जस्टिस वर्मा के खिलाफ चलेगा महाभियोग: संसद के शीतकालीन सत्र में चलेगी प्रक्रिया; जांच समिति ने क्या आरोप लगाए?
जस्टिस यशवंत वर्मा के कैशकांड में जांच समिति ने बिना हिसाब-किताब वाली नकदी, सबूतों से छेड़छाड़ और टालमटोल वाले जवाब से जुड़े तीन आरोप साबित माने हैं। अब केंद्र सरकार शीतकालीन सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है।
विस्तार
केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने जस्टिस वर्मा को उनके सरकारी आवास से भारी मात्रा में बिना हिसाब-किताब वाली नकदी मिलने के मामले में दोषी पाया है। समिति ने बुधवार को संसद के दोनों सदनों में सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस वर्मा पर बिना हिसाब-किताब वाली नकदी रखने, सबूतों से छेड़छाड़ करने और टालमटोल वाला जवाब देने के आरोप साबित हुए हैं।
करीब 200 सांसदों ने की थी हटाने की मांग
जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच के लिए यह समिति उस समय गठित की गई थी, जब करीब 200 सांसदों ने संसद में उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। लोकसभा अध्यक्ष ने जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3(2) के तहत तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। जस्टिस वर्मा ने इसके बाद इस्तीफा दे दिया था, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं की है। उनका नाम अब भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों की सूची में शामिल है।
इस्तीफे के बाद भी कार्रवाई से बचने का रास्ता नहीं?
घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले सूत्रों के मुताबिक, सरकार शीतकालीन सत्र में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सूत्रों ने कहा कि आमतौर पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के इस्तीफा देने पर उसे स्वीकार मान लिया जाता है। हालांकि, जस्टिस वर्मा के मामले में संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफा दिया गया था। इसी वजह से उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। सूत्रों के अनुसार, सरकार एक मिसाल कायम करने और यह संदेश देने पर भी विचार कर सकती है कि गंभीर अनियमितताओं में शामिल होने के बाद कोई जज इस्तीफा देकर हटाने की प्रक्रिया से बच नहीं सकता।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने नहीं दिया पैसे का हिसाब, मिटाए सबूत
सरकारी आवास में करोड़ों की जली हुई नकदी मिलने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे आरोप लोकसभा की जांच समिति ने सही पाए हैं। समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा पर नकदी का हिसाब न दे पाने (आरोप एक), सबूतों से छेड़छाड़ (आरोप दो) और टालमटोल वाला स्पष्टीकरण (आरोप 3) साबित होते हैं।
समिति ने बुधवार को संसद के दोनों सदनों को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी। रिपोर्ट में कहा गया है, जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिले कैश की मौजूदगी, उसके स्रोत या मालिकाना हक के बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में नाकाम रहे। ठोस सबूतों को सुरक्षित और संरक्षित नहीं किया गया और कानूनी तौर पर सील करने और निरीक्षण करने से पहले स्टोर रूम में सबूतों से छेड़छाड़ की गई। जांच पैनल ने पाया कि जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण उन हालात में अपेक्षित ईमानदारी, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी नहीं दिखाता। स्वतंत्र सरकारी गवाहों और पुष्टि करने वाले सबूतों के आधार पर जांच करने पर उनका स्पष्टीकरण टालमटोल भरा और असंतोषजनक लगा। इसलिए समिति इस नतीजे पर पहुंची है कि उनके खिलाफ आरोप एक, दो और तीन साबित होते हैं।
क्या अब महाभियोग? सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष क्या बोले?
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने भी इस पर अपनी राय दी है। सिंह ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है, जो उचित है। संविधान के तहत इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति से ही प्रभावी होता है। यदि वह अभी भी न्यायाधीश हैं, तो उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह रिपोर्ट संसद में चर्चा और मतदान के लिए रखी जा सकती है। इस्तीफा स्वीकृति पर उन्हें पेंशन का अधिकार मिल जाएगा। महाभियोग की कार्रवाई होने पर वह पेंशन का अधिकार पूरी तरह खो देंगे। दोषी न्यायाधीश को पेंशन देना न्याय का उपहास होगा। सिंह ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव को तार्किक अंत तक ले जाकर उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए।
#WATCH | Delhi: On Parliament panel finds all three charges proved against Justice Yashwant Varma in cash-at-residence case, Vikas Singh, Senior Advocate and President of the Supreme Court Bar Association, says, "In my view, now that his resignation has not been accepted and… pic.twitter.com/W9L3BDZtbC
— ANI (@ANI) August 12, 2026
आम लोगों की तरह दर्ज हो सकती है एफआईआर
इस मामले में एक बार यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि बरामद नकदी भ्रष्टाचार से हुई आय थी, वर्मा के खिलाफ अब सामान्य नागरिक की तरह प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। उन्हें अब न्यायिक संरक्षण हासिल नहीं है।
सरकारी आवास के स्टोररूम में मिले थे जले नोट
14 मार्च 2025 की रात दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। उस समय वह दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे। आग बुझाने के लिए पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोररूम में बड़ी मात्रा में जले हुए नोट मिले थे। जले हुए नोटों की गड्डियां मिलने के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया था।
तत्कालीन सीजेआई ने भी शुरू की थी इन-हाउस जांच
इससे पहले भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आरोपों की इन-हाउस जांच शुरू की थी। मार्च 2025 में जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी। संबंधित कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को देखने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों को गंभीर पाया और इसके बाद इन-हाउस प्रक्रिया शुरू की। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद सीजेआई ने जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने को कहा था। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसके बाद सीजेआई खन्ना ने उन्हें हटाने से संबंधित रिपोर्ट और उस पर जस्टिस वर्मा का जवाब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दिया।