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आरबीआई के 3.5 खरब रुपए के कोष पर है सरकार की नजर
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Updated Fri, 02 Nov 2018 05:02 PM IST
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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) गवर्नर की ताकत घटा कर बैंक में अपना ज्यादा से ज्यादा दखल बढ़ाने के प्रयासों में लगी सरकार का मकसद है बैंक की जमा पूंजी से राजकोषीय घाटा कम करना। बैंक के पास मौजूदा समय में करीब 3.5 खरब रुपए का कोष है। यह कोष दो-चार साल में नहीं, बल्कि तीन दशक के बाद इस स्तर तक पहुंचा है। ऑल इंडिया रिजर्व बैंक इंप्लॉय एसोसिएशन (एआईआरबीईए) का कहना है कि सरकार अपना घाटा पूरा करने के लिए इस कोष को अपने कब्जे में लेना चाहती है। यही वजह है कि सरकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से आरबीआई गनर्वर की शक्तियां कम करने का हर संभव प्रयास कर रही है।
बता दें कि आरबीआई की स्वायत्तता खत्म करने के प्रयासों के इस खेल की आहट देश-दुनिया तक पहुंच गई है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के निदेशक (संवाद) गैरी राइस ने भी इस विवाद पर बयान जारी किया है। उन्होंने कहा, हम इस बाबत स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। आईएमएफ पहले भी आरबीआई की जिम्मेदारी और जवाबदेही का समर्थन करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंकों की स्वायत्तता बनाए रखने का श्रेष्ठ तरीका यह है कि केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता में किसी प्रकार की दखल नहीं होना चाहिये। बैंक की कार्य प्रणाली में सरकार या उद्योग जगत का हस्तक्षेप न हो। राइस ने कहा कि यह सच है कि कई देशों में केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता बेहद मायने रखती है।
आरबीआई में पदस्थ एक उच्च अधिकारी और एआईआरबीईए के प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार अपने घाटे को छिपाने के लिए बैंक से 63 हजार करोड़ रुपये का एडवांस सरप्लस चाहती है। ऐसा नहीं है कि आरबीआई यह राशि नहीं देता है। हर साल सरकार को सरप्लस का आधा तो दिया ही जाता है, लेकिन इस बार सरकार अपना राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए एडवांस मांग रही है।
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इस बाबत आरबीआई ने सरकार को सलाह दी कि वह पहले कर्ज वसूली पर सख्ताई से काम करे। सरकार ने यह कहते हुए बैंक के इस प्रपोजल को नामंजूर कर दिया कि चुनाव का समय है, अब ऐसी सख्ती नहीं कर सकते। इसके बाद सरकार में खासी नाराजगी दिखी। नतीजा, आरबीआई कानून की धारा-7 को लागू करके रिजर्व बैंक की स्वायत्तता ही खत्म करने का प्रयास शुरू हो गया। एसोसिएशन के मुताबिक, सरकार के ऊपर एनपीए का बड़ा बोझ आ पड़ा है। पिछले चार साल में एनपीए तीन-चार गुना से ज्यादा हो गया है। मौजूदा समय में एनपीए करीब 12 लाख करोड़ रुपए है।
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बता दें कि आरबीआई की स्वायत्तता खत्म करने के प्रयासों के इस खेल की आहट देश-दुनिया तक पहुंच गई है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के निदेशक (संवाद) गैरी राइस ने भी इस विवाद पर बयान जारी किया है। उन्होंने कहा, हम इस बाबत स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। आईएमएफ पहले भी आरबीआई की जिम्मेदारी और जवाबदेही का समर्थन करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंकों की स्वायत्तता बनाए रखने का श्रेष्ठ तरीका यह है कि केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता में किसी प्रकार की दखल नहीं होना चाहिये। बैंक की कार्य प्रणाली में सरकार या उद्योग जगत का हस्तक्षेप न हो। राइस ने कहा कि यह सच है कि कई देशों में केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता बेहद मायने रखती है।
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आरबीआई में पदस्थ एक उच्च अधिकारी और एआईआरबीईए के प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार अपने घाटे को छिपाने के लिए बैंक से 63 हजार करोड़ रुपये का एडवांस सरप्लस चाहती है। ऐसा नहीं है कि आरबीआई यह राशि नहीं देता है। हर साल सरकार को सरप्लस का आधा तो दिया ही जाता है, लेकिन इस बार सरकार अपना राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए एडवांस मांग रही है।
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इस बाबत आरबीआई ने सरकार को सलाह दी कि वह पहले कर्ज वसूली पर सख्ताई से काम करे। सरकार ने यह कहते हुए बैंक के इस प्रपोजल को नामंजूर कर दिया कि चुनाव का समय है, अब ऐसी सख्ती नहीं कर सकते। इसके बाद सरकार में खासी नाराजगी दिखी। नतीजा, आरबीआई कानून की धारा-7 को लागू करके रिजर्व बैंक की स्वायत्तता ही खत्म करने का प्रयास शुरू हो गया। एसोसिएशन के मुताबिक, सरकार के ऊपर एनपीए का बड़ा बोझ आ पड़ा है। पिछले चार साल में एनपीए तीन-चार गुना से ज्यादा हो गया है। मौजूदा समय में एनपीए करीब 12 लाख करोड़ रुपए है।
सरकार, मोनेटरी पॉलिसी कमेटी पर नियंत्रण करना चाहती है
बैंक अधिकारियों का कहना है कि सरकार की मंशा अब दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। गवर्नर की पावर कम करने के साथ-साथ वित्त मंत्रालय अब आरबीआई की मोनेटरी पॉलिसी कमेटी पर नियंत्रण करना चाहती है। इस कमेटी में छह सदस्य होते हैं, जिनमें तीन बैंक के प्रतिनिधि और तीन सरकार द्वारा नामित सदस्य होते हैं। कमेटी में गवर्नर को वीटो करने की पावर हासिल है। बैंक जिस दर पर लोन देते हैं, वह सब यही कमेटी तय करती है। पिछली कई बैठकों में देखने को मिला है कि सरकार के प्रतिनिधि बैंक लोन की दरें कम कराने के लिए अड़ जाते हैं।
चूंकि सरकार यह सब बातें चुनावी नफा-नुकसान के हिसाब से देखती है, जबकि बैंक महंगाई नियंत्रण में रहे, एनपीए ज्यादा न बढ़े, आदि बातों का ध्यान रखकर दरें निर्धारित करते हैं। अभी तक विशुद्ध तौर पर ये सब निर्णय आरबीआई ही लेता आया है, लेकिन अब सरकार इसे अपने हाथ में लेना चाहती है। इतना ही नहीं, अब मोनेटरी पॉलिसी के अलावा पेमेंट सेटलमेंट जैसे काम भी सरकार खुद करना चाह रही है।
इस मसले पर सरकार ने कहा, हम बैंक की रक्षा करेंगे
आरबीआई के साथ बढ़ते टकराव के बीच वित्त मंत्रालय ने कहा, सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान करती है और इसकी रक्षा करती है। आगे भी बैंक की स्वतंत्रता बरकरार रखी जाएगी। आरबीआई अधिनियम के तहत केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता सरकार के लिए आवश्यक एवं स्वीकार्य जरूरत है। भारत सरकार इसकी रक्षा और सम्मान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
मंत्रालय ने कहा कि सरकार और आरबीआई दोनों को अपनी कार्यप्रणाली में सार्वजनिक हित और देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार निर्देशित होना होता है। हालांकि सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7(1) के तहत विभिन्न मुद्दों पर बैंक को कम से कम तीन पत्र भेजे हैं। यह धारा सरकार को सार्वजनिक हितों के मुद्दों पर केंद्रीय बैंक के गवर्नर को निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है। इन पत्रों में नकदी प्रवाह से लेकर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स), नॉन-बैंक फाइनैंस कंपनियों और पूंजी की जरूरत जैसे तमाम मुद्दों की चर्चा की गई थी।
चूंकि सरकार यह सब बातें चुनावी नफा-नुकसान के हिसाब से देखती है, जबकि बैंक महंगाई नियंत्रण में रहे, एनपीए ज्यादा न बढ़े, आदि बातों का ध्यान रखकर दरें निर्धारित करते हैं। अभी तक विशुद्ध तौर पर ये सब निर्णय आरबीआई ही लेता आया है, लेकिन अब सरकार इसे अपने हाथ में लेना चाहती है। इतना ही नहीं, अब मोनेटरी पॉलिसी के अलावा पेमेंट सेटलमेंट जैसे काम भी सरकार खुद करना चाह रही है।
इस मसले पर सरकार ने कहा, हम बैंक की रक्षा करेंगे
आरबीआई के साथ बढ़ते टकराव के बीच वित्त मंत्रालय ने कहा, सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान करती है और इसकी रक्षा करती है। आगे भी बैंक की स्वतंत्रता बरकरार रखी जाएगी। आरबीआई अधिनियम के तहत केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता सरकार के लिए आवश्यक एवं स्वीकार्य जरूरत है। भारत सरकार इसकी रक्षा और सम्मान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
मंत्रालय ने कहा कि सरकार और आरबीआई दोनों को अपनी कार्यप्रणाली में सार्वजनिक हित और देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार निर्देशित होना होता है। हालांकि सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7(1) के तहत विभिन्न मुद्दों पर बैंक को कम से कम तीन पत्र भेजे हैं। यह धारा सरकार को सार्वजनिक हितों के मुद्दों पर केंद्रीय बैंक के गवर्नर को निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है। इन पत्रों में नकदी प्रवाह से लेकर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स), नॉन-बैंक फाइनैंस कंपनियों और पूंजी की जरूरत जैसे तमाम मुद्दों की चर्चा की गई थी।
आने वाले समय में कई और बुरी खबरें सुनने को मिलेंगी
पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का कहना है कि यदि सरकार ने रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल किया तो आने वाले समय में और भी बुरी खबरें सामने आएंगी। पूर्ववर्ती सरकारों ने 1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, 1997 के एशियाई वित्तीय संकट और 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय भी इसका इस्तेमाल नहीं किया था।
उन्होंने कहा कि यदि धारा 7 के इस्तेमाल की खबरें सही हैं तो इससे यह पता चलता है कि मौजूदा सरकार अर्थव्यवस्था से जुड़े तथ्यों को छुपाना चाहती है। पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन-7 लागू करने पर चर्चा हो रही है।
उन्होंने कहा कि यदि धारा 7 के इस्तेमाल की खबरें सही हैं तो इससे यह पता चलता है कि मौजूदा सरकार अर्थव्यवस्था से जुड़े तथ्यों को छुपाना चाहती है। पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन-7 लागू करने पर चर्चा हो रही है।