Assam: सांसद सरानिया की रिट याचिका को उच्च न्यायालय ने किया खारिज, जाति की स्थिति रद्द करने से जुड़ा है मामला
सरानिया 2014 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में कोकराझार (एसटी) निर्वाचन क्षेत्र से संसद पहुंचे थे। उन्होंने घोषणा की थी कि वे वहीं से तीसरी बार लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। सरानिया का कहना है कि वे बोरो कछारी समुदाय से हैं।
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गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम के एक मौजूदा सांसद की रिट याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने राज्य स्तरीय जांच समिति (एसएलएससी) के एक आदेश को चुनौती दी थी। दो बार के सांसद नबा सरानिया ने 12 जनवरी, 2024 के एसएलएससी के एक "स्पीकिंग ऑर्डर" के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी, जिसमें उनकी अनुसूचित जनजाति (पी) स्थिति को रद्द कर दिया गया था। असम के महाधिवक्ता देवजीत सैकिया ने बताया कि न्यायमूर्ति एस के मेधी की एकल पीठ ने आदेश सुनाया है।
स्पीकिंग ऑर्डर की प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं
सैकिया ने बताया कि अदालत ने उनकी रिट याचिका खारिज की और उन्हें कोई राहत नहीं दी है। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने आदेश में कहा कि स्पीकिंग ऑर्डर की प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं था। आदेश ने सरानिया को एसटी या अन्य श्रेणियों के लिए आरक्षित किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने से रोक दिया है।
सरानिया का दावा- बोरो कछारी समुदाय से ताल्लुक
बता दें, सरानिया 2014 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में कोकराझार (एसटी) निर्वाचन क्षेत्र से संसद पहुंचे थे। उन्होंने घोषणा की थी कि वे वहीं से तीसरी बार लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। सरानिया का कहना है कि वे बोरो कछारी समुदाय से हैं और वे उसी समुदाय के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य हैं। राज्य के जनजातीय मामलों के विभाग (पी) ने बाद में 20 जनवरी को एक आदेश पारित कर सरानिया के जाति प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया।
अदालत ने कही यह बात
अदालत इस बात से हैरान था कि सरनिया ने 2011 में जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किया था और 2014 में कोकराझार से चुनाव भी लड़ लिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एसटी (पी) से संबंधित होने के दावे का कोई सबूत पेश नहीं कर सकीं, जो साल 2011 से पहले का हो। सरनिया के पिता असम रेजिमेंटल सेंटर, शिलांग में कार्यरत थे। उनके पास भी याचिकाकर्ता के दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं है।