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अयोध्या मामला संविधान पीठ को भेजने की मांग पर भिड़े हिंदू-मुस्लिम पक्षकार

Sat, 28 Apr 2018 04:40 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 28 Apr 2018 04:40 AM IST
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Hearing on Ayodhya case has begun in Supreme Court

अयोध्या विवाद मामले को संविधान पीठ को भेजने संबंधी मांग पर हिंदू और मुस्लिम पक्षकार आमने-सामने आ गए हैं। मुस्लिम पक्षकार मामले को संविधान पीठ को सौंपे जाने के पक्ष में हैं जबकि हिंदू पक्षकारों का कहना है कि यह विशुद्ध रूप से भूमि विवाद का मामला है, ऐसे में इसे बड़ी पीठ के पास भेजने का कोई औचित्य नहीं है। 

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सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष हिंदू पक्षकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय पीठ कर रही है, इसलिए उसे ही सुनना चाहिए। 
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मामले के राजनीतिक या धार्मिक रूप से संवेदनशील होने का मतलब यह नहीं है कि उसे बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था या प्रचलन है कि जब किसी हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा पारित आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाती है कि तो उस अपील पर दो सदस्यीय पीठ की बजाए तीन सदस्यीय पीठ ही सुनवाई करती है। 
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रामलला विराजमान की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के. परासरन ने भी साल्वे की दलीलों पर सहमति जताई और कहा कि इस मामले को तीन सदस्यीय पीठ को ही सुनवाई करनी चाहिए। 

उन्होंने कहा कि यह मामला इतना पेचीदा नहीं है कि बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। मामले की सुनवाई संविधान पीठ में करना न तो कानूनी रूप से सही है और न ही व्यावहारिक रूप से। अब यह किसी समुदाय का मामला नहीं रह गया है। यह एक जमीन विवाद है। इसके लिए कभी पांच, कभी सात और कभी नौ जज की पीठ बनाने की बात करना उचित नहीं है क्योंकि इसका कोई अंत नहीं है। इस मामले का जल्द निपटारा होना चाहिए। अदालत का भी यह मकसद होता है कि जनता के पैसे का फिजूल खर्च न हो।

वहीं मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। यह मामला राष्ट्रीय महत्व का है। 


मामले को अनूठा बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे देश की सामाजिक संरचना जुड़ी हुई है। इस पर साल्वे ने कहा कि देश 1992 से आगे निकल चुका है। राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़े मुद्दे पर चर्चा अदालत से बाहर करनी चाहिए। अयोध्या मुद्दे पर आगे की बहस 15 मई को होगी।

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