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बृंदा करात ने पूछा- सहमति से संबंध बनाने वाले किशोर क्या रेपिस्ट हैं?

Fri, 13 Oct 2017 10:41 AM IST
amarujala.com- Presented by: हर्षित गौतम
amarujala.com- Presented by: हर्षित गौतम Updated Fri, 13 Oct 2017 10:41 AM IST
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fresh debate on teen sexuality after court verdict in case of sexual intercourse with minor wifes

नाबालिग पत्नियों से शारीरिक संबंध को रेप के दायरे में लाने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने एक नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल ये है कि सरकार और कोर्ट, किशोर और किशोरियों के सहमति से शारीरिक संबंध की सच्चाई का कैसे सामना करेगी।

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लैंगिक अधिकारों की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता इस फैसले का स्वागत करते हुए कहते हैं कि इससे बाल विवाह पर रोक लगेगी, लेकिन वो ये भी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद शारीरिक संबंध के व्यक्तिगत अधिकार को झटका लग सकता है।
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'अस्तित्व' (NGO) के साथ महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली रिहाना अदीब कहती हैं कि कोर्ट का फैसला शारीरिक संबंध के व्यक्तिगत अधिकार की पहचान करने में विफल है।
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पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- नाबालिग पत्नी से शारीरिक संबंध रेप की श्रेणी में

ये सच है कि सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 वर्ष है वहीं ये भी सच है कि किशोर और किशोरियों के सहमति से शारीरिक संबंध बनाने को आपराधिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

fresh debate on teen sexuality after court verdict in case of sexual intercourse with minor wifes

सीपीएम पोलित ब्यूरो की सदस्य बृंदा करात कहती हैं कि ये फैसला बाल विवाह के सिर्फ उस पहलू की बात करता है, जहां देश में बाल विवाह प्रचलन में है और किशोरियों की जबरदस्ती शादी कर दी जाती है। वो केंद्र पर आरोप लगाती हुई कहती हैं कि सरकार नाबालिगों के अधिकारों के मुकाबले शादी जैसी संस्था को बचाना ज्यादा जरूरी समझती है।

करात ये भी कहती हैं कि अदालत को युवाओं के सहमति से संबंध के मामलों को भी देखना चाहिए। अगर लड़की 16 साल की है और लड़का भी उसी उम्र है का और दोनों ही रिलेशनशिप में हैं, ऐसे में दोनों के बीच सहमति से बने शारिरिक संबंध के आधार पर लड़के को अपराधी या रेपिस्ट घोषित कर देना सही नहीं है। कोर्ट को ऐसे मामलों को अलग तरीके से देखना चाहिए। कांग्रेस ने भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के स्टैण्ड पर सवाल उठाए हैं।

भले ही कोर्ट के फैसले को सही तरीके से लागू करने में केंद्र और राज्य सरकारों को संघर्ष करना पड़े, लेकिन वो कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दे सकती। अभी भी 15 से 18 साल की उम्र की लड़कियों की शादी के मामलों में सरकारों के किशोरियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों को झकझोर कर रख दिया है।

कोर्ट के फैसले के बाद सरकार के पास मौका है कि वो ये देखे कि आखिर कहां उससे चूक हुई है। सरकार के सूत्र कहते हैं कि फैसला आने के बाद सजा के डर से बाल विवाह के मामलों में कमी आएगी।

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