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सफलता: चीन की दबंगई की भारत को मिली काट; अफ्रीकी नेताओं के तर्क के जरिये भारत ने US सहित पश्चिमी देशों को साधा

Sun, 10 Sep 2023 06:26 AM IST
शिव शरण शुक्ला हिमांशु मिश्र
हिमांशु मिश्र Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sun, 10 Sep 2023 06:26 AM IST
सार

चीन ने साल 2000 में फोरम ऑन चाइना अफ्रीका कोऑपरेशन की शुरुआत कर अफ्रीकी महाद्वीप को साधना शुरू किया था। भारत 2008 से इस दिशा बढऩे लगा। 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन किया गया। तब इसमें इस महाद्वीप के 52 में से 40 देशों ने भाग लिया।
 

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G20: India convinced western countries including US through the arguments of African leaders
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा। - फोटो : ANI

विस्तार

ब्रिक्स के जरिये ग्लोबल साउथ में अपना प्रभाव बढ़ाने की काट भारत ने जी-20 में खोज ली। भारत को महज आठ महीने के कूटनीतिक प्रयास के बाद अफ्रीकी संघ को जी-20 में शामिल करने में सफलता मिल गई। चीन और रूस भले ही इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं, मगर  भारत ने अफ्रीकी महाद्वीप को साधने की मुहिम भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के जरिये साल 2015 में ही शुरू कर दी थी। जी-20 शिखर सम्मेलन में चीन और रूस के राष्ट्रपतियों की अनुपस्थिति के बीच यह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता है। सरकारी सूत्र ने कहा कि भारत की अफ्रीका आउटरीच पहल करीब आठ साल पुरानी है, मगर एयू को जी-20 में शामिल करने की मुहिम महज आठ महीने पहले इस साल जनवरी में वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन से शुरू की गई। इसी साल जून में पीएम मोदी ने जी-20 सदस्य देशों को पत्र लिख कर इस आशय की मजबूती से मांग की।

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अफ्रीका महाद्वीप पर चीन बनाम भारत
चीन ने साल 2000 में फोरम ऑन चाइना अफ्रीका कोऑपरेशन की शुरुआत कर अफ्रीकी महाद्वीप को साधना शुरू किया था। भारत 2008 से इस दिशा बढऩे लगा। 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम  शिखर सम्मेलन किया गया। तब इसमें इस महाद्वीप के 52 में से 40 देशों ने भाग लिया।
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तर्क आया काम
अफ्रीकन यूनियन  को जी-20 की सदस्यता देने के लिए भारत ने इस दौरान चीन और रूस के इतर दूसरे सदस्य देशों को साधना शुरू किया। इस दौरान भारत का तर्क था कि जब पांच यूरोपीय देशों को इस समूह की सदस्यता देने के बावजूद यूरोपीय यूनियन (ईयू) को इसमें शामिल किया जा सकता है तो अफ्रीकी महाद्वीप से दक्षिण अफ्रीका के रूप में इकलौते प्रतिनिधित्व को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। इसी तर्क के आधार पर 55 देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले एयू को भी इस समूह में शामिल किया जाना चाहिए।
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ब्रिक्स में चीन की चाल के बाद सतर्क हुआ अमेरिका
सरकारी सूत्र के मुताबिक अमेरिका, फ्रांस और जापान  एयू की सदस्यता पर तटस्थ थे। बीते महीने चीन के प्रयास से ब्रिक्स विस्तार के बाद ये देश एयू को ले कर गंभीर हुए। इन्हें चीन ने ब्रिक्स के विस्तार के जरिये ग्लोबल साउथ में पैठ मजबूत करने की झलक दिखाई दी। इसके बाद इन देशों ने एयू को जी-20 में शामिल करने को ले कर अपनी सहमति दे दी।

फोरम के साथ आउटरीच पहल
मोदी सरकार के कार्यकाल में अफ्रीकी देशों से संबंध बेहतर करने की पहल महज इस फोरम तक सीमित नहीं रही। बीते आठ साल में खुद पीएम मोदी ने 10 अफ्रीकी देशों का दौरा किया। अफ्रीका आउटरीच पहल के तहत बड़ी संख्या में मोदी सरकार के मंत्रियों ने इस महाद्वीप का दौरा किया। इस सम्मेलन में भी भारत ने जी-20 की भावी नीतियों के मामले में अफ्रीकी महाद्वीप के हितों पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया है।


साझा घोषणा पत्र पर संशय के बीच मिली बड़ी सफलता
एयू को जी-20 की सदस्यता ऐसे समय मिली है, जब शिखर सम्मेलन में साझा घोषणा पत्र जारी होने को ले कर संदेह जताए जा रहे हैं। चीन और रूस यूक्रेन युद्ध से ले कर जलवायु परिवर्तन सहित दूसरे मुद्दों में भी टांग अड़ा रहे हैं। ऐसे में अगर साझा घोषणा पत्र जारी नहीं भी होता है तो इस सम्मेलन को एयू की सदस्यता के लिए याद रखा जाएगा।

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