DoPT के आदेशों की उपेक्षा से प्रमोशन में 15 साल पिछड़े अर्धसैनिक बलों के 10 हजार अफसर
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डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सीआरपीएफ, बीएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल्स नहीं बनाए गए हैं। इतना ही नहीं, इन कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल्स में भी संशोधन नहीं किया गया। नतीजतन, आज बहुत से कॉडर अधिकारी प्रमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं।
अदालत का आदेश ताक पर!
विभिन्न अर्धसैनिक बलों में तैनात कॉडर अफसर वेतन विसंगतियां खत्म कराने और समय पर पदोन्नति मिले, इसके लिए ये एक दशक से लड़ाई लड़ रहे हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके पक्ष में फैसला दे चुका है। अदालत के फैसले से हरकत में आई केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले ही यह घोषणा कर दी कि इन अधिकारियों को संगठित कॉडर के सभी फायदे मिलेंगे।
यानी अब इन अफसरों को गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाएगा। बता दें कि सरकार ने इन्हें संगठित कॉडर सेवा के सभी फायदे देने की घोषणा तो कर दी, लेकिन उसके लिए डीओपीटी के आदेशों का पालन नहीं किया गया।
डीओपीटी ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कॉडर अफसरों के लिए नए सर्विस रूल्स बनाने की बात कही थी। केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई काम ही नहीं किया। कॉडर अफसरों का कहना है कि जब तक पुराने भर्ती नियमों में संशोधन नहीं हो जाता और नए सर्विस नियम नहीं बन जाते, तब तक केंद्र सरकार की घोषणा बेमानी है। इस हालत में तो केवल 20 फीसदी अफसरों को ही लाभ मिल पाएगा।
प्रमोशन का कोई तय समय नहीं
केंद्र सरकार की 55 संगठित कॉडर वाली नौकरियों में अधिकतम बीस साल बाद सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड मिलता है। इसे आसान भाषा में यूं भी समझा जा सकता है कि बीस साल की नौकरी पूरी होने के बाद आईएएस जेएस रैंक पर और आईपीएस आईजी के पद पर चला जाता है। चूंकि ये काडर सर्विस हैं, इसलिए इनमें टाइम बाउंड प्रमोशन यानी एक तय समय के बाद पदोन्नति मिल जाती है।
खास बात है कि इन सेवाओं में रिक्त स्थान नहीं देखा जाता। जगह खाली हो या न हो, लेकिन तय समय पर प्रमोशन मिल जाता है। दूसरी तरफ, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में प्रमोशन तभी होता है, जब सीट खाली होती है। अगर किसी फोर्स में एक साथ कई बटालियनों का गठन होता है, तो ही प्रमोशन की कुछ संभावना बनती है। इसे नॉन प्लान ग्रोथ कहा जाता है।
ये था डीओपीटी का आदेश
डीओपीटी ने इस बाबत भी दिशा निर्देश जारी कर कहा था कि किसी भी फोर्स में नॉन प्लान ग्रोथ नहीं होगी। जो भर्ती होगी, वह तय तरीकों ही की जाएगी। 2001 और 2010 में भर्ती नियमों को बदला गया, लेकिन उनमें इतनी ज्यादा विसंगतियां थी कि उससे अफसरों को फायदा होने की बजाए नुकसान हो गया। केंद्र सरकार अब जो फायदा देने की बात कह रही है, वह पुराने भर्ती नियमों पर आधारित है।
अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान समय में जो भर्ती नियम हैं, वे ओजीएएस और एनएफएफयू की मूल भावना को लागू नहीं होने देंगे। अगर सरकार नए सर्विस रूल फ्रेम किए बिना एनएफएफयू देती है तो उसका फायदा सभी को नहीं मिलेगा। 80 फीसदी कॉडर अफसर इससे वंचित रह जाएंगे।
सरकार ने लगाई कई शर्तें
कॉडर अधिकारियों का कहना है कि अब सरकार ने एनएफएफयू देने के लिए कई तरह की शर्तें लगा दी हैं। इनमें प्रमोशन कोर्स, वह पद पहले ग्रहण किया हो, मेडिकल फिटनेस, किसी मामले की जांच लंबित न हो यानी विजिलेंस क्लीयरेंस, फील्ड सर्विस, लीव रिजर्व, ट्रेनिंग रिजर्व और डेपुटेशन रिजर्व जैसी कई शर्तें शामिल हैं। छह दिन का प्रमोशन कोर्स अहम माना जाता है।
खास बात है कि ये कोर्स अधिकारी अपनी मनमर्जी से नहीं कर सकता। इसके लिए तो विभाग ही उसे कोर्स पर भेजता है। सीआरपीएफ की बात करें तो 90 फीसदी अधिकारियों को प्रमोशन कोर्स नहीं कराया गया है। अब 40-40 के बैच में डीआईजी को माउंट आबू स्थित संस्थान में कोर्स पर भेजा जा रहा है।
इस बाबत अधिकारियों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें उक्त शर्तों से वन टाइम छूट प्रदान की जाए। फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि सीएपीएफ के ग्रुप-ए के अधिकारियों को छठे वेतन आयोग के संदर्भ में 2006 से एनएफएफयू सहित सभी लाभ दिए जाने चाहिए। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के दो फैसलों को सही ठहराया था, जिनमें इन बलों को ‘संगठित सेवा’ का दर्जा दिया गया था।