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FSSAI: खाद्य उत्पादों पर ओआरएस शब्द लिखने पर लगाई पाबंदी, भ्रामक मानते हुए की जाएगी कार्रवाई
Fri, 17 Oct 2025 06:00 AM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला, ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला, ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Fri, 17 Oct 2025 06:00 AM IST
सार
एफएसएसएआई ने खाद्य उत्पादों पर 'ओआरएस' शब्द लिखने पर रोक लगा दी है। आदेश के तहत भ्रामक प्रचार करने वाली कंपनियों पर खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई होगी।
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एफएसएसएआई
- फोटो : Social Media
विस्तार
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने खाद्य उत्पादों पर ओआरएस शब्द लिखने पर पूरी तरह रोक लगा दी है। प्राधिकरण ने गुरुवार को जारी आदेश में कहा है कि कोई भी खाद्य उत्पादक कंपनी अपने उत्पाद पर ओआरएस शब्द का उपयोग नहीं कर सकती। यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू होगा।
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खाद्य सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन- एफएसएसएआई
नई अधिसूचना में एफएसएसएआई ने साफ किया है कि ओआरएस का प्रयोग किसी पेय या ड्रिंक उत्पाद में उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला, भ्रामक और खाद्य सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन है। आदेश में यह भी कहा गया है कि यह प्रावधान फल-आधारित पेय, नॉन-कार्बोनेटेड ड्रिंक और रेडी-टू-ड्रिंक पेय पर समान रूप से लागू होगा। प्राधिकरण ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों व केंद्रीय लाइसेंसिंग प्राधिकरणों को आदेश भेजा है कि वे इन निर्देशों का कड़ाई से पालन कराएं।
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भ्रामक मानते हुए की जाएगी कार्रवाई- एफएसएसएआई
एफएसएसएआई ने स्पष्ट किया कि ऐसे सभी उत्पाद भ्रामक की श्रेणी में आएंगे। इनपर खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2006 की धारा 52 और 53 के तहत कार्रवाई की जाएगी, जिसमें गलत या भ्रमित करने वाले लेबल या एड के लिए दंड का प्रावधान है।
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डब्ल्यूएचओ मानकों से मेल नहीं खाता
पिछले कुछ वर्षों में बाजार में कई फ्लेवर्ड ड्रिंक्स, एनर्जी और हाइड्रेशन ड्रिंक्स ने अपने नामों में ओआरएस शब्द जोड़कर खुद को मेडिकल ग्रेड उत्पादों की तरह प्रचारित करना शुरू कर दिया। कुछ उत्पादों के पैक पर ओआरएस बड़े अक्षरों में लिखा जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं में यह भ्रम फैलता था कि वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तरफ से मान्य ओआरएस खरीद रहे हैं।
इसे लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से ऐसे दावों पर आपत्ति जता रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ये पेय वास्तविक ओआरएस की तरह चिकित्सा उपयोग के लिए नहीं बने होते और इनका सोडियम, ग्लूकोज और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन डब्ल्यूएचओ की तरफ से तय मानकों से मेल नहीं खाता।
डॉ. शिवरंजनी संतोष की कोशिश रंग लाई
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए हैदराबाद की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष काफी भावुक हो गई, उन्होंने बताया कि उनकी आठ साल लंबी लड़ाई आखिरकार सफल हो गई। सोशल मीडिया पर उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया, उन्होंने इस लड़ाई में साथ देने के लिए सभी का धन्यवाद दिया है।
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