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सरकार की नई रणनीति से बदल गया किसान आंदोलन का नजारा
Sat, 30 Jan 2021 03:22 AM IST
Amit Mandal
हिमांशु मिश्र
हिमांशु मिश्र
Published by: Amit Mandal
Updated Sat, 30 Jan 2021 03:22 AM IST
सार
- सिंघु बॉर्डर की जगह गाजीपुर बन गया किसान आंदोलन का केंद्र
- जल्दबाजी से एकजुट पश्चिमी यूपी के किसान, आंदोलन को भी ऊर्जा
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गाजीपुर बॉर्डर पर बढ़ी भीड़
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
केंद्र सरकार की नई रणनीति ने किसान आंदोलन को और ऊर्जा दे दी है। पहले सरकार की योजना दबाव में आए किसान संगठनों पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ा कर आंदोलन खत्म कराने की थी। हालांकि, बृहस्पतिवार को सरकार ने अचानक रणनीति बदली और जल्दबाजी में धरना खत्म कराने की रणनीति बनाई। इस रणनीति के कारण धरनास्थल से घर लौट रहे किसान अब फिर से सरकार के खिलाफ गोलबंद हो गए। इसके अलावा किसान आंदोलन का केंद्र भी अचानक सिंघु बॉर्डर से गाजीपुर बन गया।
गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और खासतौर पर लालकिले के घटनाक्रम के बाद किसान संगठन भारी दबाव में थे। आंदोलन स्थल से बड़ी संख्या में किसान अपने अपने घरों को लौट रहे थे। हिंसा और आंदोलन स्थल से भीड़ कम होने से किसान संगठन भारी दबाव में थे। उस दौरान सरकार ने भी गणतंत्र दिवस की रात और उसके अगले दिन आंदोलन पर आक्रामक रुख नहीं अपनाने की रणनीति बनाई थी। तब रणनीति यह थी कि बिना सीधा हस्तक्षेप के सरकार किसान संगठनों पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ाए। पहले उत्तर प्रदेश और बाद में हरियाणा में जमे आंदोलनकारियों को हटाया जाए।
आक्रामक होने से पलटा पासा
उत्तर प्रदेश सरकार ने बृहस्पतिवार को गाजीपुर से किसानों को हटने का उस वक्त अल्टीमेटम दिया, जब बड़ी संख्या में किसान खुद ही वापस गांव लौट रहे थे। इससे पहले आंदोलन स्थल की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। किसानों में नाराजगी तब और बढ़ गई जब बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को गाजीपुर के मोर्चे पर लगाया गया। इसी बीच राकेश टिकैत के आंदोलन के लिए अड़ जाने और रोने से पूरी तस्वीर ही पलट गई। गांव वापस लौट रहे किसान वापस धरनास्थल की ओर लौटने लगे।
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यूपी में जल्द ही होने हैं पंचायत चुनाव
दरअसल, किसान आंदोलन में वास्तविक तौर पर पंजाब के ही किसान शामिल हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का भी एक तबका इसमें शामिल था। सरकार की योजना इस पूरे आंदोलन में पंजाब के किसान संगठनों को अलग-थलग करने की थी। हालांकि अब बदली परिस्थिति में किसान आंदोलन का केंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो गया है। खासतौर पर जाट बिरादरी ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को जल्द ही पंचायत चुनाव का सामना करना है।
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गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और खासतौर पर लालकिले के घटनाक्रम के बाद किसान संगठन भारी दबाव में थे। आंदोलन स्थल से बड़ी संख्या में किसान अपने अपने घरों को लौट रहे थे। हिंसा और आंदोलन स्थल से भीड़ कम होने से किसान संगठन भारी दबाव में थे। उस दौरान सरकार ने भी गणतंत्र दिवस की रात और उसके अगले दिन आंदोलन पर आक्रामक रुख नहीं अपनाने की रणनीति बनाई थी। तब रणनीति यह थी कि बिना सीधा हस्तक्षेप के सरकार किसान संगठनों पर धीरे-धीरे दबाव बढ़ाए। पहले उत्तर प्रदेश और बाद में हरियाणा में जमे आंदोलनकारियों को हटाया जाए।
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आक्रामक होने से पलटा पासा
उत्तर प्रदेश सरकार ने बृहस्पतिवार को गाजीपुर से किसानों को हटने का उस वक्त अल्टीमेटम दिया, जब बड़ी संख्या में किसान खुद ही वापस गांव लौट रहे थे। इससे पहले आंदोलन स्थल की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। किसानों में नाराजगी तब और बढ़ गई जब बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को गाजीपुर के मोर्चे पर लगाया गया। इसी बीच राकेश टिकैत के आंदोलन के लिए अड़ जाने और रोने से पूरी तस्वीर ही पलट गई। गांव वापस लौट रहे किसान वापस धरनास्थल की ओर लौटने लगे।
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यूपी में जल्द ही होने हैं पंचायत चुनाव
दरअसल, किसान आंदोलन में वास्तविक तौर पर पंजाब के ही किसान शामिल हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का भी एक तबका इसमें शामिल था। सरकार की योजना इस पूरे आंदोलन में पंजाब के किसान संगठनों को अलग-थलग करने की थी। हालांकि अब बदली परिस्थिति में किसान आंदोलन का केंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो गया है। खासतौर पर जाट बिरादरी ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को जल्द ही पंचायत चुनाव का सामना करना है।