हर साल 13 लाख लोगों की मौत का कारण बनता है जैव ईंधन का प्रदूषण, ईंधन बचाने में ये टिप्स हो सकते हैं कारगर
- प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के अंतर्गत घरेलू ईंधन के रूप में एलपीजी की खपत तेजी से बढ़ी
- देश के लगभग 98 फीसदी परिवारों तक हुई एलपीजी की पहुंच
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पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान संघ (पीसीआरए) के एक आंकड़े के अनुसार जैव ईंधन के आंतरिक प्रदूषण के कारण देश में प्रति वर्ष लगभग 13 लाख लोगों की असामयिक मौत हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। ये मौतें जैव ईंधन से पैदा हुए प्रदूषण के कारण लोगों को होने वाली श्वास, फेफड़े संबंधी गंभीर बीमारियों के कारण होती हैं। केंद्र सरकार की उज्जवला योजना के कारण भारी मात्रा में लोगों ने पारंपरिक जैव ईंधनों की जगह एलपीजी गैस आधारित चूल्हे पर भोजन बनाना शुरू कर दिया है जिससे इस तरह की बीमारियों के होने की संभावना में कमी आई है। अनुमान है कि देश के लगभग 98 फीसदी घरों तक एलपीजी की पहुंच हो चुकी है।
कितने हैं एलपीजी उपभोक्ता
पेट्रोलियम मंत्रालय के एक आंकड़े के अनुसार देश में एलपीजी गैस उपभोक्ताओं की संख्या 28.13 करोड़ को पार कर गई है। इसमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के अंतर्गत दिए गए 8.01 करोड़ गैस कनेक्शन की संख्या भी शामिल है। देश में लगभग 32.5 लाख कमर्शियल एलपीजी उपभोक्ता हैं, जो विभिन्न उद्योगों के लिए एलपीजी गैस का उपभोग करते हैं।
हालांकि, एक विशेषज्ञ के मुताबिक अनुमान है कि सरकार ने प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के अंतर्गत जिन आठ करोड़ गैस कनेक्शन देने का दावा किया है, इनमें से लगभग 43 फीसदी का ही दोबारा से रिफिलिंग के लिए उपयोग किया जा रहा है। यानी इस वर्ग के लगभग चार करोड़ परिवार आज भी जैव ईंधनों पर ही निर्भर करते हैं।
एलपीजी की तुलना में पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) की सप्लाई तेजी से बढ़ रही है। यह 62.5 लाख कनेक्शन तक पहुंच चुकी है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने शीघ्र ही यह लक्ष्य बढ़ाकर पांच करोड़ तक करने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है।
कम घरेलू उत्पादन के कारण भारत को अन्य देशों से गैस के आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत एशिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश बन चुका है। वर्ष 2017-18 में देश ने 36360 करोड़ रूपये की भारी लागत से 11 मिलियन मिट्रिक टन एलपीजी गैस का आयात किया था। एलपीजी गैस का कुल आयात 2014 में 264 प्रति दिन हजार बैरल (Mbpd) से बढ़कर 2019 में 464 प्रति दिन हजार बैरल (Mbpd) तक पहुंच चुका है।
महिलाओं को बचाने के लिए ये उपाय करे सरकार
द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) में सीनियर रिसर्चर मीना सहगल ने अमर उजाला से कहा कि यह सच्चाई है कि महंगाई के कारण देश के अनेक गरीब वर्ग के उपभोक्ता एलपीजी गैस का कनेक्शन पाने के बाद भी उसकी रिफिलिंग नहीं करा रहे हैं। इसके लिए परिवारों की आर्थिक स्थिति ज्यादा जिम्मेदार है। लेकिन अगर सरकार ऐसे परिवारों को सौर ऊर्जा या इलेक्ट्रिक उपकरणों से भोजन बनाने की तरफ मोड़ सके, तो यह उन्हें प्रदूषण से बचाने का ज्यादा सस्ता और स्थाई उपाय हो सकता है।
मीना सहगल के मुताबिक पहाड़ी क्षेत्रों और दूर-दराज के क्षेत्रों में सौर ऊर्जा उपकरण ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं। यह बहुत सस्ता भी पड़ता है। इलेक्ट्रिक माध्यम से केवल 1200 रुपये की एक प्लेट एक बार का निवेश मांगती है और इसके बाद सरकार परिवारों को मुफ्त या सब्सिडी पर आधारित बिजली उपलब्ध करा सकती है।
इसी प्रकार सौर ऊर्जा के मामले में भी एक ही उपकरण में एक बार निवेश की आवश्यकता पड़ती है। अगर यही उपकरण परिवारों को मुफ्त या अच्छी सब्सिडी देकर उपलब्ध कराया जा सके, तो यह उन्हें प्रदूषण से बचाने का स्थाई समाधान हो सकता है। यह सबसे सस्ता और पूरी तरह प्रदूषण से मुक्त होगा।
हालांकि, तब तक लोगों को गैस की अनावश्यक खपत करने से बचना चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए कुछ उपाय परिवारों की गैस पर होने वाली खपत को काफी कम कर सकते हैं।
पीसीआरए के सुझाए ये उपाय करेंगे बचत में मदद-
- भोजन बनाते समय चूल्हे पर चौड़े आधार वाले बर्तन का उपयोग करें। छोटे आधार वाले बर्तन में भोजन बनाने पर गैस ज्यादा बर्बाद होती है।
- गैस चूल्हे खरीदते समय यह अवश्य सुनिश्ति करें कि चूल्हा आईएसआई मार्क वाला हो। सस्ती कीमत के चक्कर में कम गुणवत्ता वाली गैस खरीदने पर भोजन बनाने में ज्यादा गैस खर्च होती है।
- भोजन बनाने में जितने सामानों की जरूरत पड़ती हो, उन्हें पहले एकत्र करके भोजन बनाना शुरू करें। इन चीजों को जिस रूप में भोजन पकाने में डालना हो, उन्हें पहले से तैयार कर लें।
- चावल-दाल जैसी चीजों को बनाने के लिए 20-25 मिनट भिगाकर रख लेने से ये पदार्थ कम गैस में और जल्दी पक जाते हैं। इससे उनका स्वाद भी ज्यादा रुचिकर लगेगा।
- गैस के बड़े बर्नर की बजाय छोटे बर्नर का उपयोग करने से भी गैस की कम मात्रा की खपत होती है।
- भोजन बनाने में जितना जरूरी हो, उतने ही जल का उपयोग करें। ज्यादा मात्रा में जल डाल देने के बाद उन्हें जलाकर कम करते समय ज्यादा गैस खर्च होती है।
- अगर कुकर में भोजन पका रहे हैं तो एक बार गैस बन जाने के बाद आंच कुछ धीमी कर दें। कुकर के अंदर बनी गैस कम आंच पर भी बनी रहती है और गुप्त ऊष्मा के कारण आंच से तेज गति से भोजन पकता रहता है, जबकि इस दौरान ज्यादा तेज आंच करने के बाद भी उसका उपयोग भोजन पकने में नहीं होता। यह ऊर्जा केवल कुकर के पानी को जलाने में खर्च होती है और इससे भोजन की गुणवत्ता भी खराब हो सकती है।
- अगर फ्रिज में रखी किसी चीज को भोजन बनाने में उपयोग करना हो, तो उसे फ्रिज से सीधे कुकर या कड़ाही में डालने की बजाय फ्रिज से कुछ समय पहले निकालकर बाहर रख लें। तापमान सामान्य हो जाने के बाद उनका इस्तेमाल करने से इन्हें पकाने में कम गैस की खपत होगी।