घाटी में अशांति की असल वजह तलाशनी होगीः विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह
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पूर्व सेनाध्यक्ष और विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने जो सवाल उठाया है, उसका जवाब सियासी दलों के पास है। लंबे समय तक जम्मू कश्मीर में तैनात रह चुके जनरल सिंह का मानना है कि 2005 से 2012 के बीच राज्य में अमन की बयार चलने लगी थी। इसकी शुरुआत साल 2000 के हुई थी। जम्मू-कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ और रिसर्च एंड अनालिसिस (रॉ) के पूर्व प्रमुख एएस दुल्लत भी इससे इत्तेफाक रखते हैं कि 2000 के बाद घाटी में आतंक का प्रभाव कम होने लगा था।
यहां अमन-चैन का माहौल बढ़ने लगा था और नागरिकों की जिंदगी सुकून से भरने लगी थी। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि दहशत की धुंध दोबारा घाटी को अपने आगोश में लेने लगी। जनरल सिंह का कहना है कि कश्मीर का मुद्दा सामान्य नहीं है। यह छद्म युद्ध का मामला है। उनका मानना है कि किसी एक घटना के आधार पर नीतियों की सफलता या विफलता को नहीं परखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में एक गठबंधन सरकार सत्ता में आई। इस सरकार में शामिल एक पार्टी के पास घाटी में व्यापक समर्थन था तो दूसरी के पास जम्मू में। लिहाजा पूर्ववर्ती नीतियों की भी समीक्षा करने की जरूरत है। यह देखा जाना चाहिए कि क्या नीतियों की समग्र विफलता से अशांति बढ़ी या फिर गलतियों के कारण आतंकवाद को बढ़ावा मिला?
2012 के बाद क्यों बढ़ा आतंकवाद
एएस दुल्लत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद घटने के पीछे अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और परवेज मुशर्रफ की नीतियों का काफी अहम योगदान था। भारत ने पाकिस्तान पर द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया, अपनी नीतियों को कारगर बनाया जिसका नतीजा अमन के रूप में सामने आया। हालांकि दुल्लत सरकारी नीतियों की आलोचना करने से भी नहीं चूके।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के हालातों की सबसे बड़ी वजह तो सियासत ही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार को इस बात का पता लगाना चाहिए कि आखिर घाटी में आतंकवाद दोबारा क्यों पनपा और इसके खात्मे का तरीका क्या हो सकता है?