Gujarat BJP List: दिग्गजों को भाजपा ने क्यों लगाया किनारे? हिमाचल प्रदेश की तरह बागी न हो जाएं बड़े नेता
Gujarat BJP List: भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव में भी लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुमित्रा महाजन जैसे दिग्गजों का टिकट काट दिया था। उस समय उनकी 75 साल से ज्यादा उम्र होने को टिकट न देने का आधार बनाया गया था। इन नेताओं ने स्वयं ही पत्र लिखकर चुनाव से पीछे हट जाने की घोषणा कर दी थी...
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गुजरात विधानसभा चुनाव (Gujrat Election 2022) के लिए भाजपा ने अपनी पहली सूची जारी कर दी है। पहली सूची में भाजपा ने 160 सीटों के उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। इसमें पहले चरण की 89 सीटें और 71 दूसरे चरण की सीटें शामिल हैं। इस सूची में 13 अनुसूचित जाति, 20 अनुसूचित जनजाति और 14 महिलाओं को टिकट दिया गया है। पार्टी ने मोरबी के वर्तमान विधायक सहित 38 वर्तमान विधायकों का टिकट काट दिया है। भाजपा की इस सूची से ज्यादा चर्चा उन दिग्गजों की हो रही है जिनके नाम इस सूची में शामिल नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपानी, भूपेंद्र चूडासमा और पूर्व उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल सहित कई बड़े चेहरों का टिकट काट दिया गया है।
भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव में भी लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुमित्रा महाजन जैसे दिग्गजों का टिकट काट दिया था। उस समय उनकी 75 साल से ज्यादा उम्र होने को टिकट न देने का आधार बनाया गया था। इन नेताओं ने स्वयं ही पत्र लिखकर चुनाव से पीछे हट जाने की घोषणा कर दी थी। गुजरात में भी विजय रूपानी और नितिन पटेल जैसे दिग्गजों ने स्वयं पत्र लिखकर चुनाव न लड़ने की बात कह दी है। इन दिग्गजों से स्वयं चुनाव न लड़ने का पत्र जारी करवाकर भाजपा किसी अनावश्यक चर्चा को रोकने में भी सफल रहती है।
अमित शाह हैं रणनीतिकार
भाजपा के विषय में यह आम राय है कि एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को कमजोर करने के लिए वह अपने क्षेत्रों में कमजोर प्रदर्शन करने वाले लगभग एक तिहाई उम्मीदवारों का टिकट काट देती है। राष्ट्रीय चुनावों के साथ-साथ भाजपा की यह रणनीति कुछ कमोबेश राज्यों और स्थानीय स्तर के नगर निगमों तक में जारी रहती है। 2017 में दिल्ली नगर निगम में भरी एंटी इनकंबेंसी फैक्टर और अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का मुकाबला पूरी तरह नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर ही किया था। कहा जाता है कि भाजपा के चाणक्य अमित शाह की यह आजमाई हुई रणनीति है जिसे वे समय-समय पर अलग-अलग चुनावों में अपनाते रहे हैं।
पार्टी में कड़े अनुशासन के कारण ज्यादातर जगहों पर पार्टी की इस नीति का विरोध भी नहीं हो पाता है। गुजरात में ही आनंदीबेन पटेल की जगह विजय रूपाणी और उनकी जगह भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाकर सरकार का चेहरा बिना किसी गतिरोध के बहुत आसानी से संपन्न कर लिया गया। अन्य राज्यों में भी यह कार्य बहुत आसानी से संपन्न करा लिया जाता है।
हालांकि, इस मामले में हिमाचल प्रदेश को अपवाद कहा जा सकता है, जहां पार्टी आलाकमान और टिकट न मिलने से नाराज 21 नेताओं ने बागियों के रूप में चुनावी मैदान में ताल ठोंक दी है। अन्य फैक्टर के साथ-साथ बागी भाजपा के लिए इस पहाड़ी राज्य में बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। पार्टी चाहकर भी इस समस्या का कोई समाधान नहीं खोज पा रही है।
इसी प्रकार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के ठीक पहले भारी संख्या में वर्तमान विधायकों के टिकट काटे जाने की बात कही जा रही थी। इससे वर्तमान विधायकों में भगदड़ जैसी स्थिति बनने लगी। कई नेता समाजवादी पार्टी और अन्य दलों में अपना भविष्य तलाशने लगे। कहा जाता है कि इससे पार्टी की अच्छी छवि न बनते देख यह निर्णय वापस ले लिया गया था।
एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को कमजोर करने की कोशिश
गुजरात की राजनीति के जानकार यजुवेंद्र दुबे ने अमर उजाला से कहा कि अमित शाह बहुत सफलतापूर्वक चेहरों को बदलकर एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को कमजोर करते हैं। नए चेहरों के मैदान में आने से लोगों की नाराजगी कम हो जाती है। इस लिस्ट में युवाओं को बड़ी संख्या में टिकट दिया गया है। यह पार्टी का गुजरात में नया नेतृत्व विकसित करने का प्लान भी हो सकता है। यदि ऐसा है तो यह पार्टी के प्रदेश में बेहतर भविष्य के लिए अच्छा कदम कहा जा सकता है। पीएम नरेंद्र मोदी युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय कैबिनेट और विभिन्न राज्यों में भी इस तरह के प्रयोग कर चुकी है। इसे पार्टी के दीर्घकालिक प्लान की तरह समझा जा सकता है।
बागी होने की आशंका कितनी
यजुवेंद्र दुबे के अनुसार गुजरात में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत भारी है। 2002 से लेकर अब तक के चुनाव में पूरे गुजरात में केवल पीएम नरेंद्र मोदी और गुजरात अस्मिता के नाम पर मतदान होता है। प्रदेश में कोई नेता इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि वह अपने दम पर कोई बड़ा असर डाल सके। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश की तरह गुजरात में भाजपा नेताओं के बागी होने की कोई संभावना नहीं है।