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बवाल: कुरान की 85 आयतों को हटाने के लिए पत्र लिखा तो पाकिस्तान-बांग्लादेश में मच गया था हड़कंप, जानिए क्या हुआ था तब

Wed, 17 Mar 2021 04:33 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 17 Mar 2021 04:33 PM IST
सार

इस मामले से जुड़े अदालती तथ्यों को सीता राम गोयल ने अपनी किताब 'द कलकत्ता कुरान पिटीशन' में संकलित किया है। उन्होंने लिखा है, जैसे ही कोलकाता हाईकोर्ट के समक्ष यह मामला आया तो न केवल राज्य सरकार, बल्कि केंद्र सरकार भी हिल गई थी...

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former chairman of the Shia Waqf Board Waseem Rizvi has filed a petition in the Supreme Court to removal of 26 verses from the Quran
कुरान - फोटो : For Refernce Only

विस्तार

शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने कुरान से 26 आयतों को हटाने का आदेश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसके बाद से ही कई मुस्लिम संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। रिजवी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा रही है। ऐसा ही एक मामला पहले भी सामने आ चुका है। अस्सी के दशक में वकील चांदमल चोपड़ा, शीतल सिंह और हिमांशु चक्रवर्ती ने यह मुद्दा उठाया था। चक्रवर्ती ने 20 जुलाई 1984 को पश्चिम बंगाल सरकार के गृह सचिव को एक पत्र भेजकर कुरान की 85 आयतों को हटाने की मांग कर दी। चोपड़ा ने 29 मार्च 1985 को कोलकाता उच्च न्यायालय में ऐसी ही एक याचिका लगा दी।

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इसके बाद रातों रात भारत के महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) बंगाल पहुंच गए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर में हड़कंप मच गया था। पाकिस्तान के मौलाना कौसर नियाजी ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कांफ्रेंस के चेयरमैन शरीफुद्दीन पीरजादा से संपर्क कर भारत को दुनिया में बदनाम करने का प्रयास किया। पड़ोसी मुल्क में शुक्रवार को विरोध दिवस मनाया गया।

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सेक्शन 95 के अंतर्गत कुरान की प्रतियां जब्त की जाएं

इस मामले से जुड़े अदालती तथ्यों को सीता राम गोयल ने अपनी किताब 'द कलकत्ता कुरान पिटीशन' में संकलित किया है। उन्होंने लिखा है, जैसे ही कोलकाता हाईकोर्ट के समक्ष यह मामला आया तो न केवल राज्य सरकार, बल्कि केंद्र सरकार भी हिल गई थी। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मकबूल अहमद खान ने यह मुद्दा उठा दिया। चोपड़ा ने कुरान की आयतों को लेकर जो याचिका लगाई थी, उसमें लिखा है कि कुरान के प्रकाशन से सेक्शन 195ए और 253ए का हनन होता है, इसलिए सीआरपीसी के सेक्शन 95 के अंतर्गत कुरान की प्रतियां जब्त की जाएं।

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मकबूल अहमद खान ने भारत पर आरोप लगाया कि यहां धार्मिक असहिष्णुता का माहौल है। इस देश में धैर्यशीलता एवं सहनशीलता के लिए कोई जगह नहीं है। भारत में विभिन्न धर्मों का सम्मान नहीं किया जा रहा। उन्होंने इतना तक कह दिया कि भारत में जीवन सुरक्षित नहीं है। पाकिस्तान की राजनीति में दखल रखने वाले मौलाना कौसर नियाजी ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कांफ्रेंस के चेयरमैन शरीफुद्दीन पीरजादा से संपर्क किया। नियाजी ने पीरजादा से कहा, वे कुरान की आयतों का मसला दुनिया के समक्ष उठाएं। दूसरे देशों को बताया जाए कि भारत में ऐसा घृणित कार्य हो रहा है। बांग्लादेश और कश्मीर में भी कुरान के मुद्दे को लेकर जबरदस्त हलचल रही।

तत्कालीन सीएम ज्योति बसु ने याचिका को घृणित कार्य बताया

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम ज्योति बसु ने विधानसभा में फॉरवर्ड ब्लॉक के एमएलए अनिल मुखर्जी के सवाल के जवाब में कहा था, इस तरह की याचिका एक घृणित कार्य है। उन्होंने राज्य के महाधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वे कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में बात करें। हम केंद्र के संपर्क में भी हैं। लोकसभा में जब यह मुद्दा उठा तो तत्कालीन स्पीकर बलराम जाखड़ ने कहा, देश में पहले से ही कई तरह की समस्याएं हैं। ये मामला जरुरी नहीं है। इससे एक नई दिक्कत खड़ी हो सकती है।

तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा, हमारे समक्ष यह मामला आया है। केंद्र सरकार, भारत के महान्यायवादी को पश्चिम बंगाल भेज रही है। बाद में कोलकाता हाईकोर्ट ने उस याचिका को रद्द कर दिया था। किताब में लिखा है कि चक्रवर्ती ने अपने पत्र में कहा था कि बंगाल के विभाजन के बाद भी बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार ठीक नहीं है। उन्होंने वहां अत्याचार का भाव देखा है। भारत ने बांग्लादेश बनवाने में बड़ी मदद की थी, लेकिन इसके बावजूद वहां मुस्लिमों का नजरिया ठीक नहीं है। बतौर चक्रवर्ती, मैंने कुरान का विस्तृत अध्ययन कर उसे समझा। कुरान की दर्जनों आयतें ऐसी थीं, जो विभिन्न समुदायों के बीच घृणा का कारण बन सकती हैं।

दुनिया की कोई शक्ति कुरान पर फैसला नहीं दे सकती

जब हिमांशु चक्रवर्ती के पत्र का पश्चिम बंगाल सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया, तो उन्होंने 14 अगस्त 1984 को दूसरा पत्र लिखा। इसके बाद उन्होंने चांदमल चोपड़ा से मुलाकात की। चोपड़ा ने राज्य के गृह सचिव को पत्र भेजा। साथ ही उन्होंने लिख दिया कि उनके पत्र को नोटिस मानकर कार्रवाई की जाए। सरकार की तरफ से जब कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने 29 मार्च 1985 को जस्टिस पदमा खस्तगीर की अदालत में याचिका लगा दी।

अदालत ने 12 अप्रैल को राज्य सरकार से कहा कि वह इस बाबत जवाबी हलफनामा दे। यह हलफनामा तीन मई तक देना था। एडवोकेट चोपड़ा को भी 17 मई तक जवाब देने के लिए कहा गया। मामले की सुनवाई के लिए 27 मई तय हुई। पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा, कुरान पवित्र किताब है और दुनिया की कोई शक्ति कुरान पर फैसला नहीं दे सकती। अदालत में ऐसा मामला नहीं चल सकता। ब्रिटिश कालीन भारत और आजादी के बाद ऐसा कोई केस अदालत में समक्ष नहीं आया, इसलिए यह याचिका खारिज की जाए।

बता दें कि अज्ञात कारणों से जस्टिस खस्तगीर ने दो मई को यह मामला सुनवाई सूची से हटा दिया। अब यह केस उनकी अदालत में नहीं सुना जाएगा। दूसरे जस्टिस बिमल चंद्र बसाक की अदालत में इस मामले पर सुनवाई हुई। भारत के महान्यायवादी अशोक सेन कोलकाता पहुंच चुके थे। 17 मई को चोपड़ा को जवाब दाखिल करना था। 12 मई की रात को चांदमल चोपड़ा के पास मैसेज आया कि शायद कल कोर्ट में मैटर लिस्ट होगा। अगले दिन जज ने कहा, रिट को दोबारा से लगाओ। उसी समय राज्य सरकार के महाधिवक्ता और भारत के महान्यायवादी अदालत में पहुंच चुके थे। चोपड़ा ने अदालत से समय मांगा।



दूसरी तरफ ने कोर्ट ने बहस शुरू करने के लिए कहा। किताब से पता चलता है कि उस वक्त अचानक हुए घटनाक्रम में केस की पैरवी करने के लिए चोपड़ा की पूरी तैयारी नहीं थी। नतीजा, चोपड़ा की याचिका खारिज कर दी गई। अब वसीम रिजवी ने कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई है। अपनी याचिका में वसीम रिजवी ने कहा है कि कुरान की इन आयतों से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है। मदरसों में बच्चों को कुरान की इन्हीं आयतों को पढ़ाया जा रहा है, जिससे उनका दिमाग कट्टरपंथ की तरफ बढ़ रहा है।

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