सियासत: कांग्रेस की भूमिका हथियाने की जल्दी में केजरीवाल! अमित शाह का ये फॉर्मूला कितना रहेगा असरदार?
हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर इस कड़ी में एक और नाम के तौर पर शामिल हो गए हैं। उन्होंने सोमवार को तृणमूल कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले ली। राहुल गांधी का खास सिपहसालार रह चुके अशोर तंवर 2019 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल में शामिल हुए थे...
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प्रशांत किशोर ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल को देश के प्रमुख राष्ट्रीय दल की भूमिका में आने में 15 से 20 साल का समय लग सकता है। लेकिन लगता है कि अरविंद केजरीवाल के पास इतना समय नहीं है। वे जल्द से जल्द कांग्रेस को हटाकर देश के प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका हासिल कर लेना चाहते हैं। इसके लिए केजरीवाल राजनीति के हर वो दांव-पेंच आजमाने की कोशिश कर रहे हैं जो देश के प्रमुख विपक्षी दल अब तक आजमाते आए हैं। वे प्रमुख राज्यों में न केवल अपनी पार्टी को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के उन नेताओं को तोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं जो किसी कारणवश अपनी पार्टी से नाराज हैं और एक विकल्प की तलाश कर रहे हैं।
असंतुष्ट नेताओं से कर रहे संपर्क
कभी यह फॉर्मूला अमित शाह का ट्रंप कार्ड माना जाता था। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपना किला मजबूत कर चुनाव जीतने की अपनी इसी रणनीति पर चलते हुए अमित शाह ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, असम, गोवा, मणिपुर और अन्य राज्यों में कमल खिलाने में सफलता पाई थी। अब आम आदमी पार्टी भी उसी रणनीति पर चलने की कोशिश कर रही है। चर्चा है कि आम आदमी पार्टी गुजरात, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के विभिन्न असंतुष्ट नेताओं से संपर्क करने की कोशिश कर रही है। क्या यह रणनीति अरविंद केजरीवाल के लिए भी कारगर साबित होगी?
हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर इस कड़ी में एक और नाम के तौर पर शामिल हो गए हैं। उन्होंने सोमवार को तृणमूल कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले ली। राहुल गांधी का खास सिपहसालार रह चुके अशोर तंवर 2019 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल में शामिल हुए थे। लेकिन भले ही तंवर गोवा में ममता बनर्जी को कोई खास सफलता नहीं दिला सके, लेकिन अपने गृह राज्य हरियाणा में आप के लिए बड़ा करिश्मा करने की क्षमता रखते हैं।
हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेताओं के रहते वे कोई बड़ा उलटफेर भले न कर सके थे, लेकिन कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई के अध्यक्ष और सिरसा से सांसद रह चुके अशोक तंवर हरियाणा में आम आदमी पार्टी को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
जल्दबाजी सही नहीं
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि सियासत की जमीन पर हमेशा कोई सेट फॉर्मूला काम नहीं करता। स्वयं अरविंद केजरीवाल का दिल्ली की राजनीति में सफल होना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उन्होंने शीला दीक्षित की उस सरकार को हराने में सफलता पाई थी, जो अपने शानदार कामकाज के लिए अब तक याद की जाती है। आम आदमी पार्टी और असम गण परिषद की तरह इस देश में अचानक पार्टी बनाकर राज्य स्तर पर कई दल सफल हो चुके हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प बनने के लिए एक बड़ी तैयारी की आवश्यकता होती है।
उनके मुताबिक, अरविंद केजरीवाल को स्वयं अपनी ही गलती से सीखना चाहिए। 2014 में बिना किसी तैयारी के वे लोकसभा चुनाव में उतर गए। इसका परिणाम हुआ कि पंजाब को छोड़कर आप को कहीं सफलता नहीं मिली। इससे उनकी और पार्टी की छवि खराब हुई। यदि इसी तरह वे बिना तैयारी के विभिन्न राज्यों के चुनाव में उतरते रहे और उनके हाथ असफलता मिलती रही तो इससे आम आदमी पार्टी की छवि खराब होगी।
केवल पंजाब की जीत के बाद अरविंद केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विरूद्ध उभरती शक्तियों के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन यदि कुछ राज्यों में लगातार उन्हें असफलता मिली तो यह ‘परसेप्शन’ बदलते देर भी नहीं लगेगी। उन्होंने कहा कि शायद अरविंद केजरीवाल 2024 की तैयारी कर भी नहीं रहे हैं, बल्कि इसी बहाने वे 2029 की राजनीतिक बिसात बिछाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए भी उन्हें बेहद सधे कदम उठाने चाहिए।