{"_id":"5a067fd14f1c1bd1408b5cda","slug":"google-honoured-anasuya-sarabhai-with-a-doodle-on-her-132nd-birth-anniversary","type":"story","status":"publish","title_hn":"महिलाओं के लिए टॉयलेट बनवाने वाली 'मोटाबेन अनसुइया' को गूगल ने किया सलाम","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
महिलाओं के लिए टॉयलेट बनवाने वाली 'मोटाबेन अनसुइया' को गूगल ने किया सलाम
amarujala.com- Presented By: पूजा मेहरोत्रा
Updated Sat, 11 Nov 2017 10:33 AM IST
विज्ञापन
अनसुइया साराभाई
- फोटो : social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गूगल ने शनिवार 11 नवंबर को अपना डूडल सामाजिक कार्यकर्ता अनसुइया साराभाई को समर्पित किया है। गूगल अनसुइया साराभाई की 132 वीं वर्षगांठ मना रहा है। मोटाबेन के नाम से पॉपुलर अनसुइया ने बुनकरों और टेक्सटाइल उद्योग के मजदूरों की हक की लड़ाई के लिए 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन यानी मजूर महाजन संघ बनाया था, जो भारत के टेक्सटाइल मजदूरों का सबसे पुराना यूनियन भी है।
गुजरात के लोग उन्हें बड़ी दीदी यानी मोटाबेन बुलाया करते थे। 11 नवंबर 1885 में जन्मी साराभाई ने नौ साल की उम्र में ही अपने माता पिता को खो दिया था। उनकी शादी 13 साल की उम्र में कर दी गई थी लेकिन वो शादी चली नहीं और वो वापस अपने परिवार में आकर रहीं।
1912 में अनसुइया पढ़ाई के लिए इंगलैंड चली गईं। इसी बीच वो मार्कसिस्ट जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और सिडनी वेब के संपर्क में आईं। बाद में पढ़ाई के लिए लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में चली गईं। उन्होंने भारत आकर हाशिये पर मौजूद लोगों खासकर उनलोगों के लिए काम करना शुरू किया जिन्हें समाज में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें: AC रेस्टोरेंट में खाना हुआ सस्ता, 18 की जगह देना होगा सिर्फ 5 फीसदी GST
उन्होंने सभी जाति के गरीबों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले और महिलाओं के लिए बाथरुम बनवाए। एक दिन उन्होंने कुछ मजदूरों को बहुत परेशान सा जाते हुए देखा जिन्हें वो नहीं जानती थीं, उन मजदूरों ने अनसुइया को बताया कि वो पिछले 36 घंटे से काम कर रहे थे, बिना कोई ब्रेक लिए।
तब अनसुइया को लगा कि उन्हें इन मजदूरों के लिए काम करने की जरूरत है और फिर उन्होंने मजदूरों के लिए यूनियन का गठन किया जिसे मजूर महाजन संघ के नाम से जाना जाता है और यह मजदूरों का सबसे पुराना यूनियन है। यही नहीं उन्होंने 1918 में मजदूरों की सैलरी बढ़वाने के लिए आंदोलन किया था।
विज्ञापन
गुजरात के लोग उन्हें बड़ी दीदी यानी मोटाबेन बुलाया करते थे। 11 नवंबर 1885 में जन्मी साराभाई ने नौ साल की उम्र में ही अपने माता पिता को खो दिया था। उनकी शादी 13 साल की उम्र में कर दी गई थी लेकिन वो शादी चली नहीं और वो वापस अपने परिवार में आकर रहीं।
विज्ञापन
1912 में अनसुइया पढ़ाई के लिए इंगलैंड चली गईं। इसी बीच वो मार्कसिस्ट जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और सिडनी वेब के संपर्क में आईं। बाद में पढ़ाई के लिए लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में चली गईं। उन्होंने भारत आकर हाशिये पर मौजूद लोगों खासकर उनलोगों के लिए काम करना शुरू किया जिन्हें समाज में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें: AC रेस्टोरेंट में खाना हुआ सस्ता, 18 की जगह देना होगा सिर्फ 5 फीसदी GST
उन्होंने सभी जाति के गरीबों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले और महिलाओं के लिए बाथरुम बनवाए। एक दिन उन्होंने कुछ मजदूरों को बहुत परेशान सा जाते हुए देखा जिन्हें वो नहीं जानती थीं, उन मजदूरों ने अनसुइया को बताया कि वो पिछले 36 घंटे से काम कर रहे थे, बिना कोई ब्रेक लिए।
तब अनसुइया को लगा कि उन्हें इन मजदूरों के लिए काम करने की जरूरत है और फिर उन्होंने मजदूरों के लिए यूनियन का गठन किया जिसे मजूर महाजन संघ के नाम से जाना जाता है और यह मजदूरों का सबसे पुराना यूनियन है। यही नहीं उन्होंने 1918 में मजदूरों की सैलरी बढ़वाने के लिए आंदोलन किया था।