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सु्प्रीम कोर्ट का फैसला: आत्महत्या के लिए उकसाने में आरोपी के खिलाफ होना चाहिए सबूत, आरोपी को किया बरी

Wed, 12 Oct 2022 09:30 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 12 Oct 2022 09:30 PM IST
सार

 शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में न केवल आत्महत्या के समय के करीब उक्त सकारात्मक कार्रवाई नहीं दिखी है, बल्कि अपीलकर्ताओं द्वारा मृतक को लगातार शारीरिक या मानसिक यातना दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। 

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For abetment of suicide there must be proof of direct or indirect acts of incitement: SC
supreme court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आत्महत्या के लिए उकसाने के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कृत्यों और आरोपी के खिलाफ लगातार उत्पीड़न के सबूत होने चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चेन्नई के एक डॉक्टर और उसकी मां को बरी कर दिया। आरोपी की पत्नी ने आत्महत्या का कदम उठाया था। 

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न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद और प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्य और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई अन्य सामग्री देखने के बाद कहा कि हमारा विचार है कि निचली अदालत द्वारा अपीलकर्ताओं (डॉक्टर और उनकी मां) और उच्च न्यायालय को भी धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498 ए आईपीसी (दहेज के लिए उत्पीड़न) के तहत इनकी सजा को बरकरार रखना उचित नहीं था। 
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शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के 31 जनवरी, 2022 के फैसले के साथ-साथ 26 मार्च, 2021 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कृत्यों का सबूत होना चाहिए।  
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पीठ ने कहा कि फैसले का अवलोकन करने से संकेत मिलता है कि उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष को दर्ज करने में गलती की कि धारा 306 आईपीसी के तहत अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। यह अच्छी तरह से तय है कि न केवल लगातार उत्पीड़न का सबूत होना चाहिए, बल्कि आरोपी द्वारा सकारात्मक कार्रवाई को स्थापित करने के लिए ठोस सबूत होना चाहिए जो कमोबेश घटना के समय के करीब होना चाहिए।  शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में न केवल आत्महत्या के समय के करीब उक्त सकारात्मक कार्रवाई नहीं दिखी है, बल्कि अपीलकर्ताओं द्वारा मृतक को लगातार शारीरिक या मानसिक यातना दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। 

चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी आपराधिक मामले में हो सकती है आगे की जांच

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी हाई कोर्ट किसी आपराधिक मामले में आगे की जांच या फिर से जांच का आदेश दे सकता है ताकि चार्जशीट दाखिल हो जाए और ट्रायल कोर्ट इस तरह की जांच का आदेश देने में विफल रहा हो। न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की एक पीठ कानूनी सवाल से निपट रही थी कि क्या कोई उच्च न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी मजिस्ट्रेट को आगे आदेश देने का निर्देश देना उचित था, जब निचली अदालत ने आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल करने के बाद ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई हो।




 

कॉरपोरेट धोखाधड़ी के खुलासे पर पत्रकार को सुरक्षा देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक कॉरपोरेट धोखाधड़ी की जांच कर रहे एक खोजी पत्रकार द्वारा सीलबंद लिफाफे में उसके सामने दायर एक हलफनामे की प्रति को अटॉर्नी जनरल के कार्यालय में भेजने का आदेश दिया ताकि उसकी सुरक्षा की जा सके। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसका पीछा किया जा रहा है और उस पर हमला किया जा रहा है। 

मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह मुद्दा उस समय उठा जब वह एक कंपनी से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसने 27 बैंकों से कर्ज लिया और पैसे का गबन कर लिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता जय अनंत देहद्राई ने एक सीलबंद लिफाफे में पीठ के समक्ष एक हलफनामा पेश किया और कहा कि पत्रकार ने कॉर्पोरेट धोखाधड़ी की जांच की है और अब उसे धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि उस व्यक्ति पर नोएडा में घर जाते समय भी हमला किया गया था।
 
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