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यह आग ईश्वरीय नहीं! 'तूफान, बाढ़ या भूकंप के कारण लगने पर ही मान सकते हैं प्राकृतिक, ये मामला दूसरा...'

Sat, 08 Jan 2022 03:04 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sat, 08 Jan 2022 03:04 PM IST
सार

जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए की। हाईकोर्ट ने एक कंपनी के गोदाम में लगी आग को 'भगवान का कृत्य' माना था और शराब कंपनी को उत्पाद शुल्क के दायित्व से मुक्ति दे दी थी। 

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Fire not an act of God if no external natural force involved: Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

एक फैक्टरी में आग की घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बात कह दी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि किसी आग को तब तक भगवान का कृत्य या ईश्वरीय नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसकी वजह तूफान, बाढ़, बिजली गिरना या भूकंप न हो। 

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जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए की। हाईकोर्ट ने एक कंपनी के गोदाम में लगी आग को 'भगवान का कृत्य' माना था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने शराब बनाने वाली इस कंपनी को उत्पाद शुल्क के दायित्व से मुक्ति दे दी थी। 
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सुनवाई करने वाली पीठ में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में तूफान, बाढ़, बिजली गिरने या भूकंप की वजह से आग लगने की घटना नहीं हुई है। जब कोई बाहरी प्राकृतिक कारण इस आग का जिम्मेदार नहीं है तो आग की घटना को कानूनी भाषा में भगवान के कार्य के अलावा कुछ भी कहा जा सकता है। 
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में आग की वजह किसी व्यक्ति की शरारत भी नहीं है। उल्लेखनीय है कि शराब फैक्टरी के गोदाम में 10 अप्रैल 2003 को रात 12.55 बजे आग लगी थी और सुबह पांच बजे तक काबू हो पाई थी। 


इसे अपरिहार्य दुर्घटना कह सकते हैं
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि जब सभी प्रासंगिक कारणों को समग्र रूप से देखें तो हमें यह स्वीकार करना मुश्किल लगता है कि आग को रोकना और इससे नुकसान को टालना किसी मानवीय एजेंसी के नियंत्रण से बाहर था, इसलिए इसे अपरिहार्य दुर्घटना कहा जा सकता है। आग अपने आप उत्पन्न नहीं हुई थी। आग रोकने के उचित इंतजामों से इस घटना से बचा जा सकता था या नुकसान को कम से कम किया जा सकता था। मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणियां सही नहीं लगती हैं, इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।

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