{"_id":"635e77e3b9069353360a74ef","slug":"gujarat-election-2022-how-effective-will-this-formula-of-aap-failed-in-uttarakhand-and-goa","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gujarat Election 2022: आम आदमी पार्टी का यह फार्मूला कितना होगा कारगर! उत्तराखंड और गोवा में हुआ था फेल","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Gujarat Election 2022: आम आदमी पार्टी का यह फार्मूला कितना होगा कारगर! उत्तराखंड और गोवा में हुआ था फेल
Thu, 03 Nov 2022 12:33 PM IST
निर्मल कांत
आशीष तिवारी, अमर उजाला, अहमदाबाद
आशीष तिवारी, अमर उजाला, अहमदाबाद
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 03 Nov 2022 12:33 PM IST
सार
आप के रणनीतिकारों ने हर चुनाव में यह तय किया कि वह सीएम फेस के साथ ही चुनावी मैदान में उतरेंगे। सिर्फ यही नहीं, आप ने मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, यह पार्टी के नेता नहीं बल्कि प्रदेश की जनता के माध्यम से चुनने का एक नया फार्मूला भी इजाद किया।
विज्ञापन
अरविंद केजरीवाल (फाइल)
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
आम आदमी पार्टी (आप) ने गुजरात में एक बार फिर अपना वही फार्मूला लागू किया है जो उसने हाल में हुए पंजाब, गोवा और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में अपनाया था। पार्टी ने गुजरात में हेल्पलाइन नंबर और ईमेल के माध्यम से जनता जनता से पूछा है कि वह बताएं उनका मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होना चाहिए। इसी पैटर्न पर पंजाब में तो आप ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुनाव जीत लिया था लेकिन गोवा और उत्तराखंड में पार्टी को सफलता हाथ नहीं लगी थी। हालांकि, आप के इस "जनता दांव" से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी दूसरी राजनीतिक पार्टियां अपने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेंगे या नहीं, इस पर अभी संशय बना हुआ है।
विज्ञापन
दरअसल, आप के रणनीतिकारों ने हर चुनाव में यह तय किया कि वह मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ ही चुनावी मैदान में उतरेंगे। सिर्फ यही नहीं, आप ने मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, यह पार्टी के नेता नहीं बल्कि प्रदेश की जनता के माध्यम से चुनने का एक नया फार्मूला भी इजाद किया। बीते कुछ चुनावों में आप में पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में मुख्यमंत्री का चेहरा भी दिया। हालांकि, पंजाब में भगवंत मान का चेहरा देने के बाद पार्टी चुनाव जीत गई। उत्तराखंड और गोवा में वह सफल नहीं हो सके।
विज्ञापन
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ चुनाव मैदान में जाना एक अलग बात है और जनता के माध्यम से मुख्यमंत्री का चेहरा कौन हो, इसका चुनाव कराके सीएम फेस देना दूसरी बात है। राजनीतिक विश्लेषक एके चतुर्वेदी कहते हैं कि जब आप जनता के माध्यम से मुख्यमंत्री के चेहरे को उनके सामने रखती है, तो राजनीति में मनोवैज्ञानिक तौर पर एक संदेश देने में सफल हो जाती है कि आपका सीएम आपके ही सुझाए गए नाम में से होगा। चतुर्वेदी कहते हैं कि इस मामले में अरविंद केजरीवाल दूसरे राजनीतिक दलों से तो आगे निकल जाते हैं। लेकिन, उनकी उपस्थिति ज्यादा राज्यों में नहीं है, इसलिए यह कहना कि उनका यह फार्मूला हिट है, अभी जल्दी होगा।
विज्ञापन
गुजरात में राजनीतिक विश्लेषक अरिंदम दोषी कहते हैं कि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना और मुख्यमंत्री का चेहरा ना घोषित करना चुनाव में जीत की गारंटी नहीं हो सकता है। वो कहते हैं, "बीते कुछ सालों के विधानसभा चुनावों को अगर आप देखेंगे तो भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्यों में मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित किया, बावजूद इसके वहां पर भाजपा ने सरकार बनाई। कई बार मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के बाद भी पार्टियों के लिए यह फायदेमंद नहीं हुआ। आप को ही अगर ले लें तो पाएंगे कि गोवा और उत्तराखंड में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के बाद भी उनको वह सफलता नहीं मिली, जिसकी पार्टी उम्मीद कर रही थी। कांग्रेस में भी ऐसी ही कई बार स्थितियां रहीं।"
हालांकि, अरिंदम दोषी कहते हैं, "अरविंद केजरीवाल के इस फार्मूले का मतलब मुख्यमंत्री का चेहरा देना तो है ही, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जनता को यह बताना चाहते हैं कि उनका नेता भी वही होगा जो जनता पहले से बताएगी।" वह कहते हैं कि यह एक तरीके से पब्लिक से सीधे संवाद करने जैसी स्थिति होती है। ऐसा करके जनता का राजनीतिक पार्टी और लोगों में भरोसा बढ़ता है। उनका कहना है कि आप जैसी नई राजनीतिक पार्टी के लिए ऐसा करके जनता से सीधे जुड़ने का एक बेहतर तरीका होता है।
भाजपा से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि गुजरात की जनता को इस बात का अंदाजा है कि उनकी पार्टी किसी एक व्यक्ति विशेष के दम पर नहीं चलती है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर चलने वाली उनकी पार्टी में लिया गया हर फैसला जनता का ही होता है। गुजरात के पूर्व उपमुख्यमंत्री नितिन भाई पटेल कहते हैं कि वह गुजरात के चुनाव पार्टी नेतृत्व और बूथ स्तर के हर कार्यकर्ता की सहमति से ही सब कुछ होता है। वो कहते हैं कि गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे स्वीकार्य नेता हैं। निश्चित तौर पर हम सभी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ते और गुजरात की जनता एक बार फिर से उन्हीं के नाम और प्रदेश में हुए विकास कार्यों के दम पर वापस सत्ता में आने जा रही है।