जानिए, अजमेर ब्लास्ट की पूरी कहानी जिसमें फंसे थे संघ के बड़े नेता इंद्रेश कुमार
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राजस्थान के अजमेर शरीफ दरगाह पर विस्फोट को दस साल होने को हैं और कोर्ट ने मामले में फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को उम्रकैद की सजा भी सुना दी है। हालांकि मामले में मुख्य आरोपी बनाए गए असीमानंद को कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। लेकिन इस घटना में रोज नए खुलासों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
हाल ही में खुलासा हुआ है कि मामले में दोषी साबित हुए भवेश पटेल, देवेन्द्र गुप्ता और सुनील जोशी ने विस्फोट में मदद के लिए गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की थी, लेकिन योगी ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया और टरका दिया।
ऐसे ही कुछ खुलासों के बीच हम आपको रूबरू कराते हैं इस पूरे मामले से जिसने देशभर को हिलाकर रख दिया। वजह थी आतंकवादी घटनाओं में पहली बार हिंदु संगठनों से जुड़े लोगों की संलिप्तता
सामने आने की।
अक्टूबर 2007 में हुआ था दरगाह में विस्फोट
अजमेर के दरगाह शरीफ में 11 अक्टूबर 2007 को यह घटना अंजाम दी गई, उस वक्त वहां काफी संख्या में जायरीन मौजूद थे। दरगाह में दो टाइमर बम प्लांट किए गए थे जिसमें से एक में विस्फोट हुआ। घटना में तीन लोगों की मौत हो गई थी और 15 लोग घायल हुए थे। बाद में पता चला कि विस्फोट एक ही बम में हुआ था जबकि दूसरा फट नहीं सका इसकी वजह से बड़ी जन हानि होने से बच गई।
एटीएस की जांच में सामने आया आरआरएस नेताओं का नाम
शुरूआत में राजस्थान पुलिस ने इसकी जांच की और घटना के पीछे इस्लामिक आतंकवादियों का हाथ बताया। लेकिन मामले में नया मोड़ तब आया जब राजस्थान एटीएस ने इसकी जांच शुरू की। एटीएस ने घटना के पीछे कुछ हिंदू संगठनों के होने की बात कही, इसके तार आरआरएस से भी जुड़े।
मामले में पहली गिरफ्तारी आरआरएस से जुड़े हिंदू संगठन के भवेश पटेल की हुई। इसके बाद आरआरएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, असीमानंद सहित कुल 14 लोगों को आरोपी बनाया गया। जिनमें से अधिकतर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
घटना से जुड़े आरआरएस से जुड़े संगठनों के नाम
घटना के पीछे हिंदू संगठनों की संलिप्तता की बात सामने आने के बाद यूपीए सरकार के कार्यकाल में बनी एनआईए को 2011 में इस मामले की जांच सौंप दी गई। जिसने वारदात के पीछे इंद्रेश कुमार, असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर को मुख्य आरोपी बनाया। हालांकि जांच की शुरू में ही इंद्रेश कुमार को क्लीन चिट दे दी गई, लेकिन असीमांनद और प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार कर अन्य आरोपियों के साथ जेल भेज दिया गया। एनआईए ने अपनी शुरूआती जांच के बाद बताया कि हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने जम्मू के रघुनाथ मंदिर और अमरनाथ यात्रा पर हुए आतंकवादी हमले का बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया।
मुख्य आरोपी की दो महीने बाद कर दी गई हत्या
एनआईए कोर्ट ने मामले में तीन आरोपियों को घटना का दोषी माना है। इनमें से भवेश पटेल, देवेन्द्र गुप्ता और सुनील जोशी को दोषी माना गया है, खास बात ये है कि संघ प्रचारक रहे सुनील जोशी की वारदात के दो महीने बाद ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले में एनआईए ने कुल 149 गवाह पेश किए और ये साबित करने का प्रयास किया कि असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के निर्देश पर इस घटना को अंजाम दिया गया। लेकिन कोर्ट में गवाही के दौरान 26 गवाह अपने बयान से मुकर गए। इनमें असीमानंद भी अपने पहले के बयान से पलट गए जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके कहने पर ही इस घटना को अंजाम दिया गया। असीमानंद ने कहा कि कांग्रेस सरकार में उन पर दबाव डालकर वह बयान डलवाए गए थे।
भाजपा सरकार में आने के बाद बदला मामले का रुख
पहले राजस्थान में और फिर केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद मामले की जांच में नया घटनाक्रम शुरू हुआ। एनआईए ने पहले इंद्रेश कुमार फिर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को इसमें क्लीनचिट दी और इसके बाद असीमानंद को भी पाक साफ करार दे दिया गया।
सबसे खास बात ये है कि आरआरएस नेता इंद्रेश कुमार का नाम एनआईए ने अपनी शुरूआती चार्जशीट में कोर्ट में दाखिल किया था। चार्जशीट में जिक्र था कि जयपुर के गुजराती भवन में बैठकर इंद्रेश ने अन्य आरोपियों के साथ बैठकर इस हमले का षडयंत्र रचा था। हालांकि भाजपा सरकार आने के बाद एनआई ने मामले में इंद्रेश की किसी तरह की संलिप्तता न मिलने की बात कही।