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अभिव्यक्ति की आजादी: मंत्री के बयान के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

Tue, 03 Jan 2023 10:57 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Tue, 03 Jan 2023 10:57 PM IST
सार

न्यायमूर्ति एस ए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी कोई अतिरिक्त पाबंदी की आवश्यकता नहीं है। 

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Freedom of Speech: Supreme Court says no additional restrictions, can be imposed on citizen or minister
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

अभिव्यक्ति की आजादी मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी मंत्री, सांसद या विधायक के बयान के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। संविधान पीठ ने कहा है कि एक मंत्री द्वारा दिया गया बयान भले ही राज्य या केंद्र के किसी भी मामले के लिए दिया गया हो, पर सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता और सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संस्कृत, तमिल, हिंदी और अंग्रेजी ग्रंथों का हवाला देते हुए 'मधुर भाषण' के महत्व पर भी जोर दिया।

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न्यायमूर्ति एस ए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी पर अनुच्छेद 19 (2) के तहत उल्लेखित को छोड़कर कोई अतिरिक्त पाबंदी की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि क्या राज्य या केंद्र सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायक या उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों की अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी पर कोई अंकुश लगाया जा सकता है? 
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एक जज ने सुनाया अलग निर्णय 
पांच जजों की बेंच में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने एक अलग निर्णय सुनाया है। उन्होंने कहा, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहुत आवश्यक अधिकार है, जिससे नागरिकों को शासन के बारे में अच्छी तरह से सूचित और शिक्षित किया जा सके। उन्होंने कहा कि अभद्र भाषा समाज को असमान बनाकर मूलभूत मूल्यों पर प्रहार करती है और विशेष रूप से हमारे जैसे देश भारत में विविध पृष्ठभूमि के नागरिकों पर भी हमला करती है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, यह संसद के विवेक पर निर्भर है कि वह सार्वजनिक पदाधिकारियों को नागरिकों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने से रोकने के लिए एक कानून बनाए। उन्होंने कहा, यह राजनीतिक दलों के लिए है कि वे अपने मंत्रियों द्वारा दिए गए भाषणों को नियंत्रित करें जो एक आचार संहिता बनाकर किया जा सकता है। कोई भी नागरिक जो इस तरह के भाषणों या सार्वजनिक अधिकारी द्वारा अभद्र भाषा से हमला महसूस करता है, वह अदालत का रुख कर सकता है। 

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