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Manipur: मणिपुर की हिंसा रोक सकते हैं 'हैड हंटर' और 'गांव बूढ़ा', पढ़ें बीएसएफ के पूर्व एडीजी से खास बातचीत

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 16 Sep 2024 02:13 PM IST
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सार
अमर उजाला डॉट कॉम ने बीएसएफ के पूर्व एडीजी और सुरक्षा विशेषज्ञ, एसके सूद से विस्तृत बातचीत की है। एसके सूद ने बताया, मणिपुर में 16 माह से हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। मणिपुर में पिछले साल जब मई में यह स्थिति पैदा हुई, तभी वहां की सरकार को बर्खास्त करना चाहिए था। वहां पर राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए था।
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Head Hunter and Village Old Man can stop violence in Manipur read special interview with former BSF ADG
Manipur - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

मणिपुर में 16 महीने से रुक रुक कर हिंसा जारी है। मैतेई और कुकी, ये दोनों समुदाय एक दूसरे के क्षेत्रों में जाकर हमला करते हैं। सुरक्षा बलों ने इनके बीच बफर जोन बनाया है, लेकिन उसके बावजूद हमला हो जाता है। पिछले दिनों पहली बार ड्रोन से हमला किया गया। लोकल स्तर पर तैयार रॉकेट लॉन्चर, जिसे 'पोंपी' कहा जाता है, उपद्रवियों ने इसका भी इस्तेमाल किया है। इतने लंबे समय से मणिपुर में हिंसा का दौर थम नहीं रहा है। 





कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि सीएम एन. बीरेन सिंह को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया जाए। बीएसएफ के पूर्व एडीजी और सुरक्षा विशेषज्ञ, एसके सूद बताते हैं, मणिपुर की हिंसा रोक सकते हैं। इसके लिए हमें एक ठोस इच्छाशक्ति दिखानी होगी। 'हैड हंटर' यानी नागा और 'गांव बूढ़ा' को साथ लेकर मैतेई व कुकी, दोनों समुदायों से बात करनी होगी। इसके लिए पहली शर्त, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना होगा। कुछ जगहों पर सुरक्षा बलों को सशस्त्र सेना विशेधाधिकार कानून (अफस्पा) के दायरे में लाना पड़ेगा। 

आखिर मणिपुर में शांति बहाल, क्यों नहीं हो पा रही है। वहां शांति स्थापित करने की दिशा में कौन से कारगर कदम उठाए जाएं? इस बाबत अमर उजाला डॉट कॉम ने बीएसएफ के पूर्व एडीजी और सुरक्षा विशेषज्ञ, एसके सूद से विस्तृत बातचीत की है। एसके सूद ने बताया, मणिपुर में 16 माह से हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। मणिपुर में पिछले साल जब मई में यह स्थिति पैदा हुई, तभी वहां राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए था। सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। केंद्र सरकार ने वहां पर एक सुरक्षा सलाहकार नियुक्त कर दिया। वे वहां के नहीं हैं। उन्हें डे टू डे पुलिस कार्यप्रणाली का नहीं पता, भले ही उन्हें रिपोर्ट की जाती है। राष्ट्रपति शासन लागू होगा और जब पूरी स्थिति, केंद्र सरकार के नियंत्रण में होगी तो ही मौजूदा हिंसा पर काबू करने में मदद मिलेगी। 

सूद के मुताबिक, केंद्र सरकार ने मणिपुर वेली के 19 पुलिस थानों के क्षेत्र में सशस्त्र सेना विशेधाधिकार कानून (अफस्पा) लागू नहीं किया। वहां निवास करने वाले मैतेई समुदाय के पास हथियार हैं। पुलिस एवं आईआरबी से हथियार लूटे गए थे। उन हथियारों को बरामद करने के लिए सुरक्षा बलों के पास सर्च की पावर नहीं हैं। यदि वहां पर अफस्पा लागू होगा तो सुरक्षा बल कहीं पर भी जाकर सर्च कर सकते हैं। वहां पर मौजूद सेना, सीआरपीएफ
व बीएसएफ के हाथ खुले नहीं हैं। 

सरकार एवं सुरक्षा बलों पर लोगों को विश्वास नहीं है। इनके प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है। इस सवाल के जवाब में सूद ने कहा, मौजूदा स्थिति में सुरक्षा बलों को वहां से हटाना संभव नहीं है। वहां पर जो खराब हालात बनें हैं, उसके लिए सरकार का इनएक्टिव रहना है। सुरक्षा बलों को वहां से हटाना संभव नहीं है। अगर इन्हें हटाते हैं तो दोनों समूह, एक दूसरे के क्षेत्रों में जाकर मार काट मचा देंगे। अभी जो कुछ शांति वहां पर हुई है, उसके पीछे दोनों समुदायों को अलग किया गया है।

सूद ने बताया कि जैसे अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बेरियर या बफर जोन बनाए जाते हैं, वैसी ही स्थिति मणिपुर में है। ऐसे प्रोटोकॉल हैं कि दोनों समुदाय एक दूसरे के क्षेत्र में नहीं जा सकते। यहां तक कि सुरक्षा बलों को जब एक दूसरे जोन में जाना होता है तो वहां भी पूरा चेक होता है। एक तरह से सिविल वॉर की स्थिति रहती है। मुख्यमंत्री पर किसी भी समुदाय, मैतेई और कूकी, दोनों का ही विश्वास नहीं है। आम लोगों के दिमाग में यह बात बैठ चुकी है कि मणिपुर की मौजूदा स्थिति के लिए वही यानी मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह जिम्मेदार हैं। वे 16 माह से स्थिति को नहीं संभाल पाए हैं। वहां पर राष्ट्रपति शासन लागू कर सुरक्षा बलों को सशस्त्र सेना विशेधाधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। बाहर से लोग वहां पर आ रहे हैं। इसके लिए सीमा पर मजबूत सुरक्षा घेरे का होना आवश्यक है। 

बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, अभी वहां पर प्रमुख तौर से असम राइफल है। बाहर से आने वाले लोगों को रोकने के लिए सीमा पर सुरक्षा बढ़ाना जरुरी है। मौजूदा समय में असम राइफल जैसे सुरक्षा करती है, वह बहुत प्रेक्टिल नहीं है। इसके पीछे कई वजह हैं। बीएसएफ, एसएसबी या दूसरे बल जिस तरह से बॉर्डर की सुरक्षा करते हैं, वैसा असम राइफल के साथ देखने को नहीं मिलता। ये बल 'बॉर्डर आउट पोस्ट' लगाकर सुरक्षा करते हैं, जो बॉर्डर के बहुत निकट होती है। वहां से वे पेट्रोलिंग कर सकते हैं। बॉर्डर गार्ड करने के लिए असम राइफल की संख्या कम है। दूसरा, आंतरिक सुरक्षा में भी इस बल को लगाया जाता है। वहां के बॉर्डर की रिमोटनेस और जो ह्यूमन ज्योग्राफी है, उसमें बॉर्डर के आसपास दोनों तरफ लोग रहते हैं। उनमें आपसी मिलाप रोकने के लिए 24 घंटे की सर्विलांस जरुरी है। यह आज के हालात में संभव नहीं है।

असम राइफल का आपरेट करने का तरीका भी अलग है। इसमें एक कंपनी को पीछे बेस पर रखा जाता है। जब तक वहां से सूचना मिलती है, उग्रवादी या घुसैपठिये, निकल जाते हैं। 

वहां पर बॉर्डर की सुरक्षा के लिए एक नियमित फोर्स लगानी चाहिए। यह तुरंत संभव न हो, लेकिन लंबी अवधि के लिए ये बहुत आवश्यक है। बॉर्डर पर फेंसिंग बाबत सभी की अलग राय है। मिजोरम के सीएम ने कहा है कि हम फेंस नहीं लगाने देंगे। एक दशक पहले उन्होंने मोरे के इलाके में फेंस लगाने की कोशिश की थी, जिसका विरोध हुआ था। अगर आज हम फेंसिंग लगानी शुरु करें तो वह एकाएक संभव नहीं है। म्यांमार के साथ लगती 16 सौ किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने में दस पंद्रह साल लग जाएंगे। वहां की इकोलॉजी भी खराब होगी। बहुत सी जगहों पर बाड़ का ज्यादा फायदा नहीं होगा। वजह, बॉर्डर क्षेत्र में बहुत सघन आबादी रहती है। कुछ लोगों के घर तो बॉर्डर के दोनों तरफ हैं। ऐसे में बाड़ लगाना आसान नहीं है। 

सुरक्षा बलों के आपसी विवाद पर पूर्व एडीजी सूद ने कहा, पुलिस व असम राइफल के बीच ऐसा हुआ है। ऐसे आरोप लगे थे कि असम राइफल, कुकी को मदद दे रही थी। ये आरोप सही नहीं हैं। असम राइफल में लगभग सत्तर प्रतिशत लोग बाहर के हैं। बाकी के तीस प्रतिशत उत्तर पूर्व के हैं। इनमें मणिपुर के मुश्किल से दस प्रतिशत होंगे, जिनमें कुकी और मैतेई दोनों समुदायों के लोग शामिल हैं। पुलिस को लेकर ऐसे आरोप लगाए हैं कि वह किसी एक समुदाय को स्पोर्ट कर रही है। हथियार लूटने में भी ऐसे गंभीर आरोप लगे थे कि एक समुदाय की पुलिस ने मदद की है। 

मणिपुर में स्थिति कैसे संभल सकती है, इस बारे में सूद ने एक अहम बात कही है। सबसे पहला काम हिंसा को पूरी तरह रोकना होगा। दोनों समुदायों के बीच बातचीत प्रारंभ करानी होगी। इस बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए हैड हंटर यानी 'नागा' समुदाय की मदद ली जाए। वे अभी तक इस विवाद में तटस्थ हैं। उत्तर पूर्व में 'नागा' समुदाय के लिए हैड हंटर शब्द इस्तेमाल किया जाता रहा है। दशकों पहले जब नागा किसी लड़ाई या युद्ध का हिस्सा बनते तो इनके बारे में कहा जाता था कि ये लोग दुश्मन का सिर काटकर लाने के लिए जाने जाते हैं। ये दुश्मन पर धावा बोलकर उसका सिर काट देते थे। इनसे सब लोग डरते थे। इसके अलावा पूरे नॉर्थ ईस्ट में विलेज हेड, जिन्हें 'गांव बूढ़ा' कहां जाता है, इन्हें बहुत इज्जत दी जाती है। इनके साथ बातचीत करें। वे लोग, हिंसा रोकने में बहुत बड़ी मदद कर सकते हैं। पहले हिंसा रोकी जाए।

इसके बाद वहां होने वाले ड्रग्स के उत्पादन को रोकना होगा। इसकी जगह पर दूसरे उत्पादों का विकल्प देना होगा। वहां रबड़ प्लांटेशन को लेकर रिसर्च की जाए। टी कॉपी उत्पादन हो सकता है। इस तरह से उन लोगों को अपनी आजीविका का एक ठोस साधन मुहैया कराया जा सकता है। रिमोट एरिया में सरकार की उपस्थिति दिखनी चाहिए। वहां के विकास को गति दी जाए। आधुनिक हथियारों की मौजूदगी पर सूद ने कहा, यह एक चुनौती है। पिछले दिनों ड्रोन हमला हुआ है। रॉकेट लांचर का लोकल मॉडल 'पोंपी' देखने को मिला है। ड्रोन, कहीं भी उपलब्ध हो जाता है। म्यांमार आर्मी के खिलाफ वहां के विद्रोहियों ने इसका खूब इस्तेमाल किया है। इंटेलिजेंस बहुत अहम है। जब तभी प्रभावी होगी, जब लोग आपस में मिलना जुलना या बातचीत शुरु करेंगे। अभी कुकी समुदाय अलग है और मैतेई समुदाय अलग है। ये अपने बारे में कोई खबर नहीं देंगे। यहां पर मानवीय इंटेलिजेंस बहुत मुश्किल है। ऐसे में तकनीकी इंटेलिजेंस पर ही निर्भर रहना होगा। 

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