हरियाणा का 'ट्रेजडी किंग': सीएम बनने के लिए मोदी से टक्कर लेने को हैं आमदा, सियासत के चक्कर में दांव पर लगा रहे बेटे की सांसदी!
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विस्तार
हरियाणा की राजनीति में 'ट्रेजडी किंग' कहे जाने वाले चौ. बीरेंद्र सिंह, एकाएक सक्रिय हो उठे हैं। खासतौर पर, पंजाब में 'आप' की बंपर जीत के बाद चौ. बीरेंद्र सिंह ने शुक्रवार को अपने गृह जिले जींद के उचाना में शक्ति प्रदर्शन कर दिया। हालांकि उस कार्यक्रम का नाम 'सार्वजनिक जीवन में बीरेंद्र सिंह के 50 साल' रखा गया था। इस कार्यक्रम में उन्होंने राजनीति में मूल्यों के पतन की आड़ में अप्रत्यक्ष तौर से मोदी सरकार और भाजपा पर निशाना साधा। किसानों की आवाज बनकर उभरने का संकल्प ले डाला। प्रदेश की राजनीतिक नब्ज को पहचानने वाले जानकारों का कहना है, चौधरी साहब पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद उत्साहित 'मोदी' से 'टक्कर' लेने को आमादा हैं। सियासत को 'लव एंड वार' मान बैठे बीरेंद्र सिंह को यह भी ध्यान में रखना होगा कि वे कहीं अपने बेटे की 'सांसदी' को दांव पर तो नहीं लगा रहे। उनके बेटे पूर्व आईएएस ब्रजेंद्र सिंह, हिसार लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद हैं।
कुछ समय पहले चौधरी साहब ने खुद को बताया था 'रिटायर्ड'
चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कुछ समय पहले नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में पूर्व अर्धसैनिकों के एक कार्यक्रम में खुद को रिटायर्ड बताया था। उस वक्त मंच पर बागपत से भाजपा के लोकसभा सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह भी मौजूद थे। उन्होंने डॉ. सत्यपाल सिंह की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि आप लोगों की मांगों पर जितनी सक्रियता मैं दिखा सकता हूं, उतनी ये नहीं दिखा सकते। वजह, मैं तो अब रिटायर्ड हो गया हूं। पूर्व विधायक, सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे चौ. बीरेंद्र सिंह ने कहा, ये तो प्रोटोकॉल में रहते हैं, मैं नहीं। तब यह माना गया था कि बीरेंद्र सिंह, अब राजनीतिक जीवन से दूर हट गए हैं। पंजाब में 'आप' की सत्ता आने के बाद सर चौ. छोटूराम के नाती 74 वर्षीय बीरेंद्र सिंह एकाएक सक्रिय हो उठे हैं।
तभी से 'चौधरी साहब' को कहा जाने लगा 'ट्रेजडी किंग'...
प्रदेश की राजनीतिक नब्ज को पहचानने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार सैनी कहते हैं, इसमें तो कोई दो राय नहीं है कि चौ. बीरेंद्र सिंह ट्रेजडी किंग रहे हैं। नब्बे के दशक में जब भजनलाल हरियाणा के सीएम बने तो उसी वक्त बीरेंद्र सिंह, ट्रेजडी किंग बन गए थे। उन्होंने चुनाव में कड़ी मेहनत की थी। पार्टी अध्यक्ष होने के नाते टिकट बंटवारे में भी उन्हें भरपूर तव्वजो मिली। तब उनकी गिनती राजीव गांधी के करीबी नेताओं में होती थी। साल 1991 में राजीव गांधी की आकस्मिक मौत के कुछ माह बाद जब कांग्रेस पार्टी के लिए सरकार गठन की बारी आई तो भजनलाल बाजी मार ले गए। उस समय राजनीतिक जुगाड़बाजी में भजनलाल का कोई सानी नहीं था। चौ. बीरेंद्र सिंह के करीब से सीएम की कुर्सी निकल गई। इसके बाद 2005 में जब कांग्रेस को प्रदेश में विजय मिली तो लग रहा था कि इस बार चौ. बीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बन सकते हैं। हालांकि चुनाव प्रचार में भजनलाल ने खूब सक्रियता दिखाई थी। उस वक्त एकाएक भूपेंद्र सिंह हुड्डा बाजी मार ले गए। दूसरी बार भी चौ. बीरेंद्र सिंह के हाथ खाली रह गए।
पत्ते नहीं खोले, मगर ये प्रेशर पॉलिटिक्स हो सकती है
रविंद्र कुमार सैनी के मुताबिक, चौ. बीरेंद्र का अचानक सक्रिय होना, किसी दबाव वाली राजनीति का हिस्सा हो सकता है। चूंकि उन्होंने अभी पत्ते नहीं खोले हैं, इसलिए महज आंकलन पर आगे बढ़ा जा सकता है। उनके सामने अपने सांसद बेटे को राजनीति में स्थापित करने की चुनौती है। उचाना, जहां पर उन्होंने शक्ति प्रदर्शन किया है, वहां से मौजूदा डिप्टी सीएम और जजपा प्रमुख दुष्यंत चौटाला विधायक हैं। इस सीट पर पहले बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता विधायक रही हैं। जींद पर जजपा का खासा फोकस है। ये भी एक संभावना है कि चौ. बीरेंद्र अपने बेटे को केंद्र में मंत्री बनवाने के लिए यह सब कर रहे हों।
दूसरा, पंजाब में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत के बाद उन्हें लगता है कि एक बार दोबारा से 'सीएम' की दौड़ में शामिल होना चाहिए। उनके मंच से आप के राज्यसभा सांसद सुशील गुप्ता ने कहा, यदि वे 'आप' में आते हैं तो उनके सारे सपने पूरे हो जाएंगे। उन्होंने चौधरी बीरेंद्र सिंह को आप में शामिल होने का निमंत्रण दे दिया। इस पर बीरेंद्र सिंह ने कहा कि 'स्वागत की धार काढनी है मन्नै, स्वागत तैं आगे की कोई बात करो'। यहां पर उनकी बात का मतलब समझा जा सकता है कि वे राजनीतिक करियर में क्या चाह रहे हैं। प्रदेश में भाजपा से जुड़े एक नेता ने कहा, शुरू में अमित शाह को लगा था कि बीरेंद्र सिंह के पीछे बड़ा जाट वोट बैंक है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में इस बात की पोल खुल गई।
भाजपा को असलियत मालूम है, कौन कितने पानी में है?
रोहतक में भाजपा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं, पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद भी अगर चौ. बीरेंद्र सिंह को कोई मुगालता है तो वे खुद ही समझें। भाजपा, संगठन की बात करती है। चेहरे को तव्वजो नहीं मिलती। भाजपा एक परिवार की पार्टी नहीं है। आरएसएस जैसा बड़ा संगठन, पार्टी की गतिविधियों पर नजर रखता है। बीरेंद्र सिंह के पार्टी छोड़ने से किसी को कोई नुकसान नहीं होगा। वे अपने बेटे को मंत्री बनवाना चाहते हैं, इसलिए शक्ति प्रदर्शन कर पार्टी पर दबाव डाल रहे हैं। पार्टी तो पिछले दो लोकसभा चुनाव में उनका जनाधार देख कर चुकी है। अगर अब वे राजनीति को 'लव एंड वॉर' समझकर आत्मघाती कदम उठाना चाह रहे हैं तो उसके नुकसान के जिम्मेदार भी वही होंगे। उनके सांसद बेटे बृजेंद्र सिंह ने अपने पिता के आप में शामिल होने की संभावनाओं को ठीक नहीं बताया है। उनका कहना है, जींद में चौधरी बीरेंद्र सिंह के सार्वजनिक जीवन में 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम आयोजित किया गया था।