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Karnataka High Court : एससी भूमि आवंटियों के वारिसों को 50 साल बाद मिलेगी चार-चार एकड़ जमीन, कर्नाटक हाई कोर्ट ने दिया फैसला
Wed, 18 May 2022 10:46 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरू
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Wed, 18 May 2022 10:46 PM IST
सार
इस मामले में भूमि न्यायाधिकरण, सहायक आयुक्त और उपायुक्त के आदेशों को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि कानून और प्रक्रियाएं गरीब याचिकाकर्ता के वैध अधिकारों से वंचित करने के लिए संपन्न लोगों का साधन नहीं बननी चाहिए।
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कोर्ट का फैसला
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने संपत्ति के विवाद में पचास साल बाद फैसला किया है। जिसके बाद कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम के तहत 1972 में चार-चार एकड़ जमीन पाने वाले अनुसूचित जाति के पांच लोगों के वारिसों को आखिरकार 50 साल बाद संपत्ति वापस मिल सकेगी।
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दरअसल, अनुसूचित जाति के लोगों के किरायेदार होने का दावा करने वाले दो व्यक्तियों ने किसी तरह घालमेल करके पूरे 20 एकड़ जमीन का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इस मामले में 50 साल बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए उपायुक्त को निर्देश दिया है कि जमीन के मूल आवंटियों के वारिसों को चार-चार एकड़ जमीन पर कब्जा दिलाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा है कि ये कार्रवाई तीन महीने के भीतर हो जानी चाहिए। गौरतलब है कि इस जमीन के मूल आवंटी मुनिथिम्मा, वरदा, मुनिस्वामी, मुनिस्वामप्पा और चिक्कागुल्लोनु नाम के व्यक्ति थे।
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सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आर देवसास ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामले इस बात की कड़वी सच्चाई पेश करते हैं कि कैसे गरीबों, जिनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है, उन्हें कानूनी उलझनों में और उलझा दिया जाता है। कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला दर्शाता है कि कैसे दलित वर्गों से संबंधित व्यक्तियों के पक्ष में संप्रभु शक्ति द्वारा दिए गए अनुदान पर अमीर और प्रभावशाली लोगों द्वारा कब्जा कर लिया जा रहा है।
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इस मामले में भूमि न्यायाधिकरण, सहायक आयुक्त और उपायुक्त के आदेशों को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि कानून और प्रक्रियाएं गरीब याचिकाकर्ता के वैध अधिकारों से वंचित करने के लिए संपन्न लोगों का साधन नहीं बननी चाहिए।
दरअसल, कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम के तहत उपायुक्त द्वारा 1972 में देवनहल्ली के विश्वनाथपुरा गांव में मुनिथिम्मा, वरदा, मुनिस्वामी, मुनिस्वामप्पा और चिक्कागुल्लोनु को चार-चार एकड़ जमीन दी गई थी। इसके बाद दो व्यक्तियों बायरप्पा और पिल्लप्पा ने 1976 में दावा किया कि वे पांच मूल अनुसूचित जाति अनुदानकर्ताओं के तहत किरायेदार थे। साथ ही उन्होंने पूरे 20 एकड़ जमीन के लिए अधिभोग अधिकार की मांग की।
मामले में भूमि न्यायाधिकरण ने 1980 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया। बाद में आदेश को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय मामला वापस न्यायाधिकरण को भेज दिया था। भूमि न्यायाधिकरण ने 1993 में एक अन्य आदेश में एक बार फिर दावेदारों के अधिभोग अधिकारों के पक्ष में फैसला सुनाया। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में दी गई चुनौती 1997 में खारिज कर दी गई। इसके बाद मूल अनुसूचित जाति अनुदान प्राप्तकर्ताओं के उत्तराधिकारियों ने कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (भूमि के हस्तांतरण का निषेध) अधिनियम के तहत सहायक आयुक्त से संपर्क किया। लेकिन उनका दावा खारिज कर दिया गया। मूल अनुदानकर्ताओं के उत्तराधिकारियों ने इसके बाद 2014 में फिर से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसी मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने ये आदेश दिया है।