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NSD और संगीत नाटक अकादमी देने वाली स्वतंत्रता सेनानी कमलादेवी को गूगल ने किया डूडल सलाम

Tue, 03 Apr 2018 10:45 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 03 Apr 2018 10:45 AM IST
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Google celebrated kamladevi's 115th birthday by impressive Doodle, know the story of kamaladevi

गूगल ने महिला स्वतंत्रता सेनानी कमलादेवी चटोपाध्याय को उनके 115वें जन्मदिन पर खास तरह से डूडल बनाकर याद किया है। वह सिर्फ देश की आजादी में ही नहीं बल्कि देश के विभाजन के बाद शरणार्थियों के लिए काफी काम किया था। विभाजन के बाद देश में आए शरणार्थियों के लिए भी उन्होंने बहुत काम किया और प्रशासन से लड़कर उन्होंने 50,000 लोगों के रहने की व्यवस्था भी कराई थी। 

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भारत की समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी कमलादेवी चटोपाध्याय का 115वां जन्मदिन है। कमलादेवी का भारतीय हस्तकला के क्षेत्र में अतुल्य योगदान है। आज भारत में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, संगीत नाटक एकेडमी , क्राफ्ट कौंसिल ऑफ इंडिया जैसे जाने-माने संस्थान कमलादेवी का ही परिणाम है और उनके इसी काम की झलक गूगल के बनाए डूडल में दिखाई दे रही है।
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 कमलादेवी का जन्म कर्नाटक के मंगलोर 3 अप्रैल, 1903 को हुआ था। महज सात साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, 14 वर्ष की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। उनका जीवन संघर्ष की पूरी चलती फिरती कहानी है। शादी के महज दो साल बाद ही कमलादेवी के पति कृष्ण राव की भी मृत्यु हो गई। 
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लिखी थीं कई पुस्तकें

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चूंकि उस समय वह चेन्नई के क्वीन मेरीज कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं तभी उनकी मुलाकात सरोजिनी नायडू की छोटी बहन से हुई और उन्होंने भाई हरेंद्र नाथ से मुलाकात कराई और उन दोनों में दोस्ती हुई फिर बाद में दोनों ने शादी कर ली।  विधवा विवाह और जाति-बिरादरी से अलग विवाह करने की वजह से वे आलोचना की शिकार भी हुईं लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

इसके अलावा कमलादेवी ने लंदन यूनिवर्सिटी के बेडफोर्ड कॉलेज से समाजशास्त्र की पढ़ाई भी की। साथ ही कमलादेवी ने भारतीय पारंपरिक संस्कृत ड्रामा कुटीयाअट्टम का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं जैसे- -द अवेकिंग ऑफ इंडियन विमेन, जापान इट्स विकनेस एंड स्ट्रेंथ, अंकल सैम अंपायर-इन वार-टर्न चाइना-टुवर्डस ए नेशन थियेटर। फिर वह पति के साथ विदेश चली गईं लेकिन जब उन्हें 1923 में असहयोग आंदोलन के बार में पता चला तो वह भारत आ गईं और आजादी की लड़ाई में जमकर काम किया। 

कमलादेवी ने फिल्मों में भी अपनी किस्मत आजमाई। उन्होंने दो मूक फिल्मों में काम किया। इसमें से एक कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की पहली साइलेंट फिल्म थी। फिल्म का नाम था 'मृच्छकटिका (1931)।' इसके बाद वे एक बार फिल्मों में नजर आईं। वे 'तानसेन' फिल्म में के.एल. सहगल और खुर्शीद के साथ नजर आईं। उसके बाद कमलादेवी ने 'शंकर पार्वती (1943)' और 'धन्ना भगत (1945)' जैसी फिल्में भी की।

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