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बदलेगी लाखों जिंदगियां: पार्किंसन रोगियों के लिए पहला भारतीय DBS उपकरण; विदेशी तुलना में 50% से भी अधिक सस्ता
Sat, 09 Aug 2025 07:12 AM IST
पवन पांडेय
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Sat, 09 Aug 2025 07:12 AM IST
सार
लैंसेट न्यूरोलॉजी (2020) के अध्ययन के अनुसार, विश्व भर में पार्किंसन और डिस्टोनिया के 60 लाख से अधिक मरीज हैं, जिनमें से बड़ी संख्या भारत में भी है। उम्र बढ़ने के साथ इन बीमारियों का खतरा बढ़ता है और वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आबादी को देखते हुए आने वाले वर्षों में संख्या और बढ़ने का अनुमान है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : ANI
विस्तार
मस्तिष्क चिकित्सा विज्ञान में पार्किंसन और डिस्टोनिया जैसे गंभीर डिसऑर्डर से पीड़ित लाखों मरीजों के लिए वैज्ञानिकों ने पहला स्वदेशी डीप ब्रेन स्टिमुलेटर (डीबीएस) विकसित किया है, जो विदेशों की तुलना में करीब 50 फीसदी से भी अधिक सस्ता है। अब तक भारतीय अस्पताल इस उपकरण के आयात पर निर्भर थे, जिससे इसकी कीमत करीब 16 से 25 लाख तक पहुंच जाती थी। पहले डीबीएस सर्जरी केवल चुनिंदा संपन्न मरीजों के लिए संभव थी, वहीं अब यह इलाज आम भारतीयों की पहुंच में आ सकता है।
तिरुवनंतपुरम के चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी और मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस डीबीएस को बनाया है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव अभय करंदीकर ने बताया कि यह उपकरण अब व्यावसायिक उत्पादन के लिए निजी कंपनी को हस्तांतरित किया है, ताकि एक से दो साल के भीतर भारतीय बाजार में उपलब्ध हो सके। इसके बाद विकासशील देशों में निर्यात की भी संभावना है।
यह भी पढ़ें - Alert: चीन में फैल रही है एक और गंभीर बीमारी, अब तक 7000 से अधिक लोग हुए शिकार; भारत में भी हो सकता है खतरा
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सर्जिकल तकनीक है डीप ब्रेन स्टिमुलेशन
डीबीएस सर्जिकल तकनीक है, जिसमें मस्तिष्क के विशिष्ट हिस्सों में पतले इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रोड छोटे पल्स जनरेटर से जुड़े होते हैं, जिसे मरीज के सीने के नीचे त्वचा के अंदर प्रत्यारोपित किया जाता है। यह जनरेटर हल्के विद्युत संकेत भेजकर मस्तिष्क की असामान्य विद्युत गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जिससे मरीज के शरीर में होने वाली अनियंत्रित हरकतें, कंपन और कठोरता में कमी आती है। पार्किंसन रोग, डिस्टोनिया और कुछ मामलों में 'एसेंशियल ट्रीमर' जैसी बीमारियों में यह तकनीक प्रभावी मानी जाती है।
दुनिया में 60 लाख मरीज...
दरअसल, लैंसेट न्यूरोलॉजी (2020) के अध्ययन के अनुसार, विश्व भर में पार्किंसन और डिस्टोनिया के 60 लाख से अधिक मरीज हैं, जिनमें से बड़ी संख्या भारत में भी है। उम्र बढ़ने के साथ इन बीमारियों का खतरा बढ़ता है और वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आबादी को देखते हुए आने वाले वर्षों में संख्या और बढ़ने का अनुमान है।
एक लाख में 150 लोगों को है यह रोग
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तिरुवनंतपुरम के चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी और मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस डीबीएस को बनाया है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव अभय करंदीकर ने बताया कि यह उपकरण अब व्यावसायिक उत्पादन के लिए निजी कंपनी को हस्तांतरित किया है, ताकि एक से दो साल के भीतर भारतीय बाजार में उपलब्ध हो सके। इसके बाद विकासशील देशों में निर्यात की भी संभावना है।
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सर्जिकल तकनीक है डीप ब्रेन स्टिमुलेशन
डीबीएस सर्जिकल तकनीक है, जिसमें मस्तिष्क के विशिष्ट हिस्सों में पतले इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रोड छोटे पल्स जनरेटर से जुड़े होते हैं, जिसे मरीज के सीने के नीचे त्वचा के अंदर प्रत्यारोपित किया जाता है। यह जनरेटर हल्के विद्युत संकेत भेजकर मस्तिष्क की असामान्य विद्युत गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जिससे मरीज के शरीर में होने वाली अनियंत्रित हरकतें, कंपन और कठोरता में कमी आती है। पार्किंसन रोग, डिस्टोनिया और कुछ मामलों में 'एसेंशियल ट्रीमर' जैसी बीमारियों में यह तकनीक प्रभावी मानी जाती है।
दुनिया में 60 लाख मरीज...
दरअसल, लैंसेट न्यूरोलॉजी (2020) के अध्ययन के अनुसार, विश्व भर में पार्किंसन और डिस्टोनिया के 60 लाख से अधिक मरीज हैं, जिनमें से बड़ी संख्या भारत में भी है। उम्र बढ़ने के साथ इन बीमारियों का खतरा बढ़ता है और वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आबादी को देखते हुए आने वाले वर्षों में संख्या और बढ़ने का अनुमान है।
एक लाख में 150 लोगों को है यह रोग
- पार्किंसन रोग की अनुमानित प्रचलन दर प्रति एक लाख में से 120 से 150 लोग है।
- डिस्टोनिया: हर साल न्यूरोलॉजी ओपीडी में मूवमेंट डिसऑर्डर के मामलों में 10-15 फीसदी मामले।
- उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ता है, लेकिन युवा मरीज भी प्रभावित हो सकते हैं।
- डीबीएस का सफल उपचार है, लेकिन अस्पताल में भर्ती से लेकर ऑपरेशन, इम्प्लांट सभी का खर्च काफी महंगा है।