चमत्कारी बाबा से सलाखों तक, जानें आसाराम बापू की पूरी कहानी
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आसाराम बापू पर फैसले के दिन उनके समर्थक बड़ी संख्या में जोधपुर पहुंच सकते हैं। ऐसे में कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस ने 30 अप्रैल तक जोधपुर में धारा 144 लागू करने की घोषणा कर दी है। बाबा गुरमीत राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद हरियाणा में हुई हिंसा जैसी घटना राजस्थान में हो, सरकार ऐसा नहीं चाहेगी। फिलहाल 25 अप्रैल को सुनाए जाने वाले फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं। आसाराम के खिलाफ पिछले 5 सालों से जारी पीड़िता और उनके परिवार की यह न्यायिक लड़ाई कई मायनों में असाधारण रही है।
आसाराम के मुकदमे से जुड़े अहम तथ्यों पर नजर डालिए। अप्रैल 1941 में मौजूदा पाकिस्तान के सिंध इलाके के बेरानी गांव में पैदा हुए आसाराम का असली नाम असुमल हरपलानी है। सिंधी व्यापारी समुदाय से संबंध रखने वाले आसाराम का परिवार 1947 में विभाजन के बाद भारत के अहमदाबाद शहर में आ बसा। साठ के दशक में उन्होंने लीलाशाह को अपना आध्यात्मिक गुरु बनाया। बाद में लीलाशाह ने ही असुमल का नाम आसाराम रखा। 1972 में आसाराम ने अहमदाबाद से लगभग 10 किलोमीटर दूर मुटेरा कस्बे में साबरमती नदी के किनारे अपनी पहली कुटिया बनाई।
आज दुनिया भर में उनके चार करोड़ अनुयायी हैं
यहां से शुरू हुआ आसाराम का आध्यात्मिक प्रोजेक्ट धीरे- धीरे गुजरात के अन्य शहरों से होता हुआ देश के अलग-अलग राज्यों में फैल गया। शुरुआत में गुजरात के ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब, पिछड़े और आदिवासी समूहों को अपने 'प्रवचनों, देसी दवाइयों और भजन कीर्तन' की तिकड़ी परोस कर लुभाने वाले आसाराम का प्रभाव धीरे-धीरे राज्य के शहरी मध्यवर्गीय इलाकों में भी बढ़ने लगा। शुरुआती सालों में प्रवचन के बाद प्रसाद के नाम पर वितरित किए जाने वाले मुफ्त भोजन ने भी आसाराम के 'भक्तों' की संख्या को तेजी से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आसाराम की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार आज दुनिया भर में उनके चार करोड़ अनुयायी हैं। आने वाले दशकों में आसाराम ने अपने बेटे नारायण साईं के साथ मिलकर देश विदेश में फैले अपने 400 आश्रमों का साम्राज्य खड़ा कर लिया। आसाराम के इस व्यापक प्रभाव में उनके भक्तों और आश्रमों की विशाल संख्या के साथ-साथ तकरीबन 10 हजार करोड़ रुपयों की संपत्ति भी है जिसकी जांच-पड़ताल फिलहाल केंद्रीय और गुजरात राज्य के कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय कर रहे हैं। इस जांच में आश्रम निर्माण के लिए गैरकानूनी तरीके से जमीन हड़पने के मामले भी शामिल हैं।
आसाराम का राजनीतिक प्रभाव
भक्तों की संख्या बढ़ने के साथ ही राजनेताओं ने भी आसाराम के जरिए एक बड़े वोटर समूह में पैठ बनाने का प्रयास किया। 1990 से लेकर 2000 के दशक तक उनके भक्तों की सूची में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लालकृष्ण आडवाणी और नितिन गडकरी जैसे दिग्गज नेता शामिल हो चुके थे। इस सूची में दिग्विजय सिंह, कमल नाथ और मोतीलाल वोरा जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी शामिल रहे।
साथ ही भाजपा के वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्रियों की एक लम्बी फेहरिस्त आसाराम के 'दर्शन' के लिए जाती रही है। इस फेहरिस्त में शिवराज सिंह चौहान, उमा भारती, रमण सिंह, प्रेम कुमार धूमल और वसुंधरा राजे के नाम शामिल हैं। इन सबसे इतर, 2000 के दशक के शुरुआती सालों में आसाराम के 'दर्शन' के लिए जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण नाम भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है। लेकिन 2008 में आसाराम के मुटेरा आश्रम में 2 बच्चों की हत्या का मामला सामने आते ही लगभग हर राजनीतिक दल के नेताओं ने उनसे दूरी बना ली।
2008 का मुटेरा आश्रम कांड
5 जुलाई 2008 को आसाराम के मुटेरा आश्रम के बाहर मौजूद साबरमती नदी के सूखे तल में 10 वर्षीय अभिषेक वाघेला और 11 वर्षीय दीपेश वाघेला के अध-जले शरीर विकृत अवस्था में बरामद हुए। अहमदाबाद में रहने वाले इन चचेरे भाइयों के अभिवावकों ने मृत्यु के कुछ ही दिन पहले उनका दाखिला आसाराम के 'गुरुकुल' नामक स्कूल में करवाया था। इस मामले की जांच के लिए तत्कालीन राज्य सरकार ने डीके त्रिवेदी कमीशन का गठन किया था, लेकिन इस कमीशन के जांच के नतीजे आज तक सार्वजनिक नहीं किए गए। इस बीच 2012 में राज्य पुलिस ने मुटेरा आश्रम के 7 कर्मचारियों पर गैर-इरादतन हत्या के आरोप तय किए। मामले की सुनवाई फिलहाल अहमदाबाद के सत्र न्यायालय में जारी है।
क्या है जोधपुर मामला?
अगस्त 2013 में आसाराम के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करवाने वाला शाहजहांपुर निवासी पीड़िता का पूरा परिवार घटना से पहले तक आसाराम का कट्टर भक्त था। पीड़िता के पिता ने अपने खर्चे पर शाहजहांपुर में आसाराम का आश्रम बनवाया था। 'संस्कारवान शिक्षा' की उम्मीद में उन्होंने अपने दो बच्चों को आसाराम के छिंदवाडा स्थित गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजा था। 7 अगस्त 2013 को पीड़िता के पिता को छिंदवाडा गुरुकुल से एक फोन आया। फोन पर उन्हें बताया गया कि उनकी 16 वर्षीय बेटी बीमार है। अगले दिन जब पीड़िता के माता पिता छिंदवाडा गुरुकुल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि उनकी बेटी पर भूत-प्रेत का साया है जिसे आसाराम ही ठीक कर सकते हैं।
14 अगस्त को पीड़िता का परिवार आसाराम से मिलने उनके जोधपुर आश्रम पहुंचा। मुकदमे में दायर चार्जशीट के अनुसार आसाराम ने 15 अगस्त की शाम 16 वर्षीय पीड़िता को 'ठीक' करने के बहाने से अपनी कुटिया में बुलाकर बलात्कार किया। पीड़िता के परिवार की मानें तो उनके लिए यह घटना उनके भगवान के भक्षक में बदल जाने जैसी ही थी। इस परिवार ने सुनवाई के बीते पांच साल अपने घर में नजरबंद बंधकों की तरह बिताए हैं। परिवार के मुताबिक उन्हें रिश्वत की पेशकश की गई और जान से मार देने की धमकी भी दी गई, लेकिन वे अपने से कई गुना ज्यादा प्रभावशाली आसाराम के खिलाफ जारी अपनी न्यायिक लड़ाई में डटे रहे।
गवाहों की हत्या का मामला
28 फरवरी 2014 की सुबह आसाराम और उनके बेटे नारायण साईं पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली सूरत निवासी दो बहनों में से एक के पति पर सूरत शहर में ही जानलेवा हमला हुआ। 15 दिन के भीतर ही अगला हमला राकेश पटेल नामक आसाराम के वीडियोग्राफर पर हुआ। दूसरे हमले के कुछ दिनों बाद ही दिनेश भगनानी नामक तीसरे गवाह पर सूरत के कपड़ा बाजार में तेजाब फेंका गया। यह तीनों गवाह खुद पर हुए इन जानलेवा हमलों के बाद भी बच गए। इसके बाद 23 मई 2014 को आसाराम के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके अमृत प्रजापति पर चौथा हमला किया गया।
पॉइंट ब्लांक रेंज से सीधे गर्दन पर मारी गई गोली के जख्म से 17 दिन बाद अमृत की मृत्यु हो गई। अगला निशाना आसाराम मामले पर कुल 187 खबरें लिखने वाले शाहजहांपुर के पत्रकार नरेंद्र यादव पर साधा गया। अज्ञात हमलावरों ने उनकी गर्दन पर हंसुए से 2 वार किए, लेकिन 76 टाकों और तीन ऑपरेशन के बाद नरेंद्र को एक नई जिंदगी मिली। जनवरी 2015 में अगले गवाह अखिल गुप्ता की मुजफ्फरनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। ठीक एक महीने बाद आसाराम के सचिव के तौर पर काम कर चुके राहुल सचान पर जोधपुर अदालत में गवाही देने के तुरंत बाद अदालत परिसर में ही जानलेवा हमला हुआ।
राहुल उस हमले में तो बच गए पर 25 नवंबर 2015 से आज तक लापता हैं। इस मामले में आठवां सनसनीखेज हमला 13 मई 2015 को गवाह महेंद्र चावला पर पानीपत में हुआ। हमले में बाल-बाल बचे महेंद्र आज भी आंशिक विकलांगता से जूझ रहे हैं। इस हमले के तीन महीनों के भीतर जोधपुर मामले में गवाह 35 वर्षीय कृपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। अपनी हत्या से कुछ ही हफ्ते पहले उन्होंने जोधपुर कोर्ट में पीड़िता के पक्ष में अपनी गवाही दर्ज करवाई थी।
आसाराम के पक्ष में लड़ने वाले वकील
बीते 5 सालों में सुनवाई के दौरान आसाराम ने खुद को बचाने के लिए देश के सबसे बड़े, महंगे और नामी वकीलों का सहारा लिया। आसाराम के बचाव में अलग-अलग अदालतों में बचाव के साथ-साथ बेल की अर्जियां लगाकर लड़ने वाले वकीलों में राम जेठमलानी, राजू रामचंद्रन, सुब्रमण्यम स्वामी, सिद्धार्थ लूथरा, सलमान खुर्शीद, केटीएस तुलसी और यूयू ललित जैसे नाम शामिल हैं। आज तक अलग-अलग अदालतों ने आसाराम की जमानत की अर्जियां कुल 11 बार खारिज की हैं।