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न्यायपालिका की आंच से अपने हाथ बचाए रखना चाहती है सरकार
संजय मिश्र, नई दिल्ली
Updated Sat, 13 Jan 2018 11:40 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों की ओर से मुख्य न्यायाधिश के खिलाफ उठाए गए सवालों के बाद से देश की सियासत में फैली आग से केंद्र सरकार अपने आप को बचाएं रखना चाहती है। इसलिए रणनीति के तहत सरकार ने अपने आप को मामले में बयानबाजी तक से दूर रखा है। सरकार के वरिष्ठ सूत्रों की ओर से दिन भर सिर्फ इसी बात के संकेत दिए जाते रहे कि मामला न्यायपालिका के अंदरूनी झगड़े का है। सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। संकट का सामधान खुद न्यायपालिक निकालेगी। बल्कि विधि राज्य मंत्री पीपी चौधरी को अपने वरिष्ठ मंत्री रविशंकर प्रसाद से मीडिया में बयानबाजी पर फटकार भी खानी पड़ी है। सूत्र बताते हैं कि रविशंकर ने फोन कर चौधरी को नसीहत दी है कि वे मामले पर कोई बयानबाजी न करें। चौधरी ने एक अंग्रेजी चैनल को बयान दे दिया था जो कि सरकार को नगावार गुजरा है।
पीएमओ से संचालित हो रही सरकार की रणनीति
चार न्यायधिशों के जरिए मुख्य न्यायाधिश के साथ देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने के बाद उपजे हालातों से निपटने के लिए सरकार की पूरी रणनीति सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से तय हो रही है। चार जजों की पत्रकार वार्ता के बाद पीएम ने कानून मंत्री को तलब कर उनसे स्थिति पर चर्चा की। सरकार ने रणनीति बनाई है कि मामले पर उसकी ओर से अभी कोई बयानबाजी नहीं होगी। मामले को न्यायपालिक का मामला बताकर सरकार इससे होने वाले सियासी बवाल को टालना चाहती है। कॉलेजियम के मामले में पहले ही सरकार न्यायपालिका का विरोध झेल चुकी है। अब चुनावी वर्ष में वे न्यायपालिका के साथ टकराव का संकेत देने के मूड में नहीं है। वैसे भी जजों ने मुख्य न्यायाधिश पर सवाल उठाने के साथ देश के लोकतंत्र पर खतरा करार दिया है।
कानून मंत्रालय में बढ़ी रही मीडिया की गतिविधि
जजों के सवाल के बाद देश में मचे बवाल पर विपक्ष ने जहां सीधे सरकार पर हमला बोला है। वहीं लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने को लेकर सरकार के रणनीतिकार भी सकते में है। पार्टी मुख्यालय से लेकर पार्टी के तमाम नेता कोई बयान देने के बजाय चैनलों के जरिए ही मामले पर अपडेट लेते रहे। दिनभर मीडिया की गतिविधि कानून मंत्रालय में बढ़ी रही। मगर सरकार के मामले में मौन रहने की रणनीति की वजह से किसी को कुछ खास हाथ नहीं लगा। देर शाम इंतजार के बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कार्यालय में पहुंचे भी तो उन्होंने अनौपचारिक चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखा।
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पीएमओ से संचालित हो रही सरकार की रणनीति
चार न्यायधिशों के जरिए मुख्य न्यायाधिश के साथ देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने के बाद उपजे हालातों से निपटने के लिए सरकार की पूरी रणनीति सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से तय हो रही है। चार जजों की पत्रकार वार्ता के बाद पीएम ने कानून मंत्री को तलब कर उनसे स्थिति पर चर्चा की। सरकार ने रणनीति बनाई है कि मामले पर उसकी ओर से अभी कोई बयानबाजी नहीं होगी। मामले को न्यायपालिक का मामला बताकर सरकार इससे होने वाले सियासी बवाल को टालना चाहती है। कॉलेजियम के मामले में पहले ही सरकार न्यायपालिका का विरोध झेल चुकी है। अब चुनावी वर्ष में वे न्यायपालिका के साथ टकराव का संकेत देने के मूड में नहीं है। वैसे भी जजों ने मुख्य न्यायाधिश पर सवाल उठाने के साथ देश के लोकतंत्र पर खतरा करार दिया है।
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कानून मंत्रालय में बढ़ी रही मीडिया की गतिविधि
जजों के सवाल के बाद देश में मचे बवाल पर विपक्ष ने जहां सीधे सरकार पर हमला बोला है। वहीं लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने को लेकर सरकार के रणनीतिकार भी सकते में है। पार्टी मुख्यालय से लेकर पार्टी के तमाम नेता कोई बयान देने के बजाय चैनलों के जरिए ही मामले पर अपडेट लेते रहे। दिनभर मीडिया की गतिविधि कानून मंत्रालय में बढ़ी रही। मगर सरकार के मामले में मौन रहने की रणनीति की वजह से किसी को कुछ खास हाथ नहीं लगा। देर शाम इंतजार के बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कार्यालय में पहुंचे भी तो उन्होंने अनौपचारिक चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखा।
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न्यायपालिका पर लगाम कसने का अवसर मान रहे नेता
कांग्रेस पार्टी ने न्यायपालिका से उठे सवालों को लेकर बेशक सरकार पर हमला बोला है। मगर अनौपचारिक चर्चा में भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही दलों के नेता इस अवसर को न्यायपालिका की लगाम कसने का सुनहरा अवसर करार दे रहे हैं। अनौपचारिक चर्चा में भाजपा के एक सांसद ने चंद दिनों पहले जजों की सैलरी बढ़ाने के विधेयक को लेकर लोकसभा में हुई चर्चा का जिक्र करते हुए कहा कि यह अवसर न्यायपालिका पर लगाम कसने का है।
न्यायपालिका के तमाम कदमों का उल्लेख करते हुए उक्त नेता ने कहा कि न्यायपालिका की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। ऐसे ही कांग्रेस के एक सचिव का भी मानना है। उक्त नेता के अनुसार न्यायपालिक अपनी हदें पार करती रही है। इनके उपर भी कुछ तंत्र बनना चाहिए। वैसे वरिष्ठ चार जजों ने मुख्यन्यायाधिश पर सवाल खड़े कर जनता और बौद्धिक वर्ग को न्यायपालिका के अंदर व्याप्त खामियों पर चर्चा का मौका दे दिया है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जजों ने आरोप लगाया कि अगर न्यायपालिका की व्यवस्था इस तरह चलती रही तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करेगी। सार्वजनिक रूप से पहली बार मीडिया से बोले जजों ने स्पष्ट कहा कि सबकुछ ठीक नहीं, यही रहा तो लोकतंत्र नहीं चलेगा।
न्यायपालिका के तमाम कदमों का उल्लेख करते हुए उक्त नेता ने कहा कि न्यायपालिका की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। ऐसे ही कांग्रेस के एक सचिव का भी मानना है। उक्त नेता के अनुसार न्यायपालिक अपनी हदें पार करती रही है। इनके उपर भी कुछ तंत्र बनना चाहिए। वैसे वरिष्ठ चार जजों ने मुख्यन्यायाधिश पर सवाल खड़े कर जनता और बौद्धिक वर्ग को न्यायपालिका के अंदर व्याप्त खामियों पर चर्चा का मौका दे दिया है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जजों ने आरोप लगाया कि अगर न्यायपालिका की व्यवस्था इस तरह चलती रही तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करेगी। सार्वजनिक रूप से पहली बार मीडिया से बोले जजों ने स्पष्ट कहा कि सबकुछ ठीक नहीं, यही रहा तो लोकतंत्र नहीं चलेगा।