{"_id":"6189304ffac95529f7009a48","slug":"harekala-hajabba-orange-vendor-from-karnataka-got-padma-shri-for-contribution-in-rural-education-here-is-all-you-need-to-know","type":"story","status":"publish","title_hn":"शख्सियत: मिलिए कर्नाटक के संतरे बेचने वाले शख्स से, ग्रामीण शिक्षा में योगदान के लिए मिला पद्मश्री","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
शख्सियत: मिलिए कर्नाटक के संतरे बेचने वाले शख्स से, ग्रामीण शिक्षा में योगदान के लिए मिला पद्मश्री
Mon, 08 Nov 2021 07:46 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Mon, 08 Nov 2021 07:46 PM IST
सार
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को 73 व्यक्तियों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया। देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री पाने वाली शख्सियतों में से एक रहे कर्नाटक के हरेकाला हजब्बा...। मंगलूरू में संतरे बेचने वाले इस शख्स को यह सम्मान ग्रामीण शिक्षा में क्रांति लाने के लिए दिया गया है। जानिए इनके बारे में....
विज्ञापन
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्मश्री सम्मान ग्रहण करते हरेकाला हजब्बा
- फोटो : पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कर्नाटक के मंगलूरू के एक संतरा विक्रेता हरेकाला हजब्बा को भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में उन्हें इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा। हजब्बा को यह सम्मान ग्रामीण शिक्षा में अपने योगदान के लिए दिया गया है।
66 वर्षीय हजब्बा को एक स्कूल की स्थापना करके ग्रामीण शिक्षा में क्रांति लाने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्होंने मंगलूरू के हरेकाला-न्युपदपु गांव में एक स्कूल का निर्माण किया था। इस स्कूल में फिलहाल गांव के आर्थिक रूप से कमजोर और संसाधनों से वंचित 175 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
इस घटना के बाद किया स्कूल बनाने का इरादा
साल 1977 से मंगलूरू बस डिपो पर संतरे बेचने वाले हजब्बा खुद अशिक्षित हैं और कभी स्कूल नहीं गए। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का विचार उनके दिमाग में साल 1978 में आया था जब एक विदेशी ने उनके पास आकर अंग्रेजी में संतरे की कीमत पूछी थी। इसी के बाद उन्होंने ग्रामीण शिक्षा में क्रांति लाने का इरादा कर लिया।
विज्ञापन
समाचार एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसाह हजब्बा कहते हैं कि, 'जब विदेशी व्यक्ति ने मुझसे संतरे के बारे में पूछा तो मैं उसे कोई जवाब नहीं दे पाया था। मुझे बुरा लगा था और तभी मैंने गांव में एक स्कूल बनाने का फैसला कर लिया था जिससे गांव की आने वाली पीढ़ियों को ऐसी दिक्कतों का सामना न करना पड़े।'
हजब्बा कहते हैं, 'मैं केवल कन्नड़ जानता हूं, न मुझे हिंदी आती है और न अंग्रेजी। जब मैं उस विदेशी की मदद नहीं कर सका तो मुझे बहुत दुख हुआ। इसके बाद मैंने अपने गांव में एक स्कूल का निर्माण करने के बारे में विचार किया।' अपने गांव में एक स्कूल का निर्माण करने का उनका यह सपना दो दशक में पूरा हो पाया।
परोपराकी कामों से मिली 'अक्षर संत' की उपाधि
अपने परोपकारी कार्य के चलते लोगों ने उन्हें 'अक्षर संत' की उपाधि दी है। उन्होंने स्कूल के निर्माण के लिए पूर्व विधायक (दिवंगत) यूटी फरीद के पास पहुंचे थे। फरीद ने साल 2000 में स्कूल निर्माण की अनुमति दी थी। स्कूल की शुरुआत में यहां 26 विद्यार्थी थे। अब यहां 10वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है और 175 बच्चे यहां पढ़ रहे हैं।
इस काम के लिए उन्हें समय के साथ कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इन पुरस्कारों से मिली राशि का उपयोग वह गांव में और स्कूलों का निर्माण करने में करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, मेरा अगला लक्ष्य अपने गांव में और स्कूल-कॉलेज खोलने का है। मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कॉलेज का निर्माण कराने की अपील की है।
विज्ञापन
66 वर्षीय हजब्बा को एक स्कूल की स्थापना करके ग्रामीण शिक्षा में क्रांति लाने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्होंने मंगलूरू के हरेकाला-न्युपदपु गांव में एक स्कूल का निर्माण किया था। इस स्कूल में फिलहाल गांव के आर्थिक रूप से कमजोर और संसाधनों से वंचित 175 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
विज्ञापन
इस घटना के बाद किया स्कूल बनाने का इरादा
साल 1977 से मंगलूरू बस डिपो पर संतरे बेचने वाले हजब्बा खुद अशिक्षित हैं और कभी स्कूल नहीं गए। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का विचार उनके दिमाग में साल 1978 में आया था जब एक विदेशी ने उनके पास आकर अंग्रेजी में संतरे की कीमत पूछी थी। इसी के बाद उन्होंने ग्रामीण शिक्षा में क्रांति लाने का इरादा कर लिया।
विज्ञापन
समाचार एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसाह हजब्बा कहते हैं कि, 'जब विदेशी व्यक्ति ने मुझसे संतरे के बारे में पूछा तो मैं उसे कोई जवाब नहीं दे पाया था। मुझे बुरा लगा था और तभी मैंने गांव में एक स्कूल बनाने का फैसला कर लिया था जिससे गांव की आने वाली पीढ़ियों को ऐसी दिक्कतों का सामना न करना पड़े।'
हजब्बा कहते हैं, 'मैं केवल कन्नड़ जानता हूं, न मुझे हिंदी आती है और न अंग्रेजी। जब मैं उस विदेशी की मदद नहीं कर सका तो मुझे बहुत दुख हुआ। इसके बाद मैंने अपने गांव में एक स्कूल का निर्माण करने के बारे में विचार किया।' अपने गांव में एक स्कूल का निर्माण करने का उनका यह सपना दो दशक में पूरा हो पाया।
परोपराकी कामों से मिली 'अक्षर संत' की उपाधि
अपने परोपकारी कार्य के चलते लोगों ने उन्हें 'अक्षर संत' की उपाधि दी है। उन्होंने स्कूल के निर्माण के लिए पूर्व विधायक (दिवंगत) यूटी फरीद के पास पहुंचे थे। फरीद ने साल 2000 में स्कूल निर्माण की अनुमति दी थी। स्कूल की शुरुआत में यहां 26 विद्यार्थी थे। अब यहां 10वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है और 175 बच्चे यहां पढ़ रहे हैं।
इस काम के लिए उन्हें समय के साथ कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इन पुरस्कारों से मिली राशि का उपयोग वह गांव में और स्कूलों का निर्माण करने में करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, मेरा अगला लक्ष्य अपने गांव में और स्कूल-कॉलेज खोलने का है। मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कॉलेज का निर्माण कराने की अपील की है।