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Karmapa: दलाई लामा और करमापा के 'दिल' तो ज्यूरिख में मिल गए, लेकिन नई दिल्ली का कब होगा ह्रदय परिवर्तन?

Sat, 31 Aug 2024 06:28 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 31 Aug 2024 06:28 PM IST
सार

स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में 14वें दलाई लामा और 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे की मुलाकात ने बौद्ध राजनीति में हलचल मचा दी है। करमापा 2017 में भारत सरकार से नाराज होकर अमेरिका चले गए थे और बाद में डोमिनिका की नागरिकता ले ली थी।

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hearts of Dalai Lama and Karmapa met in Zurich, but when will New Delhi change heart
स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में 14वें दलाई लामा और 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

25 अगस्त को स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में 14वें दलाई लामा और 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे के बीच मुलाकात की फोटोग्राफ सामने आईं, जिसके बाद बौद्ध राजनीति में भूचाल सा आ गया है। यह बातचीत इस लिए भी महत्वपू्र्ण है क्योंकि दोनों की मुलाकात 25 जनवरी 2017 को सिक्किम में 34वीं कालचक्र पूजा के दौरान हुई थी। वहीं करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे 2017 में भारत सरकार से नाराज होकर इलाज के बहाने अमेरिका चले गए थे और बाद में उन्होंने कैरेबियाई द्वीप के डोमिनिका राष्ट्रमंडल की नागरिकता ले ली थी। तब से कई बार सरकार उन्हें वापस आने का अनुरोध कर चुकी है। वहीं, नए घटनाक्रम को चीन से भी जोड़ कर देखा जा रहा है क्योंकि चीन वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु के बाद नया दलाई लामा चुन कर  बौद्ध परंपरा को अपने अधिकार में रखना चाहता है। 
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केंद्र में तिब्बत की राजनीति
पिछले कुछ महीनों से तिब्बत राजनीति काफी गरमाई हुई है। इसकी शुरुआत तब हुई जब अप्रैल में धर्मशाला में चल रही तिब्बत की निर्वासित सरकार सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (सीटीए) के प्रधानमंत्री पेंपा शेरिंग ने खुलासा किया था कि वह पर्दे के पीछे से चीन की सरकार से बात कर रहे हैं और यह बातचीत पिछले एक साल से जारी है। वहीं, उसके बाद 20 जून को तिब्बत की आजादी को लेकर अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी समेत विदेशी मामलों के अध्यक्ष माइकल मैकोल समेत सात सांसदों ने दलाई लामा से धर्मशाला में मुलाकात की। जिसके दो दिन बाद ही 22 जन को दलाई लामा अपने घुटनों के ऑपरेशन के लिए अमेरिका चले गए। वहीं, राजनयिक गलियारों में यह कहा जाने लगा कि सिर्फ दो दिन की हो तो बात थी, यह मुलाकात अमेरिका में भी हो सकती थी। इसके लिए भारत को ही क्यों चुना गया?     

वहीं इस घटनाक्रम के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने तिब्बत-चीन विवाद के समाधान को बढ़ावा देने वाले रिजॉल्व तिब्बत एक्ट पर हस्ताक्षर किए। इस एक्ट में तिब्बत पर चीन के जारी कब्जे के शांतिपूर्ण समाधान के लिए दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ बिना किसी पूर्व शर्त के सीधी बातचीत फिर शुरू करने का आह्वान किया गया।  

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स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में 14वें दलाई लामा और 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे - फोटो : अमर उजाला

ज्यूरिख में इसलिए हुई मुलाकात
22 जून को घुटनों के इलाज के लिए अमेरिका जाने से पहले दलाई लामा स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख गए, जिसके बाद वे अमेरिका के लिए रवाना हुए। वहीं, 29 जून को अमेरिका में दलाई लामा के घुटने की सफल सर्जरी होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उसके बाद दलाई लामा का अपने समर्थकों से मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। सरकार में शामिल उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि भारत से जाने के बाद में करमापा डोमिनिका के पासपोर्ट पर जर्मनी में रह रहे हैं, और वहां से ज्यूरिख ज्यादा दूर नहीं है। ज्यूरिख में दलाई लामा के काफी संख्या में समर्थक भी हैं। उन्होंने खुलासा किया कि पहले ये मुलाकात न्यूयार्क में होनी थी, लेकिन इसे बाद में ज्यूरिख शिफ्ट किया गया। यह केवल अनऔपचारिक मुलाकात थी। लेकिन भविष्य के परिदृश्य के हिसाब से बेहद अहम थी। चीन से मुकाबले के लिए तिब्बत धर्म के सभी संप्रदायों का एकजुट होना जरूरी है। करमापा की दलाई लामा से कुछ नाराजगी रही है। वह पहले भी सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (सीटीए) और दलाई लामा पर निशाना साध चुके हैं। उनका गुस्सा भारत सरकार से भी है। एक तरफ सरकार उन्हें 17वें करमापा का दर्जा नहीं देना चाहती, तो दूसरी तरफ उन्हें भारत भी बुलाना चाहती है। वह सिक्किम में अपनी रुमटेक मोनेस्ट्री जाना चाहते हैं, लेकिन सरकार उनके पैर बांधना चाहती है। इसलिए वे भारत आने के ज्यादा इच्छुक नहीं हैं। वहीं दलाई लामा 89 साल को हो चुके हैं और शरीर अस्वस्थ रहता है। अपनी मृत्यु के बाद अगले दलाई लामा को लेकर वे कई बार आशंका जता चुके हैं। वहीं चीन भी इस पर नजरें गड़ाए बैठा है कि दलाई लामा का अगला उत्तराधिकारी साउथ चीन से हो। 

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कौन होगा दलाई लामा का अगला उत्तराधिकारी
इंडिया तिब्बत फ्रेंडशिप के सुरेंद्र ओझा इस मुलाकात को लेकर अमर उजाला से बताते हैं कि दलाई लामा पूरे बौद्ध धर्म के धर्म गुरू हैं। उनका स्थान सर्वोच्च है। वह भी इस बात से चिंतित हैं कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। नया दलाई लामा चुनने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसमें पंचेन लामा और करमापा अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन पंचेन लामा चीन में हैं और वह करमापा को अपने साथ जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। ताकि वह अपना दलाई लामा चुन सके। ओझा कहते हैं कि पूरे तिब्बत की भलाई और एकजुटता का संदेश देते हुए दलाई लामा ने करमापा से मुलाकात की है। वह कहते हैं कि वे इस मुलाकात को इसी परिदृश्य से जोड़ कर देखते हैं। 

इसलिए और बढ़ गया है करमापा का महत्व
वहीं, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रहमा चेलानी के मुताबिक दलाई लामा चीन के "व्हाइट व्हेल" हैं। वर्तमान दलाई लामा - जिन्हें 1937 में दो साल की उम्र में दलाई लामा के तौर पर में पहचान मिली थी, वे 1951 में चीन के तिब्बत पर कब्जा करने के बाद से ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की आंखों में खटक रहे हैं। वह कहते हैं कि दलाई लामा पहले भी घोषणा कर चुके हैं कि वे पुनर्जन्म न लेने का विकल्प चुन सकते हैं। इससे चीन का दावा कमजोर होता है। चीन उनके निधन का बेसब्री से इंतजार कर रहा है, ताकि वह किसी कठपुतली उत्तराधिकारी को स्थापित कर सके। वह कहते हैं कि यह पहली बार नहीं होगा जब चीन ने तिब्बती बौद्ध धर्म के किसी नेता को चुना हो। 1995 में, उसने छह साल के लड़के असली पंचेन लामा का अपहरण करने के बाद अपने स्वयं के पंचेन लामा का अभिषेक किया, जिसका आध्यात्मिक स्थान दलाई लामा के बाद दूसरे स्थान पर है। वहीं असली पंचेन लामा की पुष्टि खुद दलाई लामा ने की थी। इसके बाद चीन ने तिब्बती बौद्ध धर्म के तीसरे सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक नेता और कर्मा काग्यू संप्रदाय के प्रमुख करमापा को भी नियुक्त किया। लेकिन 1999 में, 14 साल की उम्र में ओग्येन त्रिनले दोरजे भाग कर भारत आ गए। बता दें, कि भारत में उन पर चीनी एजेंट होने का संदेह किया गया। उन्हें धर्मशाला तक ही सीमित कर दिया गया। जिसके बाद वे यहां से भाग निकले औऱ विदेश जाकर बस गए। चूंकि दलाई लामा द्वारा मान्यता मिलने के बाद पंचेन लामा चीन की हिरासत में हैं, इसलिए करमापा का महत्व और भी बढ़ गया है।  

काग्यू संप्रदाय की नाराजगी को करमापा ने ऐसे किया दूर
सरकार के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि दलाई लामा ने करमापा से मुलाकात की और आपसी मतभेदों को दूर करने की कोशिश की, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन इस क्षणिक मुलाकात के सारे फोटो सार्वजनिक नहीं करने चाहिए थे। ऐसा क्यों किया गया, इस पर तो उन्होंने कुछ नहीं बोला। लेकिन एक फोटो से कर्मा काग्यू संप्रदाय में जरूर नाराजगी पैदा हो गई है। जिसे भांपते हुए करमापा ने दो दिन पहले अपने काग्यू संप्रदाय के लिए एक संदेश जारी किया। जिसमें वे लिखते हैं कि दलाई लामा कभी भी काग्यू परंपरा के सदस्य नहीं रहे हैं और इसलिए वे कर्मा कामत्संग मान्यता की औपचारिक वंशावली परंपराओं का हिस्सा नहीं हैं। पूज्य करमापा ने सात साल बाद परम पावन से व्यक्तिगत रूप से मिलने के अपने गहन अनुभव को एक मधुर-कड़वी मुलाकात बताया। बयान में कहा गया, "उन्हें टेलीविजन पर देखने के विपरीत, इस बार उन्हें व्यक्तिगत रूप से देखने से पता चला कि वे कितने बूढ़े हो गए हैं। बोलते समय भी उनकी आवाज पहले की तुलना में काफी कमजोर थी। उन्होंने चीन के पवित्र पर्वत माउंट वुताई की तीर्थयात्रा करने की अपनी इच्छा जाहिर की, जिसे देखने की उनकी लंबे समय से इच्छा रही है। करमापा ने तिब्बतियों से आग्रह किया कि वे तुच्छ चिंताओं को अलग रखें और क्षेत्रीय संबद्धता, धार्मिक संप्रदायों या भिन्न दृष्टिकोणों की परवाह किए बिना तिब्बत के व्यापक हित पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने कहा कि हमें याद रखना चाहिए कि हमें एक लामा का आशीर्वाद मिला है, जो एक इच्छा-पूर्ति करने वाले रत्न की तरह हैं। मैं सभी से आग्रह करता हूं कि वे धर्म के संरक्षण और तिब्बती लोगों के कल्याण के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम करें। 

hearts of Dalai Lama and Karmapa met in Zurich, but when will New Delhi change heart
स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में 14वें दलाई लामा और 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे - फोटो : अमर उजाला

क्या भारत आएंगे करमापा? 
क्या करमापा भारत आएंगे इस पर भारत सरकार के सूत्र बताते हैं कि सरकार उन्हें मनाने की कई कोशिशें कर चुकी है। करमापा ने डोमिनिकन गणराज्य की नागरिकता लेने के बाद 2018 में भारतीय वीजा के लिए आवेदन किया था, लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इसे मंजूर नहीं किया। जब वे भारत छोड़ कर गए थे, तो विदेश मंत्रालय के अधिकरियों ने अमेरिका जाकर करमापा से मुलाकात कर उनका मान मन्नौवल करने की कोशिश भी की थी। करमापा का मठ स्थापित करने के लिए दिल्ली के द्वारका में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास 5 एकड़ जमीन देने की भी पेशकश की थी। सूत्र कहते हैं कि दिसंबर 1999 में तिब्बत के Tsurphu में स्थित एक मठ से भागे हुए करमापा को 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन हालात जस के तस हैं। भारत इस बात से नाराज है कि उन्होंने अपने नए पासपोर्ट के बारे में अधिकारियों को सूचित करने की जहमत नहीं उठाई, जबकि वह दशकों से भारत में मेहमान रहे हैं। वहीं, करमापा इस बात से परेशान हैं कि उन्हें हर बार यात्रा करने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है, जबकि दलाई लामा बिना किसी प्रतिबंध के कहीं भी यात्रा करने के लिए स्वतंत्र हैं। 

सरकार का ये है नया ऑफर!
सूत्रों का कहना है कि हाल ही में करमापा को नई डील ऑफर की गई है। इस डील में इस बार उन्हें द्वारका की बजाय नोएडा में मोनेस्ट्री बनाने के लिए 10 एकड़ जमीन और पांच साल का वीजा देने का ऑफर किया गया है। सूत्रों का कहना है कि वे जब चाहें भारत आ सकते हैं। लेकिन एकमात्र शर्त यह है कि वे तिब्बती शरणार्थियों को भारत की तरफ से जारी किए गए आवासीय प्रमाण पत्र (आरसी) पर वापस नहीं आ सकते, बल्कि भारतीय वाणिज्य दूतावास या मिशन में वीजा के लिए आवेदन करके वापस आ सकते हैं, क्योंकि उन्होंने दूसरे देश की नागरिकता हासिल कर ली है। साथ ही, यह शर्त भी रखी गई है कि वे सिक्किम स्थित रुमटेक मोनेस्ट्री नहीं जा सकेंगे। तिब्बती लामाओं की दलील है कि करमापा की गद्दी भारत के सिक्किम में रूमटेक मठ में है। इसलिए वह भारत से बाहर रह कर उस गद्दी के सही वारिस नहीं बने रह सकते। सूत्रों ने बताया कि करमापा 14 साल की उम्र में नेपाल के रास्ते भारत भाग आए थे। वे 5 जनवरी, 2000 को मैक्लोडगंज में तिब्बती निर्वासित सरकार के पास पहुंचे। उस साल, सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने एक आदेश पारित एक सरकार की पूर्व अनुमति के बिना करमापा की कुछ क्षेत्रों में यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। इनमें सिक्किम में रुमटेक मठ और हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में लाहौल और स्पीति जैसे रणनीतिक महत्व के क्षेत्र शामिल थे। बता दें कि रुमटेक मठ में "ब्लैक हैट" रखी हुई है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह कर्मा काग्यू संप्रदाय के असली उत्तराधिकारी की धरोहर है। सूत्रों का कहना है कि सरकार को भी अपना हृदय परिवर्तन करना चाहिए और सोचना चाहिए कि दलाई लामा के बाद अब कौन?

करमापा जनवरी 2011 में उस समय विवादों में घिर गए थे, जब हिमाचल प्रदेश के बॉर्डर पर स्थित ऊना में उनके ड्राइवर और धर्मशाला के एक कारोबरी की कार से एक करोड़ रुपये बरामद हुए थे। बताया जाता है कि यह राशि एक जमीनी सौदे को अंजाम देने के लिये लाई जा रही थी। इसके बाद विभिन्न ठिकानों में मारे गये छापों में करीब 26 देशों की करंसी के छह करोड़ रुपये की राशि बरामद की गई थी।

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