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चिंताजनक: बच्चों की बुद्धिमानी कम कर रहा फ्लोराइड, अब तक भारत के 23 राज्य प्रभावित; सतर्कता की जरूरत
Fri, 17 Jan 2025 05:06 AM IST
शुभम कुमार
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 17 Jan 2025 05:06 AM IST
सार
10 देशों के शोधकर्ताओं ने भारत, चीन, कनाडा, डेनमार्क, ईरान, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, स्पेन व ताइवान में अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने बच्चों के मूत्र में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम/लीटर पाई व उनके आईक्यू लेवल में 1.63 अंक की कमी दर्ज की है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला/ एजेंसी
विस्तार
पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा इन्सानों की सेहत को कई तरह से नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सबसे ज्यादा असर बच्चों के आईक्यू लेवल पर देखा गया है। यह बच्चों की बुद्धिमानी को कम कर रहा है। पहली बार वैज्ञानिकों ने बच्चों में फ्लोराइड एक्सपोजर और आईक्यू लेवल के बीच संबंध के सबूत जुटाए हैं।
भूजल या सरकारी जलापूर्ति में फ्लोराइड की मात्रा अगर तय सीमा से अधिक है और उसका एक्सपोजर बार-बार हो रहा है तो बच्चों में उनका आईक्यू का स्तर उतना ही कम होने की आशंका बढ़ जाती है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित किया गया है। इसमें 10 देशों के शोधकर्ताओं ने भारत, चीन, कनाडा, डेनमार्क, ईरान, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, स्पेन व ताइवान में अध्ययन किया।
बच्चों के मूत्र में कमी
शोधकर्ताओं ने बच्चों के मूत्र में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम/लीटर पाई व उनके आईक्यू लेवल में 1.63 अंक की कमी दर्ज की है। उच्च मात्रा में फ्लोराइड की न्यूरो टॉक्सिसिटी के बारे में तमाम जानकारियां मौजूद हैं, लेकिन इस अध्ययन का एक सुझाव यह भी है कि 1.5 मिलीग्राम/लीटर से कम मात्रा भी बच्चों में आईक्यू लेवल को नुकसान दे सकती है। यह इसलिए, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन एक लीटर पानी में 1.5 मिलीग्राम तक फ्लोराइड को सुरक्षित मानता है। हालांकि, इससे कम मात्रा कितनी होनी चाहिए इसके बारे में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट नहीं किया।
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36 जिले यूपी के तो मप्र के 44 प्रभावित
भारत के लिए यह अध्ययन इसलिए अहम है, क्योंकि साल 2022 में केंद्र की एक रिपोर्ट में 23 राज्यों के 370 जिलों में पानी अधिक फ्लोराइड युक्त पाया। इसमें उत्तर प्रदेश के 36 और मध्य प्रदेश में 44 जिले ऐसे हैं जहां भूजल में फ्लोराइड की अधिकता है। वहीं, आंध्र प्रदेश (12), तेलंगाना (10), असम (17), बिहार (13), छत्तीसगढ़ (22), दिल्ली (07), गुजरात (24), हरियाणा (21), हिमाचल (1), जम्मू-कश्मीर (दो) व झारखंड में 16 जिले इससे प्रभावित हैं। प्रति लीटर 2.37 मिलीग्राम से ज्यादा फ्लोराइड पाया गया।
देश के ग्रामीण हिस्सों में फ्लोराइड शहरों की तुलना में 1.85 गुना ज्यादा पाया गया।
लाभ और जोखिम दोनों साथ-साथ
दिल्ली के मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार बताते हैं कि फ्लोराइड के लाभ और जोखिम दोनों है। जल फ्लोराइडीकरण के जरिये बच्चों में दांतों की सड़न और वयस्कों में दांतों के झड़ने की समस्या को तेजी से कम किया जा सकता है।
यह दांतों में एसिड के टूटने से नष्ट हुए खनिजों को फिर से प्राप्त करने में मदद करता है। कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया से पैदा होने वाले एसिड को कम करता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इससे कमजोर समुदायों को तंत्रिका संबंधी नुकसान का अधिक खतरा हो सकता है।
हर जिले में होनी चाहिए जांच
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. अरविंद कुमार का कहना है कि स्वच्छ पानी को लेकर अलग-अलग एजेंसी के जरिये हमें जानकारी मिलती रहती है, लेकिन खराब गुणवत्ता वाला पानी कैसे आसपास के क्षेत्र में इन्सानों के लिए जोखिम बना हुआ है, इसके बारे में भी जांच होनी चाहिए। उदाहरण के लिए जिन जिलों में पानी आपूर्ति में फ्लोराइड अधिक है, वहां के बच्चों में आईक्यू के स्तर की जांच होनी चाहिए।
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भूजल या सरकारी जलापूर्ति में फ्लोराइड की मात्रा अगर तय सीमा से अधिक है और उसका एक्सपोजर बार-बार हो रहा है तो बच्चों में उनका आईक्यू का स्तर उतना ही कम होने की आशंका बढ़ जाती है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित किया गया है। इसमें 10 देशों के शोधकर्ताओं ने भारत, चीन, कनाडा, डेनमार्क, ईरान, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, स्पेन व ताइवान में अध्ययन किया।
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बच्चों के मूत्र में कमी
शोधकर्ताओं ने बच्चों के मूत्र में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम/लीटर पाई व उनके आईक्यू लेवल में 1.63 अंक की कमी दर्ज की है। उच्च मात्रा में फ्लोराइड की न्यूरो टॉक्सिसिटी के बारे में तमाम जानकारियां मौजूद हैं, लेकिन इस अध्ययन का एक सुझाव यह भी है कि 1.5 मिलीग्राम/लीटर से कम मात्रा भी बच्चों में आईक्यू लेवल को नुकसान दे सकती है। यह इसलिए, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन एक लीटर पानी में 1.5 मिलीग्राम तक फ्लोराइड को सुरक्षित मानता है। हालांकि, इससे कम मात्रा कितनी होनी चाहिए इसके बारे में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट नहीं किया।
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36 जिले यूपी के तो मप्र के 44 प्रभावित
भारत के लिए यह अध्ययन इसलिए अहम है, क्योंकि साल 2022 में केंद्र की एक रिपोर्ट में 23 राज्यों के 370 जिलों में पानी अधिक फ्लोराइड युक्त पाया। इसमें उत्तर प्रदेश के 36 और मध्य प्रदेश में 44 जिले ऐसे हैं जहां भूजल में फ्लोराइड की अधिकता है। वहीं, आंध्र प्रदेश (12), तेलंगाना (10), असम (17), बिहार (13), छत्तीसगढ़ (22), दिल्ली (07), गुजरात (24), हरियाणा (21), हिमाचल (1), जम्मू-कश्मीर (दो) व झारखंड में 16 जिले इससे प्रभावित हैं। प्रति लीटर 2.37 मिलीग्राम से ज्यादा फ्लोराइड पाया गया।
देश के ग्रामीण हिस्सों में फ्लोराइड शहरों की तुलना में 1.85 गुना ज्यादा पाया गया।
लाभ और जोखिम दोनों साथ-साथ
दिल्ली के मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार बताते हैं कि फ्लोराइड के लाभ और जोखिम दोनों है। जल फ्लोराइडीकरण के जरिये बच्चों में दांतों की सड़न और वयस्कों में दांतों के झड़ने की समस्या को तेजी से कम किया जा सकता है।
यह दांतों में एसिड के टूटने से नष्ट हुए खनिजों को फिर से प्राप्त करने में मदद करता है। कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया से पैदा होने वाले एसिड को कम करता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इससे कमजोर समुदायों को तंत्रिका संबंधी नुकसान का अधिक खतरा हो सकता है।
हर जिले में होनी चाहिए जांच
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. अरविंद कुमार का कहना है कि स्वच्छ पानी को लेकर अलग-अलग एजेंसी के जरिये हमें जानकारी मिलती रहती है, लेकिन खराब गुणवत्ता वाला पानी कैसे आसपास के क्षेत्र में इन्सानों के लिए जोखिम बना हुआ है, इसके बारे में भी जांच होनी चाहिए। उदाहरण के लिए जिन जिलों में पानी आपूर्ति में फ्लोराइड अधिक है, वहां के बच्चों में आईक्यू के स्तर की जांच होनी चाहिए।