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जवाहर बाग को 99 साल की लीज पर देने की तैयारी में थी सरकार

Tue, 07 Jun 2016 03:53 PM IST
पुनीत शर्मा/अमर उजाला,मथ्ाुरा
पुनीत शर्मा/अमर उजाला,मथ्ाुरा Updated Tue, 07 Jun 2016 03:53 PM IST
सार

  • मार्च 2015 में शासन को भेजा गया था लीज का प्रस्ताव
  • स्थानीय प्रशासन के इनकार पर शासन से जारी हुआ आदेश

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Govt ready to give Jawaharbagh to Ramvriksha on 90 year lease
jawahar bagh - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिस जवाहर बाग को खाली कराने में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी व एसओ फरह संतोष यादव शहीद हो गए और 29 लोगों की मौत हुई, उसी बाग को कब्जाधारियों के मुखिया रामवृक्ष यादव को 99 साल की लीज पर देने की तैयारी थी। उसने शासन से धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए बाग मांगा था। मार्च 2015 में इसका प्रस्ताव भी शासन को पहुंच गया था। यदि मामला अदालत नहीं पहुंचता तो यह बेशकीमती बाग कब्जाधारियों को दे दिया गया होता।

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 कभी बाबा जयगुरुदेव के प्रमुख शिष्यों में शामिल रहने वाला रामवृक्ष भी बिलकुल उसी तरह से ही अपना अलग आश्रम स्थापित करना चाहता था। पहले तो उसकी निगाह बाबा जयगुरुदेव आश्रम की भूमि पर ही थी, लेकिन जब वह इसमें कामयाब नहीं हो पाया तो उसने सत्याग्रह के नाम पर जवाहरबाग को कब्जा लिया। दो दिन के लिए अनुमति लेने वाला रामवृक्ष वहीं पर जम गया। यह बिना सियासी संरक्षण के संभव नहीं था। उसकी सरकार में पकड़ का ही नतीजा है कि 280 एकड़ के  जवाहरबाग को वह पट्टे पर मांग रहा था।
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सरकार भी देने को तैयार थी। बताया जाता है रामवृक्ष जयगुरुदेव आश्रम की भूमि पर काबिज होना चाहता था, जिसे लेकर विवाद हुआ तो प्रदेश सरकार के एक कद्दावर मंत्री ने दोनों का विवाद खत्म कराने के लिए बीच का रास्ता निकाला और रामवृक्ष से जवाहरबाग को 99 साल के पट्टे पर लेने के लिए प्रस्ताव मांगा गया। प्रस्ताव पहुंचने के बाद प्रशासन से भी राय ली गई थी। बताया जाता है कि शुरूआत में प्रशासन की राय लीज प्रस्ताव के खिलाफ थी। लेकिन बाद में दबाव में आकर प्रक्रिया भी शुरू कर दी। इसी बीच वरिष्ठ अधिवक्ता विजयपाल सिंह तोमर पूरे मामले को लेकर 22 मई 2015 को हाईकोर्ट पहुंच गए।
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उनकी याचिका पर हाईकोर्ट से बाग को तत्काल खाली कराने का आदेश हो गए। प्रशासन सरकार के इतने दवाब में था कि बाग खाली नहीं कराया गया। अवमानना का भी मामला बन रहा था। लिहाजा प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी थी। अगर इस बीच अदालत से कार्रवाई का आदेश न हुआ होता जवाहर बाग को रामवृक्ष यादव के हवाले कर दिया गया होता। बताया जाता है कि बीच में जब पट्टे को लेकर चल रही प्रक्रिया सुस्त हुई तो रामवृक्ष ने लखनऊ में सीधे बात करनी शुरू कर दी थी।

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