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SC का ऐतिहासिक फैसला, उम्मीदवार और परिजनों को संपत्ति का स्रोत भी बताना होगा

Sat, 17 Feb 2018 04:12 AM IST
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 17 Feb 2018 04:12 AM IST
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Gold plays an important role in making illegal property for politicians Says Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में खड़े उम्मीदवारों एवं उनके परिजनों को आय एवं संपत्ति के स्रोत बताने का आदेश देते हुए शुक्रवार को कहा कि जनप्रतिनिधि या उनके सहयोगी अधिकतर ऐसा तरीका अपनाते हैं जिससे वे संपत्ति भी बना लेते हैं और वे भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आने वाले अपराध केदायरे में आने से बच जाते हैं। इस काम में सोना उनके लिए भगवान है। 

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न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जनप्रतिनिधियों या उनके सहयोगियों की संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि हमेशा गैरकानूनी गतिविधियों में श्रेणी में नहीं आता। भले ही उनकी गतिविधियां या क्रियाकलाप उचित नहीं हों, लेकिन वे भ्रष्टाचार कानून या किसी अन्य कानून के तहत अपराध में श्रेणी में नहीं आते। लेकिन यह जनप्रतिनिधि के संवैधानिक दायित्व के विपरीत है। 
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जनप्रतिनिधि लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए होते हैं लेकिन ऐसी गतिविधियों में लिप्त होकर जनप्रतिनिधि खुद ‘शिकायत’ बन जाते हैं। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जब जनप्रतिनिधि  या उनके सहयोगी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों से लोन लेते हैं। चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से।
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मतलब, ये जनप्रतिनिधि या उनके सहयोगी खुद लोन लेते हैं या ऐसी संस्था व कंपनियों के नाम पर लेते हैं जिन पर उनका नियंत्रण होता है। सरफेसी कानून के तहत इस तरह केलोन एनपीए होते हैं। यह भी आजकल बहुत दिखने को मिल रहा है कि जनप्रतिनिधियों या सहयोगियों के खाते एनपीए में तब्दील होने के बावजूद उन्हें उसी वित्तीय संस्थान या अन्य संस्थानों से फिर से लोन मिल जाता है। 

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SC ने कहा- कानून को किया गया कमजोर

Gold plays an important role in making illegal property for politicians Says Supreme Court
supreme court

शीर्ष अदालत ने कहा है कि सरकार या सरकार केनियंत्रण वाले निकायों से महंगे कांट्रैक्ट के जरिए जनप्रतिनिधि बेतहाशा संपत्ति अर्जित करते हैं। पीठ ने कहा कि शुरुआत में जनप्रतिनिधि कानून, 1951 में यह प्रावधान था कि अगर किसी व्यक्ति का सामानों की सप्लाई या किसी काम या सेवा में उसका कोई शेयर हो या उसे उसका फायदा मिलता हो तो वह अयोग्य ठहराया जाएगा। लेकिन 1958 में इस प्रावधान को हटा दिया गया और एक नई धारा जोड़ी गई जिससे जनप्रतिनिधियों के सहयोगियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी कांट्रेक्ट पाने का रास्ता निकल गया।

फैसले से वोटरों को मिलेगी मदद
अदालत ने कहा कि उम्मीदवारों और उसकी परिवार की संपत्तियों का स्रोत पता होने से मतदाताओं को अपनी पसंद का नेता चुनने में मदद मिलेगी और उन्हें लगेगा कि कौन उनके क्षेत्र के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकता है। चुनाव में खड़े लोगों के बारे में सभी प्रासंगिक जानकारियों को हासिल करना किसी भी वोटर का मूलभूत अधिकार है।

लोक प्रहरी ने दायर की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश लोकप्रहरी नामक संगठन द्वारा दायर एक याचिका पर दिया है। याचिका में गुहार की गई थी कि चुनाव में नामांकन करते वक्त उम्मीदवारों को न केवल खुद की बल्कि परिवार केसभी सदस्यों की आमदनी का स्रोत बताना जरूरी किया जाए। याचिका में कहा गया था कि ऐसा देखा गया है कि दो चुनावों के बीच कुछ सांसदों व विधायकों की संपत्तियों में 500 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी थी।  

37 सांसद और 257 विधायक घेरे में
लोक प्रहरी ने सुप्रीम कोर्ट को लोकसभा के 26, राज्यसभा के 11 और 257 विधायकों के नाम सौंपे हैं जिनकी संपत्ति में पांच वर्ष के दौरान 500 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल 12 सितंबर को सुनवाई के दौरान केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने बताया था कि सात सांसदों एवं  140 विधायकों के खिलाफ जांच चल रही है। अदालत ने सीबीडीटी से इन सभी जनप्रतिनिधियों के चुनाव जीतने और अगले चुनाव के बीच उनकी संपत्ति में बेहिसाब वृद्धि का ब्यौरा तलब किया है।

माननीयों पर 1581 आपराधिक मामले
इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित 1581 आपराधिक मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 12 स्पेशल कोर्ट गठित किए जाएंगे। 

संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि गंभीर बात
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधियों या उनकेसहयोगियों की संपत्तियों में अचानक बेतहाशा वृद्धि लोकतांत्रिक देश के नागरिकों और मतदाताओं के लिए गंभीर बात है। इस तरह के क्रियाकलाप लोकतंत्र में गिरावट आने की शुरुआत है। अगर इस पर गौर नहीं किया गया तो लोकतंत्र गिर जाएगा और यह माफिया के शासन की ओर अग्रसर होगा। दुख की बात है कि हमारे देश में न तो संसद और न ही चुनाव आयोग ने इस ओर ध्यान दिया।

सीबीडीटी ने दी थी रिपोर्ट
मामले की सुनवाई केदौरान केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने हलफनामे के यह बताया गया था कि सात लोकसभा सांसदों और 98 विधायकों की संपत्तियों में खासी वृद्धि का पता चला है और इसकी जांच की जा रही है। इन इन सभी द्वारा चुनावी हलफनामे में संपत्तियों के बारे में दी गई जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न में दी गई जानकारी से अलग है।

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