बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन बनाने के लिए काम कर रहा स्वास्थ्य विभाग
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हिंदुस्तान के समाज की यह विचित्र विषमता है कि यहां मोबाइल फोन का प्रयोग तो गांव-गांव में तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल में यह अभी भी कोसों दूर है। ग्रामीण इलाकों की बात छोड़ दें, दिल्ली जैसे महानगरों में भी महिलाओं का केवल सत्तर फीसद से कुछ ही अधिक हिस्सा नैपकिन का इस्तेमाल करता है। ग्रामीण महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा पचास फीसद भी नहीं है। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि इससे सीधे महिलाओं का शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है जो अंततः पूरे परिवार के लिए परेशानी का कारण बनता है।
इसी बीच, सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च को ऐसे सैनिटरी नैपकिन विकसित करने के लिए कहा है जो सस्ते होने के साथ-साथ बायोडिग्रेडेबल हों यानी उन्हें बनाने में ऐसे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाए जो समय के साथ नष्ट हो सकें। विभाग इस तरह के उत्पाद को विकसित करने में जुट गया है। सभी महिलाओं के बीच इसे लोकप्रिय बनाने के लिए भी विभाग रणनीति बना रहा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय में ज्वाइंट डायरेक्टर वंदना गुरानी ने मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि केले, जूट और कपड़ों के धागों से नैपकिन तैयार करने की कोशिश कई स्तरों पर चल रही है। कई निजी कंपनियां और एनजीओ इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं जिसका परिणाम बेहतर आ रहा है, लेकिन इसे और बेहतर बनाए जाने का प्रयास चल रहा है। गुरानी ने बताया कि अकेले भारत में सैनिटरी पैड्स के प्रयोग से प्रतिवर्ष एक लाख तीस हजार टन कचरा पैदा हो रहा है।
सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही इस आंकड़े में और बढ़ोतरी होने का अनुमान है। इसलिए सैनिटरी पैड्स को बायोडिग्रेडेबल बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि बायोडिग्रेडेबल उत्पाद महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी अनुकूल होंगे। प्लास्टिक के इस्तेमाल से महिलाओं को अन्य परेशानियां पैदा होने का खतरा बना रहता है।
'ऐश ट्रे हो तो सैनिटरी नैपकिन क्यों नहीं'
प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना गीता रामचंद्रन ने अमर उजाला से कहा कि अपने काम के सिलसिले में उन्हें लगातार दूर-दराज क्षेत्रों में जाना पड़ता है, लेकिन दुर्भाग्य है कि महिलाओं को कार्यक्रम के लिए बुलाने के बाद भी कई जगहों पर सैनिटरी नैपकिन की व्यवस्था नहीं होती जबकि यह बात सबको मालूम है कि हर महिला को हर महीने में चार से पांच दिन इस परिस्थिति से गुजरना पड़ता है। रामचंद्रन के मुताबिक, टेबल पर सिगरेट की राख रखने के लिए ऐश ट्रे तो हर जगह देखने को मिल जाते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए इतनी सामान्य चीजों का न होना उन्हें बहुत परेशान करता है और कई बार इसके कारण उनकी टीम के सदस्यों को बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है।