताकत

1992 के बहुचर्चित किहोतो होलोहान बनाम जचिल्लाहू और अन्य के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत स्पीकर द्वारा की गई अयोग्यता की कार्यवाही में अदालतें दखल नहीं दे सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट सहित कोई भी अदालत विधानसभा स्पीकर या अध्यक्ष को तब तक कोई आदेश नहीं दे सकती है जब तक कि वह विधायकों की अयोग्यता को लेकर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रमुख प्रश्न यह था कि क्या अध्यक्ष को दी गई शक्तिशाली भूमिका ने बुनियादी संरचना के सिद्धांत का उल्लंघन किया है। जैसे कि न्यायिक सिद्धांत। संविधान की कुछ बुनियादी विशेषताओं को संसद द्वारा संशोधनों द्वारा नहीं बदला जा सकता है, जिसे बाद में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में निर्धारित किया गया है।

बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय को भाजपा ने दी चुनौती

 भाजपा विधायक मदन दिलावर ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बसपा के छह विधायकों का कांग्रेस में विलय को रद्द करने की मांग की है। बसपा विधायकों के विलय से कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत बरकरार रखने में मदद मिली है। याचिका पर हाईकोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा। दिलावर ने याचिका में स्पीकर की निष्क्रियता को भी चुनौती दी है, जिन्होंने बसपा के विधायकों को विधानसभा से अयोग्य ठहराने के उनके अनुरोध पर फैसला नहीं किया। स्पीकर ने बीते साल 18 सितंबर को आदेश पारित किया था, जिसमें बसपा के छह विधायकों को कांग्रेस का हिस्सा माने जाने की घोषणा की थी। बसपा विधायक कांग्रेस में ग्रुप के तौर पर शामिल हुए थे ताकि दल बदल विरोधी कानून के तहत उन पर कोई कार्रवाई न हो सके।

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