संकट में किसान: महाराष्ट्र में 1972 के बाद सबसे बड़ा सूखा, 80 फीसदी फसलें तबाह; जलाशयों में बचा 12 फीसदी पानी
महाराष्ट्र के किसान संकट में हैं। 1972 के बाद सबसे बड़े सूखे का सामना कर रहे इस राज्य में 80 फीसदी फसलें तबाह हो चुकी हैं। जलाशयों में सिर्फ 12 फीसदी पानी बचा है। मराठवाड़ा में किसान मौत को गले लगा रहे हैं। हालात कितने चिंताजनक हैं, जानिए अमर उजाला की इस ग्राउंड रिपोर्ट में
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आसमान से देखने पर मराठवाड़ा भले ही हरा-भरा दिख रहा है लेकिन हकीकत जमीन पर उतरते ही तस्वीर बदल जाती है। खेतों में खड़ी सोयाबीन पीली पड़ चुकी है, कपास की पैदावार रुक गई है, अरहर मुरझा गई है और गन्ना अपनी सामान्य उंचाई तक पहुंचने से पहले ही सूखने लगा है। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के तीन जिले लातूर, बीड और धाराशिव के आसपास के इलाकों में बारिश की बेरुखी ने खरीफ की उम्मीदों को झुलसा दिया है। 80 फीसदी फसलें सूख चुकी हैं। जाहिर है कि किसान बड़े संकट में हैं। पूरे हालात पर नजर डालती ये रिपोर्ट।
इस फसल से तो खर्च भी निकलना मुश्किल, अगली फसल कैसे बोएंगे
मराठवाड़ा। लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव सबसे ज्यादा सूखे से प्रभावित जिले हैं जहां जून से सितंबर के दौरान सामान्य बारिश 679.5 के मुकाबले सिर्फ 424.5 मिलीमीटर हुई। सूखे का यह संकट सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है। इसका असर पशुओं के चारे, ग्रामीण मजदूरी, घरेलू आमदनी और अगली फसल के लिए जरूरी पूंजी पर दिखाई देने लगा है।
लातूर जिले के देवकरा गांव से पीड़ादायक तस्वीर सामने आई है जहां पहली बार किसी किसान ने आत्महत्या की। दो एकड़ जमीन के काश्तकार तुकाराम गुट्टे ने आत्महत्या कर ली। कीनगांव से आगे बढ़ने पर खेतों में खड़ी फसल की जगह सूखा दिखाई देता है। सोयाबीन, कपास, अरहर की फसल सूूखती दिख रही है। हिंगणगांव के किसान तुकाराम अंबाजी 40 एकड़ के किसान हैं। 30 से 35 हजार रुपए प्रति एकड़ खर्च कर चुके हैं। कहते हैं, लगता है खर्च भी नहीं निकलेगा।
डेढ़ लाख खर्च कर बोई फसल हटाने में खर्च होंगे 40 हजार
हगदल गांव के बालाजी मुंडे गन्ने के खेत की ओर इशारा करते हैं। वे बताते हैं कि गन्ना सामान्यतया 20 से 25 फुट तक होता है लेकिन इस बार यह 10 से 12 फुट पर ही रुक गया है और सूख रहा है। मुंडे कहते हैं कि 2025 में अधिक बारिश ने परेशान किया और इस साल बारिश के अभाव ने संकट में ला दिया है। सावरगांव रोकड़े के राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार उगाते हैं।
- 8 एकड़ की उनकी फसल में करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च हुए हैं। अब उसे खेत साफ करने के लिए भी प्रति एकड़ 5 हजार रुपए खर्च करना पड़ेगा। फसल में, कुछ बचेगा तो वह सिर्फ मवेशियों के चारे के काम आ सकता है।
नदी सूखी, जलाशयों में सिर्फ 12 फीसदी पानी
लातूर और बीड जिले में तालाबों में बेहद कम पानी बचा है। माजरा नदी लातूर की जीवनवाहिनी है। लातूर शहर से करीब 70 किमी दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध का जलस्तर बेहद नीचे तक पहुंच चुका है। लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत स्टोरेज करीब 12.5 प्रतिशत रह गया है।
- यहां का नवाबकालीन साइ डैम भी इसी जल इतिहास का हिस्सा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल बताते हैं कि कभी साइ डैम के पानी से लातूर की प्यास बुझती थी। लेकिन अब यह इस्तेमाल में नहीं है। उनका कहना है कि जल रिसाव और पानी के प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो संकट की तीव्रता कम हो सकती थी।
खेती के लिए अब संकट के तीन चरण
लातूर और आसपास के किसानों की बातचीत में 1972 का साल बार-बार सामने आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं। संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही दिखाई देने लगे थे। अब संकट के तीन चरण सामने हैं। पहले बुआई का संकट, फिर फसल बचाने का संकट और अब किसानों के सामने फसल हटाने और अगली खेती के लिए पूंजी जुटाने का संकट सामने है।
संभालने में खर्च होंगे 50 हजार करोड़ रुपये
महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में सूबे के 265 तालुकों के बाद 43 तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में जोड़ा गया है। वहीं, फसल नुकसान के पंचनामें और पानी-चारे की व्यवस्था जैसे उपायों पर चर्चा हुई है।
अधिकारियों का कहना है कि सूखे से निपटने में सरकारी खजाने पर 50 हजार करोड़ का बोझ बढ़ सकता है। लेकिन, खेतों में खड़े किसानों को फसल नुकसान की भरपाई, पानी-चारे की व्यवस्था जैसे उपायों के अलावा अगली फसल तक परिवार चलाने के लिए आय के सहारे की सख्त जरूरत है।