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Hindi News ›   India News ›   Farmers protest: Apart from farmers and other sections, the BJP leaders themselves are also expressing surprise on this announcement of farm laws repealed by PM Modi

किसान आंदोलन: गलत साबित हुई 'ढाई प्रदेश' की थ्योरी, भाजपा को कृषि कानूनों पर अड़े रहने की 'राजनीतिक चोट' का अंदाजा था

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 19 Nov 2021 11:17 AM IST
सार

'सरकार को किसानों की दिक्कतों से कोई मतलब नहीं था। वह रोजाना केवल इतना देख रही है कि किसान आंदोलन मजबूत हो रहा है या कमजोर पड़ने लगा है। आंदोलन स्थल पर किसानों की संख्या बढ़ी या घटी रही है। किसान आंदोलन अभी तक शांति के साथ चलता आ रहा था। लंबे आंदोलन में धैर्य को तोड़ने और आंदोलनकर्ताओं को उकसाने के हर संभव प्रयास किए गए।'

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Farmers protest: Apart from farmers and other sections, the BJP leaders themselves are also expressing surprise on this announcement of farm laws repealed by PM Modi
तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की पीएम नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद गाजीपुर सीमा पर जलेबी के साथ जश्न मनाते किसान - फोटो : ANI

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह गुरु पर्व के दिन देश के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। किसानों एवं दूसरे वर्गों के अलावा खुद भाजपा के लोग भी पीएम की इस घोषणा पर हैरानी जता रहे हैं। तीनों कृषि कानूनों को लेकर अभी तक केंद्र एवं भाजपा का जो रवैया देखा गया, उससे किसानों की उम्मीद को झटका अवश्य लगा था। विपक्ष भी तकरीबन यही मानकर चल रहा था कि केंद्र सरकार, कृषि कानूनों पर पीछे नहीं हटेगी। 26 नवंबर को किसान आंदोलन को एक साल पूरा होने जा रहा है। इस मौके पर किसान संगठनों ने कई कार्यक्रमों का एलान किया था।

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जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अविक साहा कहते हैं कि किसान आंदोलन के फैलाव को लेकर केंद्र सरकार सदैव दोराहे पर रही है। केंद्र की यह थ्योरी कि ये तो 'ढाई प्रदेश' के किसानों का आंदोलन है, इस पर ध्यान न दिया जाए। इसके बाद अब भाजपा का ये वहम भी खत्म हो गया है। दरअसल, हम शुरू से ही यह बात कहते आए हैं कि किसान तो हर राज्य में है। किसी के पास छोटी जोत है तो किसी के पास बड़ी। भाजपा को अब कृषि कानूनों पर अड़े रहने की राजनीतिक चोट का अंदाजा हो गया था।
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किसानों ने सरकार के भ्रम को तोड़ दिया

अविक साहा कहते हैं, सरकार ने इस आंदोलन को खत्म कराने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पीएम की ये बात सही नहीं है कि सरकार ने किसानों को समझाने का प्रयास किया था। सरकार ने कभी तो मन से बात ही नहीं की। उसका तो केवल एक ही प्रयास रहा है कि किसी भी तरह किसानों का आंदोलन खत्म हो जाए, टूट जाए या बदनाम हो जाए। आंदोलन स्थल पर कुछ ऐसा हो जाए कि जिसकी आड़ में केंद्र सरकार, किसान आंदोलन को खत्म कर दे। सरकार को किसानों की दिक्कतों से कोई मतलब नहीं था। वह रोजाना केवल इतना देख रही है कि किसान आंदोलन मजबूत हो रहा है या कमजोर पड़ने लगा है। आंदोलन स्थल पर किसानों की संख्या बढ़ी या घटी रही है। किसान आंदोलन अभी तक शांति के साथ चलता आ रहा था। लंबे आंदोलन में धैर्य को तोड़ने और आंदोलनकर्ताओं को उकसाने के हर संभव प्रयास किए गए। दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों ने सरकार के इस भ्रम को तोड़ दिया। कहीं कोई अशांति वाली बात नहीं हुई।

किसान आंदोलन देश के हर हिस्से तक जा चुका है

किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा ही एक रट कि ये तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा तक सीमित है। केंद्रीय मंत्रियों ने खुले तौर पर यह बात कही थी। जब सरकार के साथ किसान नेताओं का आखिरी बार संवाद हुआ और बात नहीं बनी, तभी से इस आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारियां शुरू हो गई थीं। किसान महापंचायतों का दौर प्रारंभ हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक सहित दूसरे राज्यों में किसान आंदोलन फैल चुका था। संगठनों के पदाधिकारियों ने खेतों पर जाकर किसानों को तीनों कृषि कानूनों की जानकारी दी। खेती में लाभ या नुकसान, अलग बात है। किसान इसे झेल लेगा। तीन कृषि कानूनों के चलते जब किसान की जमीन ही नही बचेगी, तो वह फसल कहां पैदा करेगा। किसान को यह बात अच्छे से समझ में आ गई। धीरे-धीरे तक अन्नदाता के हर घर में जमीन को लेकर चर्चा होने लगी। जमीन चली गई तो सब कुछ चला गया। इसी बात ने किसान आंदोलन को अंदर ही अंदर एक नई मजबूती प्रदान कर दी।

झंडा अलग रहा, मगर किसान एक रहे

किसान आंदोलन में भारतीय किसान यूनियन का झंडा अलग था। जय किसान आंदोलन और पंजाब के किसान संगठन अपने अलग झंडे के साथ आंदोलन में शामिल हुए। इतनी विविधताओं के बावजूद इन संगठनों ने 'किसान संसद' आयोजित कर दिखाई। संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, संगठन अलग हैं, लेकिन मकसद एक है। इसी ने किसानों को 'एक' बनाए रखा है। ये राष्ट्रव्यापी आंदोलन रहा है। ये बात सही है कि किसान आंदोलन का एक झंडा नहीं है, एक चिन्ह नहीं है। कुछ संगठन खास विचारधारा से बंधे हैं। कई दफा बयान भी अलग हो जाता है। किसान संगठनों के कई नेता सार्वजनिक मंच से ऐसी बात कह देते हैं, जिसका आंदोलन या इसकी मांगों से कोई मतलब नहीं होता। खुद राकेश टिकैत के बयान चर्चित रहे हैं। पिछले दिनों कुछ पदाधिकारी बोले, किसान संगठनों को चुनाव के लिए तैयार रहना चाहिए। इस बाबत चढूनी को निलंबित किया गया। योगेंद्र यादव भी निलंबित हुए हैं। संयुक्त किसान मोर्चे ने साफतौर पर कह दिया है कि कोई भी सदस्य अपनी बात रख सकता है। यह उसका निजी विचार माना जाएगा, मोर्चे का नहीं। अगर किसानों से जुड़ा कोई संगठन चुनाव लड़ने की बात करता है तो वह कर सकता है। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले चुनाव लड़ने की बात नहीं होगी। बतौर अविक साहा, किसान आंदोलन में अलग चेहरे रहे, अलग प्रदेश और अलग भाषा के बावजूद सभी एक बात पर हमेशा कायम रहे कि तीनों कृषि कानून गलत हैं। इन्हें रद्द करा कर ही दम लेना है।

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